Friday, June 25, 2010

दोनों ही रास्ते दोजख में जाकर खुलते है !

www.blogvani.com शाशिभूषणतामड़े उवाच;

 





दोस्तों,
मेरे अजीज दोस्तों की फेहरिस्त ,जो काफी लम्बी चौड़ी है , में जोशी जी का रूतबा बिलकुल अलहद और सबसे ऊँचा मगर प्यार भरा है /
वो जमुना पार बसते है / हमारा याराना कोइ पंद्रह सालो से फलता-फूलता आ रहा है / घर में ऊपर वाले की खूब मेहर है / घर में तजुर्बेकार माँ और सुगढ़ विचारों वाली पत्नी से दो बेटियां और एक आज्ञाकारी पुत्र है जो दुनियादारी भी खूब जानता बुझता है / याने कुल हांसिल जमा जोशी जी को गृहस्थी का सुख पुरे अहतराम से ऊपर वाले ने बक्शा है / बेहतर आमदनी के जोर पर जोशी जी ने बच्चो को बेहतर तालीम दिलवाने में कोइ क़सर नहीं छोड़ी / ताकतवर कोशिशो के सिले के तौर पर उनका छोरा और बड़ी वाली छोरी दोनों उच्चे ओह्द्दो पर नामचीन कंपनियों में अपनी रिजक कमा रहे है / याने जोशी जी खुश-खुश थे /
मगर किस्मत ने गुल कुछ यूं खिलाया कि सभी के होश फाकता हो गए /
एक सुबह जोशी जी का फोन आया कि छोटी वाली छोरी मधु [ काल्पनिक ] पिछली रात से गायब है /
यह बड़ी चौकाने वाली और होश गुम करने वाली बात थी / मुझे बड़ा सदमा लगा /
एक दिन और बड़ी भारी दुश्वारी के साथ काटने के बाद पुलिसिया कार्यवाही चलू कर दी गयी /
तीन महीने बड़े हाहाकारी गुजर गए मगर छोरी का कुछ पत्ता नहीं चला /
बाद में , मधु यकायक किसी तिल्स्मायी अंदाज में जैसे जादू के जोर से एक रेडीमेड ''प्यार'' के साथ प्रकट हुयी और वो भी कचहरी में / उसने बड़े दिलथाम लेने वाले अंदाज में जज साहेब को बताया कि वो उस अजिमोशान लडके से प्यार में गिरफ्तार है जो किसी और कौम से ताल्लुक रखता है और वो उस लडके से शादी करने की ख्वाहिशमंद है मगर उसे डर है कि उसके घर वाले इस मामले में उसकी पुरजोर मुखालफत करेंगे /

जोशी जी के साथ हम सभी मधु के खुदगरजी भरे व्यवहार से हतप्रभ थे / कचहरी में हाकिम के सामने पेश होने से पहले जोशी जी की एक छोटी सी मुलाक़ात अपनी बेटी से वही कचहरी में हुयी थी जो बहोत ही मर्म स्पर्शी और दिल को तोड़कर रख देने वाली थी /

