Wednesday, March 31, 2010

गधे के पूत , यंहा मत मूत !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;














दोस्तों  !

अभी दो दिन पहले मैंने दो भले लोगो को दस्तूर से अलग मसले पर रगडा करते देख बेहद ताज्जुब में पड़ गया /
तस्दीक करने पर मालूम हुआ कि पहले वाले भद्र पुरूष उस जगह मूत्र त्याग करते रंगे हांथो पकडे गए जन्हा दूसरे वाले भद्र इन्शान ने बेहद खुल्लासा लफ्जो में लिखवा दिया था कि '' गधे के पूत,यंहा मत मूत !''
आप अचम्भित ना हों क्यों कि हिन्दोस्तान के गुजस्ता वक्त में ''मूतने''को लेकर बड़े बड़े बखेड़े खड़े हुए हुए है / मसलन अत्री ऋषि को ही लेले उन्होंने चुलू में उठा कर समुन्द्र पान कर दिया और बाद में हाहाकार मच जाने पर मूतने बैठे तो जाके समुन्द्र की जान में जान आई /
एक दूसरा बखेड़ा रावण और भोलेशंकर के बिच पैदा हुआ कि जब रावण शिव को लंकापुरी में निवासी बनाने की गरज से अपने सीर पर बैठा कर चला तो राह में रावण ने शिद्दत से मूत्र बेग महसूसा और शिवलिंग किसी को पकड़ा कर खुद मूत्र त्यागने बैठ गया / वो बैठा तो बैठा ही रह गया / थक कर दूसरे बन्दे ने शिवलिंग वन्ही जमीं पर रख छोड़ा जो आज मशहूर तीर्थ बैद्यनाथ धाम है /
याने मूत्र त्याग के नाम पे भी बड़े बड़े गुल खिल जा सकते है / अलबता यह एक सहज इन्शान की जिस्मानी जरूरत है / जो समयानुसार दोहराए जाने की जरूरत होती है / मगर यह सहज क्रिया यदि दुश्वारियो की गिरफ्त में आ जाए या बाधाओ से घिर जाए तो लेने के देने पड़ जाते है / यह जिस्मानी जरूरत कई एक दफा निहायत ही दर्दनाक तजुर्बे करवा देती है / कई दफा किडनी और प्रोस्ट्रेट जैसे अहम् शारीरिक पुरजो के बिगड़ जाने पर मूत्र त्याग में दिक्कते पैदा हो जाती है मगर मौजूदा मेरे इस लेख का उन हौलनाक बिमारी से कोइ वास्ता नहीं है मै तो उन हालातो के बाबत बाते कर रहा हूँ जो निषेधाज्ञा वाले इलाके में जबरन मूतने से पैदा हो जाती है / गाहेबगाहे आपने कंही भी आते जाते निम्न किस्म के खूबसूरत श्लोक दीवारों पर लिखे देखे होंगे कि यंहा मूतना मना है / उक्त मायने वाले निषेधाज्ञा श्लोक यदि कारामद तरीकों से असर नहीं दिखला पाते तो आजिज आया हुआ बन्दा नाराज हो कर यूं भी लिख डालता है कि ''देखो ! देखो ! गधा पेशाब कर रहा है / या फिर यूं लिखा मिलता है कि ''गधे के पूत , यंहा मत मूत !

