Wednesday, February 17, 2010

महफूज भाई की कातिलाना खूबसूरती !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;




दोस्तों,
अपने सुसंयत भाव और खुशमिजाजी के लिए खूब जाने जानेवाले खुशदीप सहगल जी ने जो सलाहियत भरी बाते बतौर टिपण्णी मुझे लिखी उसे मै अपने सर-माथे लगाता हूँ /
सहगल साब ने जो बाते महफूज जी के बाबत कही उसे सोलह आन्ना सच्च मै भी कबूलता हूँ , इसकी मुझे दरकार नहीं कि मै तस्दीक करता फिरू बल्कि पक्के तौर पर जानता हूँ महफूज एक साहसी और रंधीर शख्सियत है , मगर मै इस हक में नहीं कि नवाबो की तहजीब वाली मशहूर शहर ब्लोगिंग के नाम पर दुनिया में रुसवा होती होतो गमखार बना बैठा रहू क्यों की समूची दुनिया जानती है कि लखनऊ का मतलब है जुबान की मिठास से दिल पर बादशाहत कायम करना और हमारे महफूज भाई वो ही भूल गए , मेरी समझ से ये एक हाहाकारी वाकिया है /
खुशदीप जी ने आखिरी जुमले तक सच्च लिखा कि हमारे इर्दगिर्द लिखने समझने के लिए हजारो हौलनाक मसले मचलते मिल जायेंगे जो देश और समाज की जान खाए जा रहे है मगर मुझ आफत के पुतले ने फिर भी जहमत ये उठाई की किशोर-महफूज की जुगलबंदी पर ही लिखना गंवारा किया तो फक्त इस लिए कि जिस बिंदास अदा से महफूज भाई बेबाक होकर लिख गए उसकी रोकथाम तो होनी ही चाहिए थी और जिस किस्म की रोकथाम किशोर आजवानी कर रहे थे वो किसी भी नजरिये को मुनासिब इन्साफ दर्ज नहीं करती थी लिहाजा मैंने अपना रूख तल्ख़ किया ना की गैर मुनासिब किया / मैंने ये तोहमत नहीं महफूज भाई पर  आयद नहीं की कि महफूज जी ने किशोर जी को अपशब्द कहे बल्कि अपना विरोध ये कहकर दर्ज करवाया कि कान उखाडू टिपण्णी जहर बूझे लफ्जो की मुहताज नहीं /
                                     बांकी रह गयी बात ब्लोगिंग की तो खुलासा करना बेहतर होगा कि दूसरे हजारो ब्लोगरो की तरह ब्लोगिंग मेरा भी सगल ही है ना की रोजीरोटी का जरिया / पिछले दो दशक भी ज्यादा वक्त से बतौर ज्योतिषी के पुरजोर सलाहियत और ईमानदारी से एक ही मुकाम पर टिक कर दो वक्त की रोटी प्रभु का नाम लेकर खा रहा हूँ / ना तो मै इस मुगालते में हूँ की महफूज जी का नाम भज कर ब्लॉग बैतरनी पार कर कारू का खजाना पा जाउंगा , ना ही ये खामख्याली में हूँ कि आज मै किशोर आजवानी की तरफदारी करूंगा तो कल बा-जरिया किशोर आजवानी स्टार न्यूज़ में तिन देवियों वाले प्रोग्राम में अक्ल को बीमार करने वाली मगर दुनिया को अपने हुसन से हैरान परेशान कर देने वाली  उन तिन महिला नजूमियो की जगह मुझे मिल जाए गी / मैंने तो सवाल महज तमीज और तहजीब के बाबत उठाया था जो की मेरे हिसाब से असुबिधा वाली बात जरूर थी /
अंत में , फिर से महफूज जी वाले शिरे पर आता हूँ की मेरी उनकी कोइ जाती अदावत तो है नहीं / मै इतना भी गाफिल नहीं की उनकी उरमा को ना समझू लेकिन ये वाही ताजूब की बात है की उनके जैसा अच्छी तालीम रखने वाला बन्दा क्यों कर भूल करे गा /
थैंक्स/ 
                  

7 comments:

संजय भास्कर said...

mughe to bahut hi khoobsurat lagte hai..
achee insaan bhi hai...

उम्दा सोच said...

महफूज़ भाई बेहतर नागरिक है और बढ़िया इंसान भी :-)

Suman said...

nice

Udan Tashtari said...

ऐसा शीर्षक रखने का औचित्य नहीं समझ में आ पाया, टामरे साहेब.

कहाँ कहर ढा दिया उन्होंने अपनी खूबसूरती से?

हम तो शीर्षक की वजह देखने चले आये थे और आप तो कोई और ही राग गा रहे हैं...

खुशदीप सहगल said...

तामड़े जी,
पहले तो मेरी गुस्ताख़ी माफ़ कीजिएगा मैं आपको तामरे जी लिख गया था...आपने मेरी टिप्पणी को सही संदर्भ में लिया, उसके लिए आभार प्रकट करता हूं...मैं जानता हूं जब आप सामाजिक और देशहित के मुद्दों पर लिखेंगे तो कमाल लिखेंगे...सिर्फ इसलिए अपने विचार आप तक पहुंचाए...रही बात किशोर अजवाणी और महफूज़ अली की, दोनों बहुत ही सुलझे हुए इनसान हैं...मुझे यकीन है, इन दोनों ने आपस में संवाद कायम कर जो भी गलतफहमी हुई होगी उसे दूर कर लिया होगा...आप ने लखनऊ की तहज़ीब के बारे में जो भी लिखा सच लिखा...लेकिन लखनऊ भी अब पहले वाला लखनऊ नहीं रहा...पिछले दो दशक में जात-पात की राजनीति ने लखनऊ का क्या हाल किया है, सब जानते हैं, इसी लखनऊ कि सरजमीं पर विधानसभा में माइक उखाड़ कर एक दूसरे पर हाथ भांजते माननीय विधायकों को भी हम देख चुके हैं...ऐसे में सिर्फ़ महफूज़ को दोष देना कहां तक उचित है...वैसे एक बात आपको बताऊं महफूज़ की जन्मभूमि लखनऊ नहीं गोरखपुर है...लखनऊ तो महफूज़ की कर्मभूमि है...महफूज़ का ज़िक्र आते ही न जाने क्यों मुझे मदर इंडिया का बिरजू याद आ जाता है...वो बिरजू जो अपनों के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाता है...आपने भी महफूज़ को ठीक तरह समझना है तो एक बार मदर इंडिया में बिरजू के उस किरदार को ज़रूर देखिए जो बड़ा होकर सुनील दत्त बनता है...और हां, मैंने अगर कुछ ऐसा लिख दिया हो जिससे आपको कुछ असहजता महसूस हुई तो माफ़ी चाहता हूं...बस इस प्रकरण को यही खत्म कर दीजिएगा...और अब ऐसा कुछ सार्थक लिखिए, जैसा कि हम सब आपसे उम्मीद कर रहे हैं...आपकी पोस्ट के इंतज़ार में...

जय हिंद...

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

mai bhee nice likhata hoon

बवाल said...

क्या महफ़ूज़ महफ़ूज़ लगा रखी है ब्लॉग पर सबने। लगता है सबकी अक्ल ही महफ़ूज़ नहीं रही। टामरे साहब काहे नाराज़ हो रहे हैं हटाइए ना।