Wednesday, February 17, 2010

मीडिया बोले तो .....किशोर आजवाणी उवाच !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;


दोस्तों,
जी जनाब मै उस मुहाने पर खड़े जमौड़े के निस्बत ही बाते कर रहा हूँ जिनके जरिये हमें तमाम किस्म की हलचलों का पता चलता है , और मै उसी बाबत कहरहा हूँ जो हमारे निजाम में व्याप्त लोकशाही की पहरेदारी पुख्ता नेकदिली से अंजाम देते रहने की हूकार भरता है कि वो भी और दूसरे ,मसलन कायदे क़ानून की किताब संविधान, और ईन्साफ देने को आतुर खड़ी अदालत, चुन चुन कर भेजे गए नुमायिन्दो के खिलंदड़े अंदाज की वजह से देश को शर्मसार कर देने वाली कार्यपालिका और इन सब पर डंडा देने को मरा जा रहा वो मीडिया ही तो है जिसके बाबत मै कुछ कहनाचाहता हूँ उससे पहले एक बानगी जरूर गौर फरमाए /
आज दिनांक १८-०२-२०१० को टीवी पर सभी चैनलों पर , तौभी खासुलखास IBN -7  पर एक खबर बारम्बार दुहराई जा रही है की झारखंड में माओ वादियों ने एक बीडियो का अपहरण कर लिया और उसकी रिहाई के लिए मुख्यमंत्री शिबू सोरेन सात माओवादियों को रिहा करने की जुगत भिडा रहे है , कल ये ही खबर इसी चैनल ने दूसरे मायनों के साथ परोसी थी जिसका मुख्तलिफ मतलब ये था की शिबू सोरेन इस कदर गाफिल है कि बीडियो की ब्याहता उनके दरवाजे आकर अपने खाबिन्द की सलामती को तरजीह दिलवाने के खातिर ख़ुदकुशी को उतारू है और दूसरी तरफ एक सूबे का शहंशाह है जो अपने आपे में नहीं / 'राम ने मिलाई जोड़ी एक अंधा दूसरा कोढ़ी' जैसे उम्दा फार्मूले से तैयार शिबू सरकार जो जोरका झटका धीरे से लगे तो भी बिखर जाये गी , एसे खौफ के साए तले हुकूमत चलाने को मोहताज शिबू सोरेन फ़ौरन से पेश्तर उस राह चल पड़े जो किसी जमाने में तब के गृह मंत्री ने अपनी बेटी को बचाने के लिए किया था / आयन्दा मीडिया के हडकाए शिबू क्या गुल खिलाएंगे ये तो वक्त ही बताये गा /
उपरोक्त बयान की दिमाग को भन्ना देने वाली रौशनी में आज हम किशोर आज्वानी के उस भरोसे को कसौटी पर कसते है जिसमे उन्होंने भरोसा जताया कि मीडिया ना तो उधर है और ना ही इधर है , वो तो बिच में है / मै यंहा यह साफ़ साफ़ कहना चाहूँगा कि मै आदमजात पुरखो के उस तजुर्बे से इतेफाक नहीं रखता जिसमे वो कहते है की बिच की स्थिति सदा माखौल का वायस बनती है / यक़ीनन ये वो बिच नहीं है जो मै समझ रहा हूँ या लोग बाग़ समझ रहे है , बल्कि ये वो बिच है जिसे में मीडिया खुद को देखता है , अपने लिए अपनी आँखों से जो देखता है वो ही मुल्क को या दुनिया तमाम को परोसता भी है /
तो फिर, ये हाय तौबा मचा देने तक के नाज नखरे क्यों , ये पहला सच है इस फानी दुनिया का कि पहले हम अपने लिए सचे होते है बाद में दुनिया तमाम आती जाती है / मेरे अलावे श्रीमन किशोर जी ही वो वाहिद शक्स हो सकते है जो शायद ये इतेफाक नहीं रखते की मीडिया आज की तारीख में उस  प्राणघाति डंडे में तब्दील होचुका है जिसके जोर पे मुल्क की मजलूम जनता को छोडिये शर्मायेदारो को भी हडकाया जा सकता है , बतौर नजीर शिबू सोरेन तश्तरी में चांदी की बर्क लगा कर पेश है ही /
फिर मिलते है ..../  
             

