Tuesday, March 23, 2010

समाज के दरकते खँडहर से एक और ईट का दरकना !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;





दोस्तों,
फिल्मो में आक्रोश में उबल रहे हीरो को हजारो लाखो बार गरजते-बरसते देखा-सूना था कि हीरो जन्मजात बुरा बनके पैदा नहीं हुआ बल्कि देश-समाज के हालात ने उसे बुरा बनने पर मजबूर किया / मेरे साथ-साथ आपने ने भी सैंकड़ो दफा इस किस्म का धाँसू डायलाग सूना होगा मगर खामखा मुझे आज ये दरयाफ्त करने की ख्वाहिश हुई कि जानू तो सही कि वो कैसे हालात होते होंगे जब कोइ मरा-सा हीरो एकदम से क्यों कर धधकते ज्वालामुखी में तब्दील हो जाता है , मेरा ख्याल है जरूर उसे लोगबाग के सौतेलेपन ने खिजाया होगा , जरूर उसे एक रूपैये कीमत की चीज  आठ रूपैये में खरीदनी पड़ रही होगी , वो नमक के दाम पे शक्कर खरीदने घर से निकला होगा और नुक्कड़ पे वर्षो से किरयाने की दूकान घिस रहे काणे और घाघ बनिए ने मना कर दिया होगा भूल करने से और हमारे हीरो का दिमाग बिगड़ गया होगा और बेकाबू होकर छुरा लेकर बनिए की छाती पर जा बैठा होगा / हीरो ने गुर्रा कर कहा होगा '' लाला ! जान प्यारी नहीं है क्या , नमक की कीमत पर शक्कर ही तो मांग रहा हूँ / कल तक तो इसी कीमत पर शक्कर मिला करती थी आज क्या हो गया कि तू 55 रूपैये किलो मांग रहा है /
हीरो के कमर के निचे दबा पडा लाला अब हीरो को कैसे समझाए कि इसमे उसका क्या कसूर जो मंहगाई ने चीनी के भाव बढ़ा दिए तो /
आप और मै जरूर करके लाला की दलील से इतेफाक रखेगे क्यों कि ये मुनासिब भी है मगर जो हीरो कर रहा है याने उसके जो बगावती हावभाव है , उसे कोइ क्यों कर गलत ठहरावे गा जब कि मंहगाई रोज एक नयी उन्नति दर्ज कर रही है /
ये हमारी खामख्याली हो गी जो हम ये गफलत जोड़ते रहे कि मंहगाई का असर कुल हांसिल जमा हमारे बटुए तक ही पड़ रहा है / नहीं इस मंहगाई का बड़े दूरगामी अंजाम मुल्क और समाज को भुगतने होंगे / ये मंहगाई हमारे सामाजिक ताने बाने को इस हद्द तक तार-तार बिखेर सकती है कि हमारी नस्ले तक कोइ ओर किस्म अख्तियार कर सकती है जिसे हमने ख्यालो में तो छोड़े सपने में भी नहीं सोचा होगा / जिस तरह पैट्रोल और डीजल के दाम बढ जाने पर अपरोक्ष रूप से हर जरूरत की वस्तु को और ज्यादा मंहगा बनाती है , ठीक उसी तरह रोज-रोज बढ़ रही मंहगाई अपरोक्ष रूप से सामाजिक ताने बाने पर भी असर डालती है , कल तक साल में दो दफा बहन-बेटियाँ माँ-बाप के घर आ धमकती थी तो बिदाई में दो साडियों के देने का फर्ज हर कोइ ख़ुशी-ख़ुशी निभाता था पर आज बदलती फिजा में रिश्ते निभाना दोनों तरफ से दुश्वार बन चुका है , इस हिसाब से यदि मैंने कहा कि सामाजिक तानाबाना बिगड़ रहा है तो क्या गलत कहा मुझे बतावे , मेरा दावा है , मंहगाई इन्शानियत देश और समाज के तमाम मौजूदा चहरे को इस कद्दर बदल देने वाली है कि समाज अपने पुरखो की रवायत को छोड़ देगा और यदि कुछ बचे गा तो केवल शैतान , और हाहाकार /
आखिर में एक बात और कहना चाहूंगा कि मुल्क के हुक्मरान किसी मुगालते में ना रहे , क्यों कि ये इस फानी दुनिया की सच्चाई है कि जो जैसा यंहा बोता है वो वैसा काटता भी है , ये क़ानून कायदा आदम और हउआ के जमाने से चलता आ रहा है ये कोइ नयी बात नहीं लिहाजा जिस हुकूमत में काबिज कद्दावर मंत्री खाली हवा में हाँथ उठा कर अवाम से कहते है  कि महंगाई पर हमारा कोइ काबू नहीं ,हम क्या करे / अवाम उनकी बेकशी समझ रहा है और जो समझ रहा है वो उन्हें अर्श से फर्श पर बैठा देगा / ऐसा वो आज ही नक्की समझे /