आखिरी दोनों बयानों में लिखने वाले की चिढ बेखास्ता झलकती है याने कि वो लाख समझाने के बावजूद लोगबाग द्वारा निर्दिष्ट जगह पर मूत्र त्याग जैसा नेक इरादा नहीं टालते देख निषेध कर्ता लिखने पर मजबूर हो जाता है कि -'' देखो ! देखो ! ....या ....यंहा मत मूत .../
हिन्दोस्तान में हुकूमत जिन कायदे-क़ानून के बुनियाद पर अपने निजाम को अंजाम देता है उसमे ज्यादातर, या यूं कहे उम्मीदन पिन्चान्वे फीसदी कायदे-क़ानून को तो आवाम के दुःख-तकलीफ से कोइ सरोकार ही नहीं होता / और बढ़-चढ़ कर कहे तो यह कहना ज्यादा चोखा होगा कि पिन्चान्वे फीसदी कायदे-क़ानून तो लागू ही इस वजह से है , क्यों कि वो आवाम के दुःख-तकलीफ में काफी कारआमद तरीके से इजाफा करते है / बांकी के कुछ फीसदी कायदे-क़ानून जो सचमुच मुल्क के फायदे के है वो यूं बोलके फ़ायदा वसूली नहीं दे पाते क्यों कि खुद जनता ही उसे प्रोपर तव्वजो नहीं देती और दूसरे बांकी जो कुछ एक फीसदी फायदेमंद कायदा-क़ानून कुल हांसिल जमा बचते है उसे लागू करने के नाम पे खुद निजाम सुस्ती बरतनी शुरू कर देता है / गोया कि वो ही ढ़ाक के तीन पात !   
मूत्र त्याग को लेकर हिन्दोस्तान में अवाम और हुक्मरान दोनों ही किसी भी नजरिये से बहोत ज्यादा गंभीर नजर नहीं आते / जन्हा कंही अदब से पेश आने वाले बाबू लोगो का जुड़ाव होता है वंहा तो बिलायती हिसाबदारे वाले संसाधन खूब मिल जाते है परन्तु दूर-दराज में आज भी पशुवत ही मूत्र त्याग की परम्परा बाबा आदम के हिसाब से जारी है / मै ज्यादा दूर जाकर नहीं देख रहा बल्कि मुल्क की राजधानी दिल्ली की बात कर रहा हूँ / आज भी राजधानी में लोगबाग में खुल्ले घोड़ों की तरह ही जन्हा जैसे चाहे मुंह उठा कर खड़े होते  बेखास्ता देखे जा सकते है /  सिक्के के दूसरे पहलू की निस्बत बात करे तो खुद निजाम ने जो ''जनसुविधा'' के नाम से सुविधाए मुहैय्या करवाई हुई है वो इतनी नाकाफी है कि एक वक्त में एक जोड़ी से ज्यादा लोगबाग हलके नहीं हो सकते / जब कि भतेरी जगहों पर तो लम्बी कतारे दम तोडती ही नहीं दिखती / जो कि मुहैय्या सुविधा की खूब पोल खोलती है /
आईंदा कुछ महीनो बाद  दुनिया तमाम से लोगबाग विश्व स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए जुटने वाले है / तैयारियां जोरशोर से चल रही है , मगर जो विश्व दर्शक का जमौडा आवेगा वो क्या तजुर्बा लेकर जाएगा यह सोच से परे नहीं, यक़ीनन वो हिन्दोस्तान को बेकायदे घोड़ो की तरह मूतते देख नायाब अनुभव हांसिल करेगा / जो आगे उनके मुल्क में हमारे शान में कसीदे पढने के काम आवेगा /
नहीं ज्यादा तो दिल्ली हुकूमत को चाहिए कि वो आवाम में जागरूकता पैदा करने के लिए कुछ अभियान चलाए ताकि लोग बाग़ इस पशुवत और बेहूदा आदत से निजात पा सकें /   

Thursday, March 25, 2010

लाडली नगर बधू के नखरे हजार उठाये कौन १

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;

