Friday, March 12, 2010

बवासीर ! रूला देने वाला बे-रहम रोग और उसकी दवा !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;












 दोस्तों,
एक दफा तो कोइ भी बुरे-से-बुरे करतब की तोड़ दुनिया में खोजे तो मिल जाए गी परन्तु एक नामाकूल बेहूदी बिमारी है
बवासीर जो एक दफा किसी के गले पड़ जाए तो समझे नसीब ही फूट गए उस निरीह प्राणी के / ये मर्ज उस लूसडे की मानिद है जो चिपक जाए तो खिजा -खिजा के प्राण हरण करता है / इस मर्ज का आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जो माकूल जवाब है वो है आपरेशन जो कि बहुतेरी दफा एक बार में मुकमल जवाब नहीं साबित होता / बहूदा कितने ही बदनसीब ऐसे भी मिल जाते है जिनपे ये नामुराद रोग आपरेशन के बावजूद दूसरी दफा भी  गाज बनके टूटता है और इससे भी आगे जाने कि किसी के सारे देवी-देवता मुंह फेर कर नाराज बैठे हो तो तिसरी दफा भी आपरेशन की नौबत आ पड़ती है  जो कि भारी दुश्वारी , जलालत और बे-इन्तहा दर्द का बायस साबित होती है / मरीज जो इस रोग को हर दिन और हर पल झेल रहा होता है आठ-आठ आंसू उस जगह बैठ कर बहाता है जिस जगह को पैखाना कहते है और जन्हा एक निरोगी प्राणी कुछ मिनटों से ज्यादा किसी सूरत में ठहरना नहीं कबूलता , वैसी आला जगह पर रोगी घंटो बैठ कर जारजार रोता है और मारे बे- इन्तहा तकलीफ के खुद को बनाने वाले से मौत मांगता नजर आता है  परन्तु तब जब कि ये रोग अपने पूरे जलाल से रूष्ट चल रहा हो और वर्षो से अपनी जड़े जमा चुका हो तो ऊपर वाला भी वो सुभीता रोगी को नहीं मंजूर करता जो वो रोग से छुटकारे के तौर पर मौत की शक्ल में मांग रहा होता है /
बेखास्ता गुदा द्वार से बहता खून और कट फट चुकी गुदे द्वार की रक्त शिराए मरीज के साहस को चुक जाने पर मजबूर कर देती है / मारे दर्द के तीन त्रैलोक्य और छतीस करोड़ देवी-देवताके प्रत्यक्ष दर्शन हो जाते है /
मै, बा-कलम खुद, इस ना-मुराद रोग की गिरफ्त में रहा और रिस-रिस कर तड़पा हूँ और वो भी पूरे दस वर्ष !
खुश नसीबी ये रही कि मैंने आपरेशन से परहेज बरता और अंग्रेजी दवा से भी दूरी कायम रखी अलबता जब कभी दर्द की बर्दास्तगी दगा दे गयी तो पेनकिलर जरूर लिया / इस रोग का शुभारम्भ तब हुआ जब मै एक अकेला दिल्ली शहर में अपने लिए ठहराव तलाश रहा था लिहाजा खानपान की दुश्वारियो से भी गुजरना पड़ था जो बाद में इस रोग के लिए माकूल बजह साबित हुयी /
इस रोग ने मुझे बहुत कुछ दिया , जो दर्द और दुश्वारियो से ज्यादा बहुत कुछ था / मैंने इस रोग की शक्ल में मौत का खूबसूरत चेहरा भी पहचाना जो बाबा रामदेव के योगिक तौफे के तौर पर जिंदगी से यूं गुथ गया कि जिंदगी का आमूलचूल कायाकल्प हो गया  /
मै बाबा रामदेव के कदम चूम कर शुक्रिया कहना चाहूंगा जो वो देवदूत कभी मेरे सामने पड़े तो !
आगे मै वो दवा बयान कर रहा हूँ जो मैंने इस नाशपिट्टे रोग को शमन करने के लिए इस हाहाकारी चिकित्सा दुनिया से बतौर हीरे जवाहरात जैसी कीमती वस्तु की शक्ल में जमा किये है / सभी दवा आयुर्वेदिक है लिहाजा नुक्सान का तो सवाल ही नहीं उठता और फायदे की गारंटी सौ फीसदी है /
१.पायरायड , २. अर्शोध्नी बटी, ३.अर्श कुठार रस , ४.सप्त विन्सती गूगुल, और ५. आरोग्य वर्ध्नी वटी /
ये पांचो आयुर्वेदिक दवा की एक-एक टेबलेट चबा कर गर्म पानी के साथ सुबह खाली पेट निगले और रात को भोजन के बाद गर्म मीठे दूध के साथ चबा कर निगले  फिर दूध के साथ ही सब्गोल एक दो चमच्च भी ले ताकि पेट साफ़ रहे /
कुछ और भी फायदे मंद बाते है जो अपनाई जाए तो शिग्र लाभ मिले गा / मसलन सुबह बाथरूम जाने से पहले गुन्न्गुन्ना पानी चार पांच गिलास पिए / चाय, चावल,मिर्च ,तेल और तली वस्तुओ से परहेज करे / गुटका , तम्बाकू या दूसरी बुरी आदतों से बचे / साथ ही यदि संभव हो तो बाबा रामदेव के बताये कपालभाति और प्राणयाम भी दवा लेने के बाद एक या आधे घंटे जरूर करे / मेरी शर्त है आप से कि यदि आपको ये नामुराद रोग है तो जड़ से नष्ट हो जाए गा बस लगातार स्वस्थ होने बाद भी कमसेकम तिन महीनो तक दवा का सेवन करते रहे ताकि बिमारी
फिर कभी लौट के ना आये /
पुनश्च, दवा के बाबत यदि कुछ पूछना चाहे तो ई-मेल करे - sbtamre@gmail.com     
     

5 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

आपकी हिम्मत की दाद देता हूं कि ऐसे रोग के बारे में बेबाकी से लिख पाए हैं आप.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

नुस्खा नोट कर लिया है प्रभु! अजी अपने लिए नहीं...हम तो ऊपरवाले की कृ्पादृ्ष्टि से बचे हुए हैं इस नामूराद बिमारी से। कभी किसी ओर को जरूरत पड जाए तो बता देंगें आपका नाम लेकर...कम से कम दुआऎं तो देगा।

डॉ महेश सिन्हा said...

बीमारी का नाम बवासीर है

S B Tamare said...

जनाब !
डाक्टर सिन्हा जी !
''सिलिप ऑफ़ पेन '' पर ध्यान दिलाने का शुक्रिया, भूल सुधार ली है , बवासीर को बाबाशिर लिखने की एक वजह ये भी थी कि एक समय था जब इस नामुराद मर्ज ने जमकर दुनिया के आगे मेरा माखौल उड़ाया था लिहाजा इसका नाम बिगाड़ कर कुछ तो गम गलत हुआ ही बांकी छाती में लगी आग भले ही ना ठंडी हुयी हो /
पुनश्च, टिपण्णी के लिए शुक्रिया बोलता हूँ !

shama said...

Achhee jankaree mili...!