Friday, March 5, 2010

उड़न-तश्तरी की सेकुलर उड़ान ......[ भाग-२]

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;









 दोस्तों,
अपने फिल्सफे को अभी मै मुख़्तसर बयान भी नहीं कर पाया था कि मेरे एक मुअजीज ब्लोगर दोस्त संजय बेंगानी ने मेरे पिछले पोस्ट पर एक निहायत ही उम्दा टिपण्णी चस्पा कर दी कि जो भी नए ब्लोगर ब्लोगिंग का आगाज करते है वो एक दम से ''उड़न तश्तरी'' ट्रेड मार्क समीर लाल से जा कर चिपट जाते है , शायद क्या यक़ीनन मेरे ये अजीज ब्लोगर दोस्त ये समझाना चाहते है कि नए ब्लोगरो में वो बिलकुल भी उरमा नहीं कि वो खुद के माद्दे पर एक कामयाब ब्लॉग रच सके लिहाजा नए ब्लोगर को जो आसान-सा कामयाबी हांसिल करा सकने वाला और सारी दुश्वारियो से निजात दिलाने वाला सुगम-सा रास्ता दिखता है वो है , सौ मर्ज की एक दवा ''उड़न तश्तरी'' ट्रेड मार्क समीर लाल !
और इस वक्ती लेख में समीर जी को मैंने यदि मुद्दा बनाया है तो वो किसी खुदगर्जी को निगाह में रख किया है या नहीं इस फैसले को लेने का हक़ मै इकलौते काबिल शक्स संजय बेंगानी को मुकरर करता हूँ और पुरजोर मांग करता हूँ कि वो एक इन्साफपसंद आत्मा के बतौर खुद को नुमाया करे और पूरी तसल्ली से मेरे लेख को पढ़े और फिर फैसला दे उड़न तश्तरी की मिशाल मेरे द्वारा इस लेख में देना खुद गर्जी है या लेख के आत्मा की पुकार , और यदि फिर भी वो अपनी टिपण्णी को कायम रखते है तो जो सजा काले चोर की वो मेरी /  
संजय जी जैसे जहीन सोच वाले बन्दे को मै बेहद प्यार करता हूँ मगर ये भी कहूंगा कि उनकी सोच से ईतेफाकिया मै इतेफाक नहीं रखता लिहाजा उनकी टिपण्णी को पूरे तस्बूर से खारिज करता हूँ / उड़न तश्तरी समीर लाल एक आदर्श ब्लोगडीए है , वो हिंदी ब्लॉगडियो के बिच खासुलखास स्टार पोजीशन कब्जाते है /  कंही कोइ एकआधी उनीस-बीस करदिये सकने वाली यदि कोइ बात है ,तो वो है '' स्वामी समीरानन्द '' वाली वाहियात-सी ईमेज जो उनके धीर-गंभीर अक्स को खिलंदरी शक्ल में पेश करता है और उन लोगो की साँसे रोक देता है जो उन्हें जहीन ब्लॉगडीए के तौर पर पसंद करते है ,खैर जो हो मै उस उलटे -पुल्टे ब्लॉग को ईमेज के खातिर में तवजोह नहीं देता,और  हांसिल कुल जमा यह मानता हूँ कि समीर लाल जी एक उम्दा और अनुकर्णीय ब्लॉगडीए है, उन्होंने अपने इकलौते जैनुन ब्लॉग उड़न तश्तरी से ''फलोवर'' नाम का बखेडिया फीचर ही निकाल फेका है क्यों कि ये शातिर उस्ताद ब्लॉगडिया जानता था कि हिंदी ब्लॉगडीए बीमार और भावुक फितरत वाले है , इनकी मानसिकता में वो फराकदिली नहीं कि ब्लोगिया जन्हा के अंदरखाने की नाजुक खुदगर्जी को पचा पाए , याने समीर लाल जी हिंदी ब्लॉगडियो के कमजोर हाजमे को खूब पहचाना कि ये बखेड़ा परे ही रहे और बचा हुआ वक्त कमाई मानकर उन ब्लॉगडियो पर फराकदिली से बतौर टिप्पणीकार खर्च किया जाए जो अभी अभी अपनी ब्लोगिया पारी का आगाज कर रहे है क्यों कि  जो पुराने ब्लॉगडीए है वो जैसे काफिले में जुड़े थे वैसे ही जुदा-जुदा वजूहात अपनी-अपनी उम्र पा कर विदा भी होते जाते है क्यों कि ये ब्लोगिया दुनिया भी तो फानी है और इस फानी ब्लोगिंग जन्हा में एक ही चीज प्रभु राम नाम की मानिद सत्य है और वो वाहिद सत्य है एक लरजती-सी मनमुग्धा '' टिपण्णी '' !
किस नाजुक मुहाने पर, किन हालात के हांथो मजबूर हो कर किस कवी ने ये लिखा कि '' ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर '' ये मै नहीं जानता परन्तु जो मायने समझता हूँ उस लिहाज से ये उक्ति ''उड़न-तश्तरी'' पर बिलकुल फिट बैठती है क्यों कि ''फलोवरशिप'' जैसा बखेड़ा बिलायती ब्लॉगडियो को मुफीद बैठता है क्यों कि वो इसे मंदिर के प्रसाद की मानिद उसे भी बाँटते है जो मांग रहा है और उसे तो बंटते ही है जो नहीं मांग रहा है जब कि हिंदी ब्लॉगडीए ने इस सहज प्राकृतिक गजेट को ना केवल अपनी आन-बान-शान जोड़ लिया बल्कि इसके अलावे कारू के खजाने जैसी हैसियत भी दे दी जो किसी को दे दे तो मानो ये दुनियातमाम उसके कदमो तले चली जाये गी / समीर जी ने हिंदी ब्लॉगडियो की रूगन मानसिकता को खूब पहचाना और अपने ब्लॉग के कामयाबी के हक़ में मुनासिब फैसला लेते हुए ''फलोवरशिप '' जैसे आफत के परकाले को बाहर का रास्ता दिखा दिया /                       
खैर, संजय जी की बाबत मै यूं बोल पडा क्यों की जिस मानसिकता के तहत संजय जी ने टिपण्णी दी बिलकुल उसी ब्लॉगडिया दरिद्रता के बाबत मै अपनी बात कह रहा था /  यदि हिंदी ब्लोगरो को बिलायती ब्लोगरो के मुकाबले में आना है , यदि हिंदी ब्लोगरो को बिलायती ब्लॉगडियो की हैसियत कब्जानी है और सारे जन्हा से उन्च्चा होना है तो हमारे हिंदी ब्लॉगडियो के सामने दो ही रास्ते है /
शेष कथा फिर ....!