दोस्तों,
वो चाहे अच्छाई हो या फिर बुराई !
पर यदि वो, चाहे या अनचाहे ,हमारे शख्शियत से जुड़ गयी है तो एक वक्त ऐसा भी आता है जब वो अच्छाई या बुराई हमारे जी का जंजाल भी साबित हो जाती है क्यों कि लोगबाग उसी के आदि बन चुके होते है और जब उस की कमी खलती है तो बैचैनी पैदा होती है / मसलन दिल्ली मैट्रो ट्रेन को ही लेले / राजधानी वालो को ही क्यों समूचे हिन्दोस्तान के लिए ये आन बान और शान का मामला है दिल्ली मैट्रो , मुल्क का हर बाशिंदा इस सहूलियत पर इतरा सकता है / मैट्रो का सफ़र हर सवार मुसाफिर को इतराने का मौक़ा देता है जो वो ये महसूस सके कि बिलायती मुल्को के मुकाबले में हम हिन्दोस्तानी भी कम नहीं /
पीछे मेरे एक दोस्त ने बातो-बातो में मैट्रो के बाबत जो ख्याल बयान किये वो मेरे दिल को छू गए , यदि मै कोइ कवी या शायर होता तो उस बयान को भली तरह से बोलो में गूँथ कर आपके आगे परोसता , पर जो हो , मै वो तमाम बाते ज्यू की त्यु आपके आगे रखता हूँ -
मैट्रो तू मेरी राहते उसांस है /
मैट्रो तू मेरे फ़ौरन घर वापसी की इकलौती आस है /
मैट्रो तू मेरे बटुए की दांतदार चैन है / जो सदा मजबूती से बंद होती है /
मैट्रो तू दम तोड़ते पर्यावरण की संजीवनी बूटी है /
मैट्रो तू घर के बिगड़ते बजट में वो जोकर है जो हर पत्ते के साथ फिट है /
मैट्रो तू दिल्ली की इकलौती लाडली नगर बधू है, जो हर मुसाफिर चहेते को फ़ौरन गोद में लेकर ठंडा-ठंडा कूल कूल कर देती जैसे बीबी उसकी अपनी हो /
और ना जाने क्या क्या मेरे उस मित्र ने बयान किया पर जो लाबोलुआब था वो ये ही था कि मैट्रो में सवार मुसाफिर सफ़र खत्म होने तक तो यक़ीनन इसी ख्याल में ग़ुम हो जाता है कि वो किसी पराये बिलायती मुल्क में आ पंहुचा है / इसकी साफ़ सफाई ,चुस्ती और चाक-चौबंदगी  आला दर्जे की है  और इसकी इन्ही खसूसियत की वजह से मैट्रो दिल्ली वालो की लाडली बहू बनी है / जब मैट्रो नहीं थी तो ब्लू लाईन,वाईट लाईन और ना जाने किन किन कर्मजली लाईनों ने दिल्ली वालो को आठ-आठ आंसू रुलाया था जिसे याद करके रूह फन्ना जाती है / खैर , बिल्ली के भाग से छिक्का टूटा , मैट्रो आई और इस लाडली बहू ने खूब दिल्ली बालो का दिल जित लिया मगर ना जाने क्यों इधर जब तब इसका खुशगंवार मिजाज एकदम से बिगड़ जाता है और जब जन्हा जैसे भी रूठकर खड़ी होजाती है /
और बहाना होता है '' यात्रा में रूकावट का हमें खेद है !
एक विश्व स्तरीय व्यवस्था बनने के लिए भरोसे की अग्नि परीक्षा में मैट्रो को नाकामयाब होने की इजाजत कोइ भी नहीं देगा अलबता सौ फीसदी कामयाबी ना सही पर फिर भी त्रुटी हिन् तो बनना ही चाहिए और ये प्रयास पूरी नेकनीयती से हो यही हम चाहते है /
और अंत में कहूंगा -
गमखार है हम , गमो ने हमें संवारा है !
तुम नाहक थक जाओगे ,टूट जाओ गे , बिखर जाओगे !
ये शीशे का महल तुम्हारा है !
पत्थर है हम नाजाने कभी से /
ना टक्कराओ , अभी दामन तुम्हारा कुंवारा है !


 

Tuesday, March 23, 2010

समाज के दरकते खँडहर से एक और ईट का दरकना !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;





