Saturday, February 27, 2010

बड़े दिल वाले मुल्क के तंग-दिल हाकिम !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;







दोस्तों,
'' मै ''अमुक '' ईश्वर को हाजिर जानकार सौगंध खाता हूँ की एक मंत्री के तौर पर जो भी विषय मेरी जानकारी आवेगा या लाया जाएगा उसे मै भयमुक्त  और निष्पक्ष रह कर संज्ञान में लूंगा ''

इसी किस्म के वो चंद मिलते -जुलते अल्फाज और होते है जब हमारे नुमायिंदे बतौर मंत्री के ''ओथ'' ले रहे होते है / मगर उठायी गयी कसम कितने फीसदी अमल में लाते है हमारे ये हुक्मरान , नो डाउट , भयमुक्त तो ये होते है मगर तरफदारी ये पुरे दीदादिलेरी के साथ और पूरी बेहयाई से दस्तूर मानकर करते है / मसलन पिछली सरकार में लालू प्रसाद यादव को ही लेले / जब वो रेलवे में कर्ताधर्ता थे तो पूरा महकमा बिहार की तीमारदारी में जुटा रहता था , एक से बढ़कर एक रेलवे की दुनिया तमाम किस्म की योजनाये बिहार को समर्पित थी , हर बड़ी छोटी योजनाये बिहार को ही निगाह में रख कर तैयार की जाती थी और अब आज ममता दीदी रेलवे पर काबिज है तो उसने जो रेलवे का लेखा-जोखा दुनिया को नुमाया किया है वो किस किस्म की चुगली करता है वो कोइ छुपा नहीं / जिस फराकदिली से दीदी ने रेलवे की ताकत बंगाल पर लुटाई है वो लालू प्रसाद की तरफदारी को भी धत्ता बताती है , लालू भी अफ़सोस मानने लगे होंगे कि काश मैंने भी ममता के माफिक पूरी बे-हयाई से ''ताकत'' का फ़ायदा उठाया होता तो वापिस महकमे पर काबिज हुआ होता /
इस किस्म की मानसिकता हमारे नुमायिन्दो में दिनानुदिन बिफरती जा रही है जिसका एक सीधा-सा मायने ये निकलता है की जो महकमा जिस किसी के हत्थे चढ़े गा वो महज उसी इलाके या सूबे को काबिले-मेहरबानी माना जाए गा जन्हा से कि वो नुमायिन्दा है बांकी का हिन्दुस्तान तमाम टापता रहे गा / एक को छोड़कर बांकी के सारे उपवास पारण करेंगे जब तक कि उसी महकमे में उनका रिश्तेदार नहीं काबिज हो जाता /  इस मानसिकता को श्याह से सफ़ेद साबित करने के लिए जो दलील पेश किजाती  वो भी कम हाहाकारी नहीं कि वो सूबा बाँकियो के मुकाबले कमजोर है लिहाजा उस पे मेहरबानी मुनासिब है / इस '' तरफदारी '' के कई फायदे है तो नुकसान भी हजार है / ये ठीक है कि एक खासमखास इलाके में उस महकमे की मेहरबानियो के एवज में तरक्की की हल्कि-सी बयार बह निकलती है मगर ये भी तो देखे की तरक्की किसी एक इकलौते महकमे के ताबे में नहीं होती जो उसके बुलाये नंगे पांव दौड़ी चली आये , तरक्की तो खुशहाली की तजबीज है जो सभी के एकजुट बुलावे पर ही आना कबूलती है /
वो आला हस्ती इंदिरा गांधी ही थी जिसने हमारे आज के हुक्मरानों के लिए तरफदारी की राहे-नजीर पेश की थी / इंदिरा जी ने रायबरेली को गोद में लिया , राजिव गांधी ने अमेठी को तरक्की के पालने में झूले झुलाए और ना जाने किस किस ने इस कामयाब नुस्खे को जमकर आजमाया / इस फेहरिस्त को जांचने बैठे तो शैतान भी हांफने लग जाए गा / मगर एक जो खासुलखास खुलासा इस मानसिकता के पीछे छुपा खूब दिखता है वो है मुल्क के लोगो की तरक्की की चाहत जो वो अपने नुमायिन्दो से पुरजोर रखते है और जो हुक्मरान अपनी शर्तो पर शातिर व्यापारी वाले अंदाज में किस्तों में अदा करते है और तो और वो भी किसी ख़ास सूबे या इलाके तक ही /
तो क्या किसी ख़ास इलाके को छोड़कर किसी ''अपने वाले सूबे या इलाके '' की  तरक्की के पीछे ना-काफी संसाधनों रोना है , ये बहाना मेरे हलक से निचे तो नहीं उतरता क्यों की ये तरिका एक अनार और सौ बीमार वाली कसर पूरी करेगा और सीधे-सीधे असंतुलित समाज की तस्बीर उकेरेगा / जैसे पेट तो गुबारे की तरह फूला हो मगर टाँगे कमजोर / साफ़ है की जिस्म का वजन ढ़ोने वाली टाँगे भी मजबूत होनी चाहिए /
मुल्क का हाकिम ही जब इन्साफ-पसंद नहीं होगा तो रब्ब जाने अंजामे गुलिस्तान क्या होगा / फिर तो मुल्क के तमाम वाशिंदे दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों का रूख करे तो क्या बुरा है !




