Wednesday, March 31, 2010

गधे के पूत , यंहा मत मूत !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;














दोस्तों  !

अभी दो दिन पहले मैंने दो भले लोगो को दस्तूर से अलग मसले पर रगडा करते देख बेहद ताज्जुब में पड़ गया /
तस्दीक करने पर मालूम हुआ कि पहले वाले भद्र पुरूष उस जगह मूत्र त्याग करते रंगे हांथो पकडे गए जन्हा दूसरे वाले भद्र इन्शान ने बेहद खुल्लासा लफ्जो में लिखवा दिया था कि '' गधे के पूत,यंहा मत मूत !''
आप अचम्भित ना हों क्यों कि हिन्दोस्तान के गुजस्ता वक्त में ''मूतने''को लेकर बड़े बड़े बखेड़े खड़े हुए हुए है / मसलन अत्री ऋषि को ही लेले उन्होंने चुलू में उठा कर समुन्द्र पान कर दिया और बाद में हाहाकार मच जाने पर मूतने बैठे तो जाके समुन्द्र की जान में जान आई /
एक दूसरा बखेड़ा रावण और भोलेशंकर के बिच पैदा हुआ कि जब रावण शिव को लंकापुरी में निवासी बनाने की गरज से अपने सीर पर बैठा कर चला तो राह में रावण ने शिद्दत से मूत्र बेग महसूसा और शिवलिंग किसी को पकड़ा कर खुद मूत्र त्यागने बैठ गया / वो बैठा तो बैठा ही रह गया / थक कर दूसरे बन्दे ने शिवलिंग वन्ही जमीं पर रख छोड़ा जो आज मशहूर तीर्थ बैद्यनाथ धाम है /
याने मूत्र त्याग के नाम पे भी बड़े बड़े गुल खिल जा सकते है / अलबता यह एक सहज इन्शान की जिस्मानी जरूरत है / जो समयानुसार दोहराए जाने की जरूरत होती है / मगर यह सहज क्रिया यदि दुश्वारियो की गिरफ्त में आ जाए या बाधाओ से घिर जाए तो लेने के देने पड़ जाते है / यह जिस्मानी जरूरत कई एक दफा निहायत ही दर्दनाक तजुर्बे करवा देती है / कई दफा किडनी और प्रोस्ट्रेट जैसे अहम् शारीरिक पुरजो के बिगड़ जाने पर मूत्र त्याग में दिक्कते पैदा हो जाती है मगर मौजूदा मेरे इस लेख का उन हौलनाक बिमारी से कोइ वास्ता नहीं है मै तो उन हालातो के बाबत बाते कर रहा हूँ जो निषेधाज्ञा वाले इलाके में जबरन मूतने से पैदा हो जाती है / गाहेबगाहे आपने कंही भी आते जाते निम्न किस्म के खूबसूरत श्लोक दीवारों पर लिखे देखे होंगे कि यंहा मूतना मना है / उक्त मायने वाले निषेधाज्ञा श्लोक यदि कारामद तरीकों से असर नहीं दिखला पाते तो आजिज आया हुआ बन्दा नाराज हो कर यूं भी लिख डालता है कि ''देखो ! देखो ! गधा पेशाब कर रहा है / या फिर यूं लिखा मिलता है कि ''गधे के पूत , यंहा मत मूत !

आखिरी दोनों बयानों में लिखने वाले की चिढ बेखास्ता झलकती है याने कि वो लाख समझाने के बावजूद लोगबाग द्वारा निर्दिष्ट जगह पर मूत्र त्याग जैसा नेक इरादा नहीं टालते देख निषेध कर्ता लिखने पर मजबूर हो जाता है कि -'' देखो ! देखो ! ....या ....यंहा मत मूत .../
हिन्दोस्तान में हुकूमत जिन कायदे-क़ानून के बुनियाद पर अपने निजाम को अंजाम देता है उसमे ज्यादातर, या यूं कहे उम्मीदन पिन्चान्वे फीसदी कायदे-क़ानून को तो आवाम के दुःख-तकलीफ से कोइ सरोकार ही नहीं होता / और बढ़-चढ़ कर कहे तो यह कहना ज्यादा चोखा होगा कि पिन्चान्वे फीसदी कायदे-क़ानून तो लागू ही इस वजह से है , क्यों कि वो आवाम के दुःख-तकलीफ में काफी कारआमद तरीके से इजाफा करते है / बांकी के कुछ फीसदी कायदे-क़ानून जो सचमुच मुल्क के फायदे के है वो यूं बोलके फ़ायदा वसूली नहीं दे पाते क्यों कि खुद जनता ही उसे प्रोपर तव्वजो नहीं देती और दूसरे बांकी जो कुछ एक फीसदी फायदेमंद कायदा-क़ानून कुल हांसिल जमा बचते है उसे लागू करने के नाम पे खुद निजाम सुस्ती बरतनी शुरू कर देता है / गोया कि वो ही ढ़ाक के तीन पात !   
मूत्र त्याग को लेकर हिन्दोस्तान में अवाम और हुक्मरान दोनों ही किसी भी नजरिये से बहोत ज्यादा गंभीर नजर नहीं आते / जन्हा कंही अदब से पेश आने वाले बाबू लोगो का जुड़ाव होता है वंहा तो बिलायती हिसाबदारे वाले संसाधन खूब मिल जाते है परन्तु दूर-दराज में आज भी पशुवत ही मूत्र त्याग की परम्परा बाबा आदम के हिसाब से जारी है / मै ज्यादा दूर जाकर नहीं देख रहा बल्कि मुल्क की राजधानी दिल्ली की बात कर रहा हूँ / आज भी राजधानी में लोगबाग में खुल्ले घोड़ों की तरह ही जन्हा जैसे चाहे मुंह उठा कर खड़े होते  बेखास्ता देखे जा सकते है /  सिक्के के दूसरे पहलू की निस्बत बात करे तो खुद निजाम ने जो ''जनसुविधा'' के नाम से सुविधाए मुहैय्या करवाई हुई है वो इतनी नाकाफी है कि एक वक्त में एक जोड़ी से ज्यादा लोगबाग हलके नहीं हो सकते / जब कि भतेरी जगहों पर तो लम्बी कतारे दम तोडती ही नहीं दिखती / जो कि मुहैय्या सुविधा की खूब पोल खोलती है /
आईंदा कुछ महीनो बाद  दुनिया तमाम से लोगबाग विश्व स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए जुटने वाले है / तैयारियां जोरशोर से चल रही है , मगर जो विश्व दर्शक का जमौडा आवेगा वो क्या तजुर्बा लेकर जाएगा यह सोच से परे नहीं, यक़ीनन वो हिन्दोस्तान को बेकायदे घोड़ो की तरह मूतते देख नायाब अनुभव हांसिल करेगा / जो आगे उनके मुल्क में हमारे शान में कसीदे पढने के काम आवेगा /
नहीं ज्यादा तो दिल्ली हुकूमत को चाहिए कि वो आवाम में जागरूकता पैदा करने के लिए कुछ अभियान चलाए ताकि लोग बाग़ इस पशुवत और बेहूदा आदत से निजात पा सकें /