दोस्तों,
फिल्मो में आक्रोश में उबल रहे हीरो को हजारो लाखो बार गरजते-बरसते देखा-सूना था कि हीरो जन्मजात बुरा बनके पैदा नहीं हुआ बल्कि देश-समाज के हालात ने उसे बुरा बनने पर मजबूर किया / मेरे साथ-साथ आपने ने भी सैंकड़ो दफा इस किस्म का धाँसू डायलाग सूना होगा मगर खामखा मुझे आज ये दरयाफ्त करने की ख्वाहिश हुई कि जानू तो सही कि वो कैसे हालात होते होंगे जब कोइ मरा-सा हीरो एकदम से क्यों कर धधकते ज्वालामुखी में तब्दील हो जाता है , मेरा ख्याल है जरूर उसे लोगबाग के सौतेलेपन ने खिजाया होगा , जरूर उसे एक रूपैये कीमत की चीज  आठ रूपैये में खरीदनी पड़ रही होगी , वो नमक के दाम पे शक्कर खरीदने घर से निकला होगा और नुक्कड़ पे वर्षो से किरयाने की दूकान घिस रहे काणे और घाघ बनिए ने मना कर दिया होगा भूल करने से और हमारे हीरो का दिमाग बिगड़ गया होगा और बेकाबू होकर छुरा लेकर बनिए की छाती पर जा बैठा होगा / हीरो ने गुर्रा कर कहा होगा '' लाला ! जान प्यारी नहीं है क्या , नमक की कीमत पर शक्कर ही तो मांग रहा हूँ / कल तक तो इसी कीमत पर शक्कर मिला करती थी आज क्या हो गया कि तू 55 रूपैये किलो मांग रहा है /
हीरो के कमर के निचे दबा पडा लाला अब हीरो को कैसे समझाए कि इसमे उसका क्या कसूर जो मंहगाई ने चीनी के भाव बढ़ा दिए तो /
आप और मै जरूर करके लाला की दलील से इतेफाक रखेगे क्यों कि ये मुनासिब भी है मगर जो हीरो कर रहा है याने उसके जो बगावती हावभाव है , उसे कोइ क्यों कर गलत ठहरावे गा जब कि मंहगाई रोज एक नयी उन्नति दर्ज कर रही है /
ये हमारी खामख्याली हो गी जो हम ये गफलत जोड़ते रहे कि मंहगाई का असर कुल हांसिल जमा हमारे बटुए तक ही पड़ रहा है / नहीं इस मंहगाई का बड़े दूरगामी अंजाम मुल्क और समाज को भुगतने होंगे / ये मंहगाई हमारे सामाजिक ताने बाने को इस हद्द तक तार-तार बिखेर सकती है कि हमारी नस्ले तक कोइ ओर किस्म अख्तियार कर सकती है जिसे हमने ख्यालो में तो छोड़े सपने में भी नहीं सोचा होगा / जिस तरह पैट्रोल और डीजल के दाम बढ जाने पर अपरोक्ष रूप से हर जरूरत की वस्तु को और ज्यादा मंहगा बनाती है , ठीक उसी तरह रोज-रोज बढ़ रही मंहगाई अपरोक्ष रूप से सामाजिक ताने बाने पर भी असर डालती है , कल तक साल में दो दफा बहन-बेटियाँ माँ-बाप के घर आ धमकती थी तो बिदाई में दो साडियों के देने का फर्ज हर कोइ ख़ुशी-ख़ुशी निभाता था पर आज बदलती फिजा में रिश्ते निभाना दोनों तरफ से दुश्वार बन चुका है , इस हिसाब से यदि मैंने कहा कि सामाजिक तानाबाना बिगड़ रहा है तो क्या गलत कहा मुझे बतावे , मेरा दावा है , मंहगाई इन्शानियत देश और समाज के तमाम मौजूदा चहरे को इस कद्दर बदल देने वाली है कि समाज अपने पुरखो की रवायत को छोड़ देगा और यदि कुछ बचे गा तो केवल शैतान , और हाहाकार /
आखिर में एक बात और कहना चाहूंगा कि मुल्क के हुक्मरान किसी मुगालते में ना रहे , क्यों कि ये इस फानी दुनिया की सच्चाई है कि जो जैसा यंहा बोता है वो वैसा काटता भी है , ये क़ानून कायदा आदम और हउआ के जमाने से चलता आ रहा है ये कोइ नयी बात नहीं लिहाजा जिस हुकूमत में काबिज कद्दावर मंत्री खाली हवा में हाँथ उठा कर अवाम से कहते है  कि महंगाई पर हमारा कोइ काबू नहीं ,हम क्या करे / अवाम उनकी बेकशी समझ रहा है और जो समझ रहा है वो उन्हें अर्श से फर्श पर बैठा देगा / ऐसा वो आज ही नक्की समझे /                           

Friday, March 12, 2010

बवासीर ! रूला देने वाला बे-रहम रोग और उसकी दवा !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;