होली की सभी ईष्ट मित्रो को मेरी तरफ से बहोत-बहोत मुबारकबाद !                               

Wednesday, February 17, 2010

मीडिया बोले तो .....किशोर आजवाणी उवाच !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;


दोस्तों,
जी जनाब मै उस मुहाने पर खड़े जमौड़े के निस्बत ही बाते कर रहा हूँ जिनके जरिये हमें तमाम किस्म की हलचलों का पता चलता है , और मै उसी बाबत कहरहा हूँ जो हमारे निजाम में व्याप्त लोकशाही की पहरेदारी पुख्ता नेकदिली से अंजाम देते रहने की हूकार भरता है कि वो भी और दूसरे ,मसलन कायदे क़ानून की किताब संविधान, और ईन्साफ देने को आतुर खड़ी अदालत, चुन चुन कर भेजे गए नुमायिन्दो के खिलंदड़े अंदाज की वजह से देश को शर्मसार कर देने वाली कार्यपालिका और इन सब पर डंडा देने को मरा जा रहा वो मीडिया ही तो है जिसके बाबत मै कुछ कहनाचाहता हूँ उससे पहले एक बानगी जरूर गौर फरमाए /
आज दिनांक १८-०२-२०१० को टीवी पर सभी चैनलों पर , तौभी खासुलखास IBN -7  पर एक खबर बारम्बार दुहराई जा रही है की झारखंड में माओ वादियों ने एक बीडियो का अपहरण कर लिया और उसकी रिहाई के लिए मुख्यमंत्री शिबू सोरेन सात माओवादियों को रिहा करने की जुगत भिडा रहे है , कल ये ही खबर इसी चैनल ने दूसरे मायनों के साथ परोसी थी जिसका मुख्तलिफ मतलब ये था की शिबू सोरेन इस कदर गाफिल है कि बीडियो की ब्याहता उनके दरवाजे आकर अपने खाबिन्द की सलामती को तरजीह दिलवाने के खातिर ख़ुदकुशी को उतारू है और दूसरी तरफ एक सूबे का शहंशाह है जो अपने आपे में नहीं / 'राम ने मिलाई जोड़ी एक अंधा दूसरा कोढ़ी' जैसे उम्दा फार्मूले से तैयार शिबू सरकार जो जोरका झटका धीरे से लगे तो भी बिखर जाये गी , एसे खौफ के साए तले हुकूमत चलाने को मोहताज शिबू सोरेन फ़ौरन से पेश्तर उस राह चल पड़े जो किसी जमाने में तब के गृह मंत्री ने अपनी बेटी को बचाने के लिए किया था / आयन्दा मीडिया के हडकाए शिबू क्या गुल खिलाएंगे ये तो वक्त ही बताये गा /
उपरोक्त बयान की दिमाग को भन्ना देने वाली रौशनी में आज हम किशोर आज्वानी के उस भरोसे को कसौटी पर कसते है जिसमे उन्होंने भरोसा जताया कि मीडिया ना तो उधर है और ना ही इधर है , वो तो बिच में है / मै यंहा यह साफ़ साफ़ कहना चाहूँगा कि मै आदमजात पुरखो के उस तजुर्बे से इतेफाक नहीं रखता जिसमे वो कहते है की बिच की स्थिति सदा माखौल का वायस बनती है / यक़ीनन ये वो बिच नहीं है जो मै समझ रहा हूँ या लोग बाग़ समझ रहे है , बल्कि ये वो बिच है जिसे में मीडिया खुद को देखता है , अपने लिए अपनी आँखों से जो देखता है वो ही मुल्क को या दुनिया तमाम को परोसता भी है /
तो फिर, ये हाय तौबा मचा देने तक के नाज नखरे क्यों , ये पहला सच है इस फानी दुनिया का कि पहले हम अपने लिए सचे होते है बाद में दुनिया तमाम आती जाती है / मेरे अलावे श्रीमन किशोर जी ही वो वाहिद शक्स हो सकते है जो शायद ये इतेफाक नहीं रखते की मीडिया आज की तारीख में उस  प्राणघाति डंडे में तब्दील होचुका है जिसके जोर पे मुल्क की मजलूम जनता को छोडिये शर्मायेदारो को भी हडकाया जा सकता है , बतौर नजीर शिबू सोरेन तश्तरी में चांदी की बर्क लगा कर पेश है ही /
फिर मिलते है ..../  
             