महफूज भाई की कातिलाना खूबसूरती !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;




दोस्तों,
अपने सुसंयत भाव और खुशमिजाजी के लिए खूब जाने जानेवाले खुशदीप सहगल जी ने जो सलाहियत भरी बाते बतौर टिपण्णी मुझे लिखी उसे मै अपने सर-माथे लगाता हूँ /
सहगल साब ने जो बाते महफूज जी के बाबत कही उसे सोलह आन्ना सच्च मै भी कबूलता हूँ , इसकी मुझे दरकार नहीं कि मै तस्दीक करता फिरू बल्कि पक्के तौर पर जानता हूँ महफूज एक साहसी और रंधीर शख्सियत है , मगर मै इस हक में नहीं कि नवाबो की तहजीब वाली मशहूर शहर ब्लोगिंग के नाम पर दुनिया में रुसवा होती होतो गमखार बना बैठा रहू क्यों की समूची दुनिया जानती है कि लखनऊ का मतलब है जुबान की मिठास से दिल पर बादशाहत कायम करना और हमारे महफूज भाई वो ही भूल गए , मेरी समझ से ये एक हाहाकारी वाकिया है /
खुशदीप जी ने आखिरी जुमले तक सच्च लिखा कि हमारे इर्दगिर्द लिखने समझने के लिए हजारो हौलनाक मसले मचलते मिल जायेंगे जो देश और समाज की जान खाए जा रहे है मगर मुझ आफत के पुतले ने फिर भी जहमत ये उठाई की किशोर-महफूज की जुगलबंदी पर ही लिखना गंवारा किया तो फक्त इस लिए कि जिस बिंदास अदा से महफूज भाई बेबाक होकर लिख गए उसकी रोकथाम तो होनी ही चाहिए थी और जिस किस्म की रोकथाम किशोर आजवानी कर रहे थे वो किसी भी नजरिये को मुनासिब इन्साफ दर्ज नहीं करती थी लिहाजा मैंने अपना रूख तल्ख़ किया ना की गैर मुनासिब किया / मैंने ये तोहमत नहीं महफूज भाई पर  आयद नहीं की कि महफूज जी ने किशोर जी को अपशब्द कहे बल्कि अपना विरोध ये कहकर दर्ज करवाया कि कान उखाडू टिपण्णी जहर बूझे लफ्जो की मुहताज नहीं /
                                     बांकी रह गयी बात ब्लोगिंग की तो खुलासा करना बेहतर होगा कि दूसरे हजारो ब्लोगरो की तरह ब्लोगिंग मेरा भी सगल ही है ना की रोजीरोटी का जरिया / पिछले दो दशक भी ज्यादा वक्त से बतौर ज्योतिषी के पुरजोर सलाहियत और ईमानदारी से एक ही मुकाम पर टिक कर दो वक्त की रोटी प्रभु का नाम लेकर खा रहा हूँ / ना तो मै इस मुगालते में हूँ की महफूज जी का नाम भज कर ब्लॉग बैतरनी पार कर कारू का खजाना पा जाउंगा , ना ही ये खामख्याली में हूँ कि आज मै किशोर आजवानी की तरफदारी करूंगा तो कल बा-जरिया किशोर आजवानी स्टार न्यूज़ में तिन देवियों वाले प्रोग्राम में अक्ल को बीमार करने वाली मगर दुनिया को अपने हुसन से हैरान परेशान कर देने वाली  उन तिन महिला नजूमियो की जगह मुझे मिल जाए गी / मैंने तो सवाल महज तमीज और तहजीब के बाबत उठाया था जो की मेरे हिसाब से असुबिधा वाली बात जरूर थी /
अंत में , फिर से महफूज जी वाले शिरे पर आता हूँ की मेरी उनकी कोइ जाती अदावत तो है नहीं / मै इतना भी गाफिल नहीं की उनकी उरमा को ना समझू लेकिन ये वाही ताजूब की बात है की उनके जैसा अच्छी तालीम रखने वाला बन्दा क्यों कर भूल करे गा /
थैंक्स/