 दोस्तों,
एक दफा तो कोइ भी बुरे-से-बुरे करतब की तोड़ दुनिया में खोजे तो मिल जाए गी परन्तु एक नामाकूल बेहूदी बिमारी है
बवासीर जो एक दफा किसी के गले पड़ जाए तो समझे नसीब ही फूट गए उस निरीह प्राणी के / ये मर्ज उस लूसडे की मानिद है जो चिपक जाए तो खिजा -खिजा के प्राण हरण करता है / इस मर्ज का आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जो माकूल जवाब है वो है आपरेशन जो कि बहुतेरी दफा एक बार में मुकमल जवाब नहीं साबित होता / बहूदा कितने ही बदनसीब ऐसे भी मिल जाते है जिनपे ये नामुराद रोग आपरेशन के बावजूद दूसरी दफा भी  गाज बनके टूटता है और इससे भी आगे जाने कि किसी के सारे देवी-देवता मुंह फेर कर नाराज बैठे हो तो तिसरी दफा भी आपरेशन की नौबत आ पड़ती है  जो कि भारी दुश्वारी , जलालत और बे-इन्तहा दर्द का बायस साबित होती है / मरीज जो इस रोग को हर दिन और हर पल झेल रहा होता है आठ-आठ आंसू उस जगह बैठ कर बहाता है जिस जगह को पैखाना कहते है और जन्हा एक निरोगी प्राणी कुछ मिनटों से ज्यादा किसी सूरत में ठहरना नहीं कबूलता , वैसी आला जगह पर रोगी घंटो बैठ कर जारजार रोता है और मारे बे- इन्तहा तकलीफ के खुद को बनाने वाले से मौत मांगता नजर आता है  परन्तु तब जब कि ये रोग अपने पूरे जलाल से रूष्ट चल रहा हो और वर्षो से अपनी जड़े जमा चुका हो तो ऊपर वाला भी वो सुभीता रोगी को नहीं मंजूर करता जो वो रोग से छुटकारे के तौर पर मौत की शक्ल में मांग रहा होता है /
बेखास्ता गुदा द्वार से बहता खून और कट फट चुकी गुदे द्वार की रक्त शिराए मरीज के साहस को चुक जाने पर मजबूर कर देती है / मारे दर्द के तीन त्रैलोक्य और छतीस करोड़ देवी-देवताके प्रत्यक्ष दर्शन हो जाते है /
मै, बा-कलम खुद, इस ना-मुराद रोग की गिरफ्त में रहा और रिस-रिस कर तड़पा हूँ और वो भी पूरे दस वर्ष !
खुश नसीबी ये रही कि मैंने आपरेशन से परहेज बरता और अंग्रेजी दवा से भी दूरी कायम रखी अलबता जब कभी दर्द की बर्दास्तगी दगा दे गयी तो पेनकिलर जरूर लिया / इस रोग का शुभारम्भ तब हुआ जब मै एक अकेला दिल्ली शहर में अपने लिए ठहराव तलाश रहा था लिहाजा खानपान की दुश्वारियो से भी गुजरना पड़ था जो बाद में इस रोग के लिए माकूल बजह साबित हुयी /
इस रोग ने मुझे बहुत कुछ दिया , जो दर्द और दुश्वारियो से ज्यादा बहुत कुछ था / मैंने इस रोग की शक्ल में मौत का खूबसूरत चेहरा भी पहचाना जो बाबा रामदेव के योगिक तौफे के तौर पर जिंदगी से यूं गुथ गया कि जिंदगी का आमूलचूल कायाकल्प हो गया  /
मै बाबा रामदेव के कदम चूम कर शुक्रिया कहना चाहूंगा जो वो देवदूत कभी मेरे सामने पड़े तो !
आगे मै वो दवा बयान कर रहा हूँ जो मैंने इस नाशपिट्टे रोग को शमन करने के लिए इस हाहाकारी चिकित्सा दुनिया से बतौर हीरे जवाहरात जैसी कीमती वस्तु की शक्ल में जमा किये है / सभी दवा आयुर्वेदिक है लिहाजा नुक्सान का तो सवाल ही नहीं उठता और फायदे की गारंटी सौ फीसदी है /
१.पायरायड , २. अर्शोध्नी बटी, ३.अर्श कुठार रस , ४.सप्त विन्सती गूगुल, और ५. आरोग्य वर्ध्नी वटी /
ये पांचो आयुर्वेदिक दवा की एक-एक टेबलेट चबा कर गर्म पानी के साथ सुबह खाली पेट निगले और रात को भोजन के बाद गर्म मीठे दूध के साथ चबा कर निगले  फिर दूध के साथ ही सब्गोल एक दो चमच्च भी ले ताकि पेट साफ़ रहे /
कुछ और भी फायदे मंद बाते है जो अपनाई जाए तो शिग्र लाभ मिले गा / मसलन सुबह बाथरूम जाने से पहले गुन्न्गुन्ना पानी चार पांच गिलास पिए / चाय, चावल,मिर्च ,तेल और तली वस्तुओ से परहेज करे / गुटका , तम्बाकू या दूसरी बुरी आदतों से बचे / साथ ही यदि संभव हो तो बाबा रामदेव के बताये कपालभाति और प्राणयाम भी दवा लेने के बाद एक या आधे घंटे जरूर करे / मेरी शर्त है आप से कि यदि आपको ये नामुराद रोग है तो जड़ से नष्ट हो जाए गा बस लगातार स्वस्थ होने बाद भी कमसेकम तिन महीनो तक दवा का सेवन करते रहे ताकि बिमारी
फिर कभी लौट के ना आये /
पुनश्च, दवा के बाबत यदि कुछ पूछना चाहे तो ई-मेल करे - sbtamre@gmail.com     
     