महफूज भाई की कातिलाना खूबसूरती !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;




दोस्तों,
अपने सुसंयत भाव और खुशमिजाजी के लिए खूब जाने जानेवाले खुशदीप सहगल जी ने जो सलाहियत भरी बाते बतौर टिपण्णी मुझे लिखी उसे मै अपने सर-माथे लगाता हूँ /
सहगल साब ने जो बाते महफूज जी के बाबत कही उसे सोलह आन्ना सच्च मै भी कबूलता हूँ , इसकी मुझे दरकार नहीं कि मै तस्दीक करता फिरू बल्कि पक्के तौर पर जानता हूँ महफूज एक साहसी और रंधीर शख्सियत है , मगर मै इस हक में नहीं कि नवाबो की तहजीब वाली मशहूर शहर ब्लोगिंग के नाम पर दुनिया में रुसवा होती होतो गमखार बना बैठा रहू क्यों की समूची दुनिया जानती है कि लखनऊ का मतलब है जुबान की मिठास से दिल पर बादशाहत कायम करना और हमारे महफूज भाई वो ही भूल गए , मेरी समझ से ये एक हाहाकारी वाकिया है /
खुशदीप जी ने आखिरी जुमले तक सच्च लिखा कि हमारे इर्दगिर्द लिखने समझने के लिए हजारो हौलनाक मसले मचलते मिल जायेंगे जो देश और समाज की जान खाए जा रहे है मगर मुझ आफत के पुतले ने फिर भी जहमत ये उठाई की किशोर-महफूज की जुगलबंदी पर ही लिखना गंवारा किया तो फक्त इस लिए कि जिस बिंदास अदा से महफूज भाई बेबाक होकर लिख गए उसकी रोकथाम तो होनी ही चाहिए थी और जिस किस्म की रोकथाम किशोर आजवानी कर रहे थे वो किसी भी नजरिये को मुनासिब इन्साफ दर्ज नहीं करती थी लिहाजा मैंने अपना रूख तल्ख़ किया ना की गैर मुनासिब किया / मैंने ये तोहमत नहीं महफूज भाई पर  आयद नहीं की कि महफूज जी ने किशोर जी को अपशब्द कहे बल्कि अपना विरोध ये कहकर दर्ज करवाया कि कान उखाडू टिपण्णी जहर बूझे लफ्जो की मुहताज नहीं /
                                     बांकी रह गयी बात ब्लोगिंग की तो खुलासा करना बेहतर होगा कि दूसरे हजारो ब्लोगरो की तरह ब्लोगिंग मेरा भी सगल ही है ना की रोजीरोटी का जरिया / पिछले दो दशक भी ज्यादा वक्त से बतौर ज्योतिषी के पुरजोर सलाहियत और ईमानदारी से एक ही मुकाम पर टिक कर दो वक्त की रोटी प्रभु का नाम लेकर खा रहा हूँ / ना तो मै इस मुगालते में हूँ की महफूज जी का नाम भज कर ब्लॉग बैतरनी पार कर कारू का खजाना पा जाउंगा , ना ही ये खामख्याली में हूँ कि आज मै किशोर आजवानी की तरफदारी करूंगा तो कल बा-जरिया किशोर आजवानी स्टार न्यूज़ में तिन देवियों वाले प्रोग्राम में अक्ल को बीमार करने वाली मगर दुनिया को अपने हुसन से हैरान परेशान कर देने वाली  उन तिन महिला नजूमियो की जगह मुझे मिल जाए गी / मैंने तो सवाल महज तमीज और तहजीब के बाबत उठाया था जो की मेरे हिसाब से असुबिधा वाली बात जरूर थी /
अंत में , फिर