रोते-रोते एक पिता ने बेटी से पूछा -'' तूने ये सब क्यों किया !''
जवाब में वो खामोश थी और लगातार उसे देख कर जारजार रो रही अपनी माँ से भी वो आँखे चुरा रही थी , जैसे उसे डर था कि माँ के आंसू कंही उसके अभियान को कमजोर ना कर दे / तभी जोशी जी ने दूसरी दलील रखी-'' तू ये तो सोंच कि तेरे इस कदम के बाद हम लोगो के बिच कैसे जा सकेंगे / अगर ये भी नहीं तो ये तो देख कि तेरी और उसके लड़के की संस्कृति दो जुदा किस्म की है , तुम दोनों में से किसी ना किसी को तो सब कुछ छोड़ना ही पड़े गा क्यों कि तुम्हारे लिए समाज का चलन नहीं बदल जाए गा , लिहाजा जो बेहतर लगे वो फैसला लो /
मधु वक्ती तौर पर खामोश रही और जोशी जी के सवालों का जवाब उसने जज साहेब के सामने अपनी शादी का प्रस्ताव रख कर दे दिया जिसकी प्रतिक्रिया में जोशी जी ने ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा -'' शशि जी , मै तो बर्बाद हो गया भाई , मेरी सारी तपस्या , जीवन भर की कमाई वो अजनबी डाकू लुट ले गया /
मै इस लूट खसोट की दास्ताँ को रोमांचक प्रेम प्रसंग की चासनी में डुबो कर आपको नहीं परोसना चाहता / बल्कि यह इंगित करना चाहता हूँ कि कैसे कोइ संतान अपने पैदा करने वाले और पालने-पोसने वालो को बिच मझधार में छोड़कर जैसे जी चाहे छोड़कर मन चाहा फैसला थोप सकता है / ये तो हमारे सरल स्वभाव जोशी जी थे जो अपना सर रो पीट कर चुप कर बैठ गए / ज़रा कुछ जोर लगा कर कल्पना करे कि जोशी जी की जगह एक ऐसा बाप होता जो सर्व-शक्तिमान होता और वो तमंचा हाँथ में लेकर मधु और उसके अजीमो शान राजकुमार को जा कर दो-दो गोलिया खोपड़ियो में फोड़ आता तो क्या होता !
यही ना कि दूसरे दिन टीवी और अखबार में फिर एक नयी होनर किलिंग की दास्ताँ सामने होती और क्या /
मेरे विचार में फिल्मो ने नयी पीढ़ी को वाहियात प्यार को खुदा से उच्चा बताया और नौ-जवानो को भटकने के राह सुझा दी तो सामर्थ रखने वाले अभिभावकों ने अब होनर किलिंग की राह चुनी है / जबकि दोनों ही रास्ते आगे जाकर दोजख में खुलते है /          

     

5 comments:

khuljaasimsim said...

प्रिय मित्र शशि जी
नमस्कार !
बड़ा ही सुन्दर लेख दिया है आपने , इसके लिए बधाई देता हूँ /
एक उतेजक प्रश्न आज समाज के आगे खड़ा है जिसमे अभिभावक और नौ जवान पीढ़ी युद्ध की मुद्रा में मोर्चे पर आ डटी है /
जहा एक ओर अभिभावक प्रतिशोध के लिए उधत है वही युवा पीढ़ी अपनी मनमानी पर उतारू है / क्या यह समाज के विघटन की पूरब सूचना नहीं है / क्यों कि जहा एक ओर अभिभावक अपने किये हुए कर्तव्य को युवा पीढ़ी द्वारा नकार दिए जाने से क्रोधित है और गम खाकर चुप बैठने की जगह हिंसा की राह चुन रही है और बदले में अपने ही हांथो को खुद के खून से रंग रही है वही युवा पीढ़ी अपनी अंग्रेजी दा शेखी के पीछे पागल हो रही है / अब तो समाज के दो महत्वपूर्ण वर्गो का टकराव ऊपर वाला ही रोक सकता है / आपने दुखती रग़ पर हाँथ रख कर लोगो का ध्यान इस मुद्दे पर खींचा यह सराहनीय है / धन्यवाद /

S B Tamare said...

प्रिय मन मोहन जी,
यथायोग्य !
आपके सराहना पूर्ण टिपण्णी के लिए और हौसला-अफजाई के लिए थैंक्स /
जैसा कि आप भी जानते है कि यह लेख मैंने सच्ची घटना से प्रेरित हो कर लिखा है लिहाजा वाकई यह एक खेद का विषय है की समाज के दो आधार स्तंभों में युद्ध की नौबत आ गयी है जो कि यक़ीनन दुर्भाग्य पूर्ण है /
अर्थ भरी टिपण्णी के लिए फिर से थैंक्स/

madhu said...

सुन्दर रचना !
यह सच में बुरे भविष्य की और संकेत है कि दो पीढियां खुलकर आमने सामने आ खड़ी हुयी है /
अच्छे आलेख के लिए धन्यवाद/

Sonal said...

hi,
aapne bahut hi khoobsurati se likha hai ...bahut sundar lekh hai..

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Anonymous said...

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