Tuesday, February 16, 2010

खुद को खूबसूरत मानने वाले महफूज भाई को किशोर आज्वानी से मुआफी मांगनी चाहिए !

www.blogvani.com
शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
''माई नेम इज खान एक बेजोड़ फिल्म है ''
महज इतना ही किशोर आज्वानी ने उचारा था की हमारे ब्लॉग जगत के स्वनाम धन्य शाहरूख खान याने महफूज भाई आपे से बाहर हो गए और रूपक मडोक के तिजारती फितरत की आड़ में मीडिया वालो में खासुलखास स्टार न्यूज को अच्छी-खासी झाड पिला दी, बला की हुनर दिखाते हुए मीडिया वालो को जूठन चाटने वाला भिखारी भी बताने से गुरेज नहीं किया / खुद को चहेता ब्लोगर बताने वाले महफूज जी ने लखनऊ जो तमिज की तहजीब के लिए समूचे दुनिया में जाना जाता है अपनी जुबान से लगाम खूब खुल्ली छोड़ दी और जुबान-दराजी की इन्तहा करते हुए शाहरूख खान को कुत्ता तलक बयान किया , साथ ही शाहरूख खान ने देश के लिए क्या किया जैसा अहम् सवाल भी उठाया जो वो भूल रहे है की भले ही खान इस्लाम की नुमाईंदगी नहीं करते हो या कोइ उसे खारिज करता हो मगर शाहरूख को कंही भी दुनिया में जाकर ये जाहिर करने की जरूरत नहीं कि वो कान्हा के सभ्य समाज की नुमाईंदगी करते है क्यों की वो भारत के समरस और प्रोमिसिंग समाज का आईना है , लिहाजा शाहरूख को कुत्ता बताने बाले को खुद से पहले यह पूछना चाहिए की वो  बेहूदगी भरी बाते ब्लॉग इन कर किस किस्म की हिस्सेदारी भरपाई कर रहे है / उनका अपने देश को छोड़े अपने मशहूर शहर लखनऊ को क्या योगदान दे रहे है , बांकी बाते तो बढ़ चढ़कर बाद में तै कर लेंगे , पहले तो ये ही तै कर ले की वो सारे नहीं महज चंद ब्लोगरो में ही मशगूल या मशहूर है ना की सारे ब्लॉग जगत के ,बांकी दुनिया भर के ब्लोगर का तो नंबर ही नहीं आता  मेरा दावा है भतेरे ब्लोगर तो उन्हें पहचानते भी नहीं होंगे , दस हजार या उससे ज्यादा हिंदी ब्लोगरो की बात तो दूर की है ,किसी जगह मैंने पढ़ा था की महफूज मिया हमारे ब्लॉग जगत के पहले ब्लोगर है यानी सालो से ब्लोगिंग कर रहे है जब की उनके ब्लॉग पर एक भी विदेशी फोलोवर की तस्वीर तक नहीं जो उन्हें कमसकम ये तगमा तो दिलवाता की वो हिन्दुस्तान के बाहर भी जाने जाते है जब की शाहरूख ने  हिन्दुस्तान के बाहर और भीतर दोनों जगह ना केवल पहचान कायम की बल्कि हिन्दुस्तान में बहने वाली उस फिजा के बारे में सारी दुनिया को बताया की वो कितनी सुरक्षित और शेहदमंद है कि एक मुस्लिम भी अपनी बात पूरी ताकत से रख सकता है /
पुनश्च, हिंदी ब्लॉग जगत के स्वनाम धन्य उर्फ़ प्रथम ब्लोगर ने यह भी इतेफाक जाहिर किया की वो शिव सेना से इतेफाक भी रखते है , जो दूसरे लफ्जो में यूं कहा जाये तो वो ये बयान करते है की जैसे शिव सेना देश भक्त है वैसा ही कुछ वो भी है / तो महफूज भाई ये समझ ले की शिव सेना कोइ देश भक्त नहीं वो महज अपने निजी नफे-नुक्सान की बेहतरीन तमीज रखने वाले चंद स्वार्थी लोगो का जमौडा मात्र है , यदि वो देश भक्त और वतन पर कुरवां होने वाले सरफरोश होते तो राज ठाकरे टूटकर जुदा न हुआ होता , ये तो सत्ता लोलुप चंद राजनीतिबाज है जिनके आपसी स्वार्थ आपस में यूं भीड़ गए कि राज ठाकरे को ये लगा की मेरी दाल कभी गले गी ही नहीं तो उसने बिहारियों के खिलाफ अलख जगानी शुरू कर दी / क्या बिहार वाले या उत्तर भारतीय पाकिस्तान से आये है वो भारतीय नहीं है , क्या वो देश भक्त नहीं है आतंकवादी है जो शिव सेना और राजठाकरे लठ्ठ लेकर कुचलने को आमादा है / महफूज भाई आप बताओ आप किस किस्म की शिव सेना या राज ठाकरे से इतेफाक रखते हो , मेरी नजर में देश प्रेमी सिर्फ और सिर्फ एक ही कौम है और वो है हमारे अमर जवान , जो एक इशारे पर भले ही तब आग का दरिया बहता हो , मौत बावलों की तरह अट्टहास कर रही हो मगर हमारे जवान अपने प्राण नौछावर करते देर नहीं लगाते और उन्ही के प्राणोत्सर्ग की कीमत को कायम रखने की मिन्नत समाजत करती है ये फिल्म की हम सभी मिलकर एक रहे /
किशोर आजवानी ने महज खान फिल्म की तारीफ़ ही लिखी ये तो नहीं कहा की पाकिस्तान में बनी किसी चोर उचक्के की फिल्म देख आओ , फिर लोगो ने गिनती करवा दी की फिल्म को सुपर डुपर हिट करवाने का जिम्मा मीडिया का दिया है और तो और यंहा तक कह डाला की मनमोहन सिंह की सरकार को कारन जोहर ने खासुलखास मिशन दिया है की उनकी सरकार और दूसरे हुक्मरान खाली टाईम पास कर रहे हो चलो सदुपयोग करो और खान की फिल्म हिट करवाओ , और जैसे हिन्दुस्तान के हुक्मरान खबास हो चल पड़े हुक्म तामिल करने / मै नहीं समझता की इस बे सीर-पैर के इल्जाम की सफाई किशोर आज्वानी को देने की जहमत उठानी चाहिए /
बांकी ना मै कोइ जिद्द करता और ना ही दस्तूर से इनकार करता हूँ की महफूज भाई को किशोर जी से सौरी नहीं कहना चाहिए /
आमीन !     
        