Friday, March 5, 2010

उड़न-तश्तरी की सेकुलर उड़ान ......[ भाग-२]

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;









 दोस्तों,
अपने फिल्सफे को अभी मै मुख़्तसर बयान भी नहीं कर पाया था कि मेरे एक मुअजीज ब्लोगर दोस्त संजय बेंगानी ने मेरे पिछले पोस्ट पर एक निहायत ही उम्दा टिपण्णी चस्पा कर दी कि जो भी नए ब्लोगर ब्लोगिंग का आगाज करते है वो एक दम से ''उड़न तश्तरी'' ट्रेड मार्क समीर लाल से जा कर चिपट जाते है , शायद क्या यक़ीनन मेरे ये अजीज ब्लोगर दोस्त ये समझाना चाहते है कि नए ब्लोगरो में वो बिलकुल भी उरमा नहीं कि वो खुद के माद्दे पर एक कामयाब ब्लॉग रच सके लिहाजा नए ब्लोगर को जो आसान-सा कामयाबी हांसिल करा सकने वाला और सारी दुश्वारियो से निजात दिलाने वाला सुगम-सा रास्ता दिखता है वो है , सौ मर्ज की एक दवा ''उड़न तश्तरी'' ट्रेड मार्क समीर लाल !
और इस वक्ती लेख में समीर जी को मैंने यदि मुद्दा बनाया है तो वो किसी खुदगर्जी को निगाह में रख किया है या नहीं इस फैसले को लेने का हक़ मै इकलौते काबिल शक्स संजय बेंगानी को मुकरर करता हूँ और पुरजोर मांग करता हूँ कि वो एक इन्साफपसंद आत्मा के बतौर खुद को नुमाया करे और पूरी तसल्ली से मेरे लेख को पढ़े और फिर फैसला दे उड़न तश्तरी की मिशाल मेरे द्वारा इस लेख में देना खुद गर्जी है या लेख के आत्मा की पुकार , और यदि फिर भी वो अपनी टिपण्णी को कायम रखते है तो जो सजा काले चोर की वो मेरी /  
संजय जी जैसे जहीन सोच वाले बन्दे को मै बेहद प्यार करता हूँ मगर ये भी कहूंगा कि उनकी सोच से ईतेफाकिया मै इतेफाक नहीं रखता लिहाजा उनकी टिपण्णी को पूरे तस्बूर से खारिज करता हूँ / उड़न तश्तरी समीर लाल एक आदर्श ब्लोगडीए है , वो हिंदी ब्लॉगडियो के बिच खासुलखास स्टार पोजीशन कब्जाते है /  कंही कोइ एकआधी उनीस-बीस करदिये सकने वाली यदि कोइ बात है ,तो वो है '' स्वामी समीरानन्द '' वाली वाहियात-सी ईमेज जो उनके धीर-गंभीर अक्स को खिलंदरी शक्ल में पेश करता है और उन लोगो की साँसे रोक देता है जो उन्हें जहीन ब्लॉगडीए के तौर पर पसंद करते है ,खैर जो हो मै उस उलटे -पुल्टे ब्लॉग को ईमेज के खातिर में तवजोह नहीं देता,और  हांसिल कुल जमा यह मानता हूँ कि समीर लाल जी एक उम्दा और अनुकर्णीय ब्लॉगडीए है, उन्होंने अपने इकलौते जैनुन ब्लॉग उड़न तश्तरी से ''फलोवर'' नाम का बखेडिया फीचर ही निकाल फेका है क्यों कि ये शातिर उस्ताद ब्लॉगडिया जानता था कि हिंदी ब्लॉगडीए बीमार और भावुक फितरत वाले है , इनकी मानसिकता में वो फराकदिली नहीं कि ब्लोगिया जन्हा के अंदरखाने की नाजुक खुदगर्जी को पचा पाए , याने समीर लाल जी हिंदी ब्लॉगडियो के कमजोर हाजमे को खूब पहचाना कि ये बखेड़ा परे ही रहे और बचा हुआ वक्त कमाई मानकर उन ब्लॉगडियो पर फराकदिली से बतौर टिप्पणीकार खर्च किया जाए जो अभी अभी अपनी ब्लोगिया पारी का आगाज कर रहे है क्यों कि  जो पुराने ब्लॉगडीए है वो जैसे काफिले में जुड़े थे वैसे ही जुदा-जुदा वजूहात अपनी-अपनी उम्र पा कर विदा भी होते जाते है क्यों कि ये ब्लोगिया दुनिया भी तो फानी है और इस फानी ब्लोगिंग जन्हा में एक ही चीज प्रभु राम नाम की मानिद सत्य है और वो वाहिद सत्य है एक लरजती-सी मनमुग्धा '' टिपण्णी '' !
किस नाजुक मुहाने पर, किन हालात के हांथो मजबूर हो कर किस कवी ने ये लिखा कि '' ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर '' ये मै नहीं जानता परन्तु जो मायने समझता हूँ उस लिहाज से ये उक्ति ''उड़न-तश्तरी'' पर बिलकुल फिट बैठती है क्यों कि ''फलोवरशिप'' जैसा बखेड़ा बिलायती ब्लॉगडियो को मुफीद बैठता है क्यों कि वो इसे मंदिर के प्रसाद की मानिद उसे भी बाँटते है जो मांग रहा है और उसे तो बंटते ही है जो नहीं मांग रहा है जब कि हिंदी ब्लॉगडीए ने इस सहज प्राकृतिक गजेट को ना केवल अपनी आन-बान-शान जोड़ लिया बल्कि इसके अलावे कारू के खजाने जैसी हैसियत भी दे दी जो किसी को दे दे तो मानो ये दुनियातमाम उसके कदमो तले चली जाये गी / समीर जी ने हिंदी ब्लॉगडियो की रूगन मानसिकता को खूब पहचाना और अपने ब्लॉग के कामयाबी के हक़ में मुनासिब फैसला लेते हुए ''फलोवरशिप '' जैसे आफत के परकाले को बाहर का रास्ता दिखा दिया /                       
खैर, संजय जी की बाबत मै यूं बोल पडा क्यों की जिस मानसिकता के तहत संजय जी ने टिपण्णी दी बिलकुल उसी ब्लॉगडिया दरिद्रता के बाबत मै अपनी बात कह रहा था /  यदि हिंदी ब्लोगरो को बिलायती ब्लोगरो के मुकाबले में आना है , यदि हिंदी ब्लोगरो को बिलायती ब्लॉगडियो की हैसियत कब्जानी है और सारे जन्हा से उन्च्चा होना है तो हमारे हिंदी ब्लॉगडियो के सामने दो ही रास्ते है /
शेष कथा फिर ....!

