Thursday, February 11, 2010

मेरा पक्का ख्याल है यदि ये चुगलखोरी बंद नहीं हुयी तो ...!

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;





दोस्तों.
आज के तेजरफ्तार दौर में इन्शान की जरूरते काफी बढ़ी-चढ़ी रहती है , सर चढ़ कर बोलती जरूरते उसे अपने सुभीते के लिए रोज एक नयी ईजाद के लिए उकसाती रहती है / इसी चक्करबाजी में  शायद टेलीफून का औतार हुआ होगा / टेलीफून  एक एसी मजेदार मगर अक्ल को  हैरान परेशान कर देने वाली ईजाद है जो दुनिया के दो जुदा जुदा आखिरी छोर पर बैठे
दो बन्दों को यूं आसान सी गुफ्तगू करवा देता है जैसे मानो दोनों आमने सामने सहज बैठे गप्पे लड़ा रहे हो / मुझे ये नहीं पत्ता की टेलीफून किस उस्ताद आला दिमाग वैज्ञानिक की ईजाद है और ना ही मै उसका फिरंगियों जैसा कोइ चुभता सा नाम जानने के लिए मरा जा रहा हूँ इसकी वजह शायद कुछ हद तक यह है की मै उससे थोड़ा रूक रूक कर खफा हूँ मगर सही मायनों में पूछे तो एक मुस्त यदि मै खफा हूँ तो उस उस्तादों के उस्ताद से हूँ जिसने चोंगे वाले टेलीफून से चार कदम आगे जाकर मोबाईल टेलीफून जैसे नन्हे शैतान को ईजाद किया है जिसे जब जन्हा जैसे चाहो इस्तेमाल कर लो / यदि आप चार जनों के बिच बैठे हो और आपकी मनसा उन्हें अलहद रखने की है तो परायो की तरह बेलाग छोड़कर खामोशी में चले जाओ, आप कभी घरवाली के साथ हो और जाननिसार का दावा ठोकने वाली प्रेयसी की कॉल आ गयी तो कोइ टोटा नहीं, धर्मपत्नी को टका सा समझाओ की दीक्षा देने वाले गुरू जी की कॉल है और सन्नाटे में जाकर अभिसार वार्ता का लुफ्त उठाओ /
मोबाईल फूंन ईजाद करने वाला काफी घिस्सा हुआ बन्दा रहा होगा, उसने इस आला दर्जे की मशीन में नंबर या नाम की चुगलखोरी करने वाला पुर्जा भी जोड़ा हुआ है जो कॉल बजने के साथ कॉल कर्ता की समूची पोल खोल देता है , बांकी मोबाईल धारक मनसा ना हुई तो फूंन पें-पो करता रहे गा , पर वो बेरहम पत्थर दिल सुनके राजी नहीं होगा /  मेरी और मोबाईल की जानी-दुश्मनी इसी मुहाने से शुरू होती है / यदि मोबाईल फून की शक्लोसूरत में चुगलखोरी वाला पुर्जा मुत्वातर कायम रहा तो मेरा पक्का ख्याल है की इंशान को इन्शान के दर्जे  से बेदखल होना ही पड़े गा / समाज अपनी दिशा भूल सकता है / हर बन्दा जो मोबाईल फून इस्तेमाल करता है वो बे-लज्जत झूठ बोलने का गुनाह करता ही रहता है / होते है साऊथ दिल्ली के किसी बार में कहते हो मंदिर में हूँ , बैठे होते है घर में कहते हो शहर से बाहर हूँ / होते है प्रेयसी के साथ डिस्कोथिक में कहते है मिलाने वाला चलता रहा मुसान में हूँ / और ना जाने कितने वैगेरह वैगेरह /

मैंने बुरे से बुरा ये किया की अपने एक प्राणप्यारे मित्र को जरूरतमंद जानकार थोड़ा धन उधार दे दिया , बस उसी वक्त से ऊपरवाले ने मुंह फेर लिया और मोबाईल फून से अदावत की बुनियाद डल गयी / तैशुदा वक्त के बाद जब मैंने तकादा चालू किया तो उसी दरम्यान मोबाईल फून की शैतानी ताकत देखकर रूह फन्ना गयी / प्राणप्यारा मित्र जमना पार रहता है और मै रोहिणी लिहाजा मोबाईल फून का तो इस्तेमाल होना लाजमी था और मुझे जमीं सुंघनी ही थी / उस प्राणप्यारे ने तमाम दुनिया जन्हा का झूठ पानी पि पीकर बोला / वो जमी पर था तो कहा पाताल में हूँ , आशमा में था तो कहा मंगल ग्रह पर हूँ / उसके झूठ की फेहरिस्त शैतान की आँत से भी बड़ी थी और उस नामाकूल का इकलौता मददगार यदि कोइ था तो वो था इन्शानियत का कातिल मोबाईल फून /                        
 आधुनिक संसाधनों ने जितनि सुभिसता हमारी जिंदगी परोसी है वैसी पहले कभी ना थी यह मै तहे दिल से कबूलता हूँ मगर इन्शान में शैतान की फितरत हाबी हो जाए तो वो भली सी लगने वाली चीज का भी वो किस्म का इस्तेमाल कर के दिखा दे सकता है की शैतान भी पनाह मांगता दिख जाए /

थैंक्स / 

2 comments:

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

अब तो हमें भी शक होने लगा है कि 7 तारीख को आप वाकई पुस्तक मेले में मशरूफ थे या फिर ये इस आला दर्जे की शैतानी ईजाद का कमाल था :)

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

बहुत बढिया. मजा आ गया.