Tuesday, February 16, 2010

हम फिर से नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है , क्यों की उपरवाले का कुफ्र है टूटेगा जरूर !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
अब तो जैसे रविवार का दिन ज्यू ज्यू नजदीक खिसकता आता दिखता है वैसे वैसे दिल बैठने सा लगता है , कहने को दिन तो ये छूटी के लिए मुकरर है मगर मशरूफियत असल में अपने उफान पर होती है , हप्ते भर बांकी दिनों की डेली रूटीन किसी भी सूरत में तकलीफदेह ना रहे इसके जुगाड़ में रविवार का सारा वक्त जाया चला जाता है / तक़दीर और देवता भी इस दिन मुंह फेर लिए महसूस हो जाते है जो रविवार को कोइ मुलाक़ात करने चला आये क्यों की यदि आगंतुक की तीमारदारी ना हो तो ये बे-अदवी में गिनती होगी और यदि बे-अदवी करे तो आईंदा सप्ताहंत तक बुरे-बुरे अंजाम भुगतने पड़ेंगे / इससे भी बुरा क्या हो सकता है कि यदि कोइ हादशा रविवार को पेश आ जाए , तो यूं जाने बांकी सातो दिन गयी भैस पानी में /
गत रविवार को यूं लगा मानो दुनिया ने आपना दस्तूर बदल दिया है और पृथ्वी अपनी धुरी पर उलटी घूम रही है / अपने ब्लोक की आवारा कुतिया ने इकठ्ठे आठ दस पिल्लो को ज़ना था / उसकी फलती-फूलती गृहस्थी किसी की आँखों में शूल बने ये भला क्यों कर होता / सो लोगबाग ने कोइ तवज्जो न देनी थी और ना ही दी / मगर कुतिया ने और उसके लिविंग पार्टनर कुत्ते ने पास के पार्क में खेलने जाते तिन चार बच्चो को इस मुगालते में काट खाया की वो उसके पिल्लो के लिए खतरा-ए-जान बन सकते थे / वाकिया चुकी बच्चो की हिफाजत पर सवालिया निशान बनाता था लिहाजा पडौसी सरदार मंजीत सिंह जी ने मीटिंग बुलाली सारे ब्लोक बालो की और यक्ष प्रश्न रखा की कुतिया के आतंक से कैसे महफूज रखा जाए बच्चो को / पुलिस को इतला दी जाए इससे बेहतर सुझाव कोइ ना दे सका,क्यों की दिल्ली नगर निगम कितनी चुस्त-दुरूस्त है ये कोइ कहने की बात नहीं है , अलबता कार्य क्षेत्र और जिम्मेदारी तो उसी की बनती है तो भी ब्लोक वालो को पुलिस वालो पे ज्यादा भरोसा जगा /
भले ही मैंने तहे दिल से सोचा पर नहीं चाहता था की पुलिस को ये ब्योरा मै परोसू , पर मुसीबत जो आनी थी वो बा-कायदा पैर जमा कर घर बैठ चुकी थी अब तो केवल उसे भुगतना भर था जो की मैंने भुगती भी / पर क्या हुआ जो अंजाम ठाकरे बनाम शाहरूख खान का हुआ वो ही ब्लोक के आतंक का हुआ याने टाँय-टाँय फिस्स !
मैंने सरदार जी के तकादे के जोर से तिन बार कुतिया और कुत्ते के सिरफिरे होने की रिपोर्ट दर्ज करायी और खूब मिन्नत-समाजत की पर आज तीसरा चोथा दिन बितने को आया कोइ साबूत पुलिस छोड़ो उस नामकी चिड़िया तक झांकने नहीं आई / हार कर मैंने नगर निगम का दरवाजा खटखटाने जैसा दोहरा करदेने वाला रास्ता भी आजमाया पर शकुन पैदा कर सकने वाले आसार अभी भी नदारद है और     
वो कुत्तिया आज भी वैसी की वैसी चौड़ी छाती किये गफलत में शिकार दर शिकार किये जा रही है और हम फिर से एक नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है क्यों की उपरवाले का कुफ्र है तो टूटेगा जरूर !       
         
        

1 comment:

Udan Tashtari said...

दो दिन में आ ही रहा रविवार...होली पर तो पुलिस आने से रही. :)