Tuesday, March 2, 2010

उड़न तश्तरी की सेकुलर उड़ान ......!

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
पीछे अनेक महीनो से मै ब्लॉग लिख रहा हूँ , कोइ तिन चौथाई वक्त तो मुझे ये समझने में ही जाया हो गया की ये यदि अक्लमंदी है तो कमअक्ली क्या है और यदि दोनों के बिच मुनासिब फर्क है तो वो इतना बारीक क्यों है कि इस फर्क को समझने बैठो तो खोपड़ी में बम क्यों फूटने लगते है / खैर , जो भी कुछ हो, ये तो कायम उसूल है कि इन्सान जो कुछ भी सीखता है वो देख और सुनकर ही तुजुर्बा इकठ्ठा करता है और तभी कामयाबी कदम चूमती है / तक़रीबन कोइ एक वर्ष के ब्लोगिंग सफ़र में जो कुछ राय मुझे कायम हुई है वो बदमजा ज्यादा है बनिस्बत खुश्गंवारी के / इस दरम्या ढेरो ब्लोगरो को मैंने पढ़ा समझा / जिनमे कुछ तो इतना बेहूदा लिखते है कि कोफ़्त के मारे अपने सर के बाल नोचने लग जाये,उन्हें पढ़कर ऐसा उबाल पैदा हो जाता है / जब कि कुछ ऐसे किस्म के है कि जिनके हर आयन्दा पोस्ट की इन्तजारी बेसब्री से करते है / उनकी चर्चा मै आगे पूरी तसल्ली से करूंगा परन्तु पहले कुछ चंद बाते हिंदी ब्लोगिंग के बाबत करनी चाहूंगा /
 हिंदी ब्लोगिंग का दायरा कोइ बहुत बड़ा नहीं एक अंदाजे के मुताबिक़ ये कोइ दस या ग्यारह हजार ब्लोगरो का जमौडा होगा जबकि बिलायती ब्लॉगडियो का ब्योरा दसियों गुना बड़ा बताया जाता है / तसल्ली बक्श जो बात है वो ये है कि मौजूदा वक्त हमारे हिंदी ब्लोगिंग का शैशव काल बताया जाता है लिहाजा हम उम्मीद पाल सकते है कि आगे आने वाले वक्त में हिंदी ब्लोगिंग को जवानी फूटकर निकलेगी और इसके हुसन को देख कर हम सर्द आहे भरते रह जायेंगे / आमीन !