हम फिर से नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है , क्यों की उपरवाले का कुफ्र है टूटेगा जरूर !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
अब तो जैसे रविवार का दिन ज्यू ज्यू नजदीक खिसकता आता दिखता है वैसे वैसे दिल बैठने सा लगता है , कहने को दिन तो ये छूटी के लिए मुकरर है मगर मशरूफियत असल में अपने उफान पर होती है , हप्ते भर बांकी दिनों की डेली रूटीन किसी भी सूरत में तकलीफदेह ना रहे इसके जुगाड़ में रविवार का सारा वक्त जाया चला जाता है / तक़दीर और देवता भी इस दिन मुंह फेर लिए महसूस हो जाते है जो रविवार को कोइ मुलाक़ात करने चला आये क्यों की यदि आगंतुक की तीमारदारी ना हो तो ये बे-अदवी में गिनती होगी और यदि बे-अदवी करे तो आईंदा सप्ताहंत तक बुरे-बुरे अंजाम भुगतने पड़ेंगे / इससे भी बुरा क्या हो सकता है कि यदि कोइ हादशा रविवार को पेश आ जाए , तो यूं जाने बांकी सातो दिन गयी भैस पानी में /
गत रविवार को यूं लगा मानो दुनिया ने आपना दस्तूर बदल दिया है और पृथ्वी अपनी धुरी पर उलटी घूम रही है / अपने ब्लोक की आवारा कुतिया ने इकठ्ठे आठ दस पिल्लो को ज़ना था / उसकी फलती-फूलती गृहस्थी किसी की आँखों में शूल बने ये भला क्यों कर होता / सो लोगबाग ने कोइ तवज्जो न देनी थी और ना ही दी / मगर कुतिया ने और उसके लिविंग पार्टनर कुत्ते ने पास के पार्क में खेलने जाते तिन चार बच्चो को इस मुगालते में काट खाया की वो उसके पिल्लो के लिए खतरा-ए-जान बन सकते थे / वाकिया चुकी बच्चो की हिफाजत पर सवालिया निशान बनाता था लिहाजा पडौसी सरदार मंजीत सिंह जी ने मीटिंग बुलाली सारे ब्लोक बालो की और यक्ष प्रश्न रखा की कुतिया के आतंक से कैसे महफूज रखा जाए बच्चो को / पुलिस को इतला दी जाए इससे बेहतर सुझाव कोइ ना दे सका,क्यों की दिल्ली नगर निगम कितनी चुस्त-दुरूस्त है ये कोइ कहने की बात नहीं है , अलबता कार्य क्षेत्र और जिम्मेदारी तो उसी की बनती है तो भी ब्लोक वालो को पुलिस वालो पे ज्यादा भरोसा जगा /
भले ही मैंने तहे दिल से सोचा पर नहीं चाहता था की पुलिस को ये ब्योरा मै परोसू , पर मुसीबत जो आनी थी वो बा-कायदा पैर जमा कर घर बैठ चुकी थी अब तो केवल उसे भुगतना भर था जो की मैंने भुगती भी / पर क्या हुआ जो अंजाम ठाकरे बनाम शाहरूख खान का हुआ वो ही ब्लोक के आतंक का हुआ याने टाँय-टाँय फिस्स !
मैंने सरदार जी के तकादे के जोर से तिन बार कुतिया और कुत्ते के सिरफिरे होने की रिपोर्ट दर्ज करायी और खूब मिन्नत-समाजत की पर आज तीसरा चोथा दिन बितने को आया कोइ साबूत पुलिस छोड़ो उस नामकी चिड़िया तक झांकने नहीं आई / हार कर मैंने नगर निगम का दरवाजा खटखटाने जैसा दोहरा करदेने वाला रास्ता भी आजमाया पर शकुन पैदा कर सकने वाले आसार अभी भी नदारद है और     
वो कुत्तिया आज भी वैसी की वैसी चौड़ी छाती किये गफलत में शिकार दर शिकार किये जा रही है और हम फिर से एक नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है क्यों की उपरवाले का कुफ्र है तो टूटेगा जरूर !