जाहिर सी बात है कि जब हिंदी ब्लोगिंग अभी इन-मीन चार दिन का ही बच्चा है तो क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा जांचने बैठे / पर फिर भी पुतके पग पालने में नजर आते है ऐसा सोचकर विचार करे तो हालात बड़े दुश्वारी भरे नजर आते है / क्यों की आँखे खुल्ली रख कर ब्लोगरो की मानसिकता गौर फरमाए तो कुछ एक बाते बड़ी शिद्दत से उजागर होती है / मसलन किसी भी ब्लोगर के चार प्रमुख असलेह है , पहला है -लेखन की ताकत , दूसरा है -टिपण्णी , तीसरा है -फलोवरशिप और चौथा और आखिरी हथ्थियार है -ब्लोगिंग की उपयोगिता / उपरोक्त चारो असलोह में दो तो ब्लोगर के अस्त्र-शस्त्र है और बांकी दो बाते खुद की और पाठक की आपसी सूझ-बूझ या खसूसियत का मामला है जैसे मेरे ब्लॉग की बुनियादी समझ किसी को अच्छी तो दूसरे को समझ से परे लग सकती है /  

जैसा कि पहले ही अर्ज कर चुका हूँ की हिंदी ब्लोगिंग अभी अपने बचपने जैसी नातजुर्बेकार उम्र से दो चार है लिहाजा ब्लोगरो से सुलझे हुए व्यवहार की उम्मीद फजीहत की बात ही है , परन्तु चाहे जो हो कुछ बाते जो आनुवंशिक दोष के किस्म की है और जो मिटटी है जिससे भारतीय ब्लोगर निर्मित है वो कभी तब्दील नहीं हो सकती, ब्लोगिंग करते हुए एक हिन्दुस्तानी ब्लोगर चाहे-अनचाहे अपने अवगुणों को छुपा नहीं पाता, जिस दरियादिली की उम्मीद उससे ब्लोगिंग करते वक्त दरकार है वो उससे कोसो दूर रोती बिलखती दिखाती है जब कि हिंदी ब्लोगर अपनी दरिद्रता पूर्ण ब्लोगिंग शैली में इस कदर मशगुल हुए रहता है कि उसे अपनी खामखा की गफलत का ख्याल तक नहीं होता / और ना ही ये जान पाता है कि वो अपने लाल बुझकड़ शैली की बाजुहात विश्व स्तरीय ब्लोगिंग से किस कदर पीछे है / विश्वस्तरीय ब्लोगिंग एक हिन्दुस्तानी ब्लोगर के लिए तो अभी दूर की कौड़ी है ही बल्कि ज्यादा बेहतर तरीके से यूं कहे कि अभी तो मुल्क स्तर की ब्लोगिंग में भी हिंदी ब्लोगर कोइ मुकाम नहीं रखता क्यों कि अभी तो वो उन असलोह का भी जायज इस्तेमाल करने नहीं सका है जो उसे मंदिर के प्रसाद की तरह खूब जोरशोर से चलकर या जा जा कर बांटना चाहिए वो ही प्रसाद वो राशन की दूकान की मानिद मर जाने की स्थिति आ जाने तक नहीं बांटता / आगे मै अपनी बात तफ्शील से समझाने के लिए एक निहायत ही उम्दा किस्म के हिंदी ब्लोगर की नजीर पेश करता हूँ जो हिंदी ब्लोगरो के बिच बड़ी आला फराक दिल हस्ती गिने माने जाते है / मेरी निगाह में ये नाम चीन ब्लोगर सच्चा सेकुलर ब्लोगर है / मुमकिन है इस खुलासेको आप सभी ने महसूसा हो मगर शब्दों में पढ़ और समझ पहली दफा ही रहे होंगे ये मेरा यकीं है / ये ब्लोगर कोइ और नहीं बल्कि समीर लाल उर्फ़ उड़न तस्तरी ही है जो सच्चे मायनों में एक सेकुलर ब्लोगर कैसे है ये खुलासा मै अगली किस्त में करूंगा /
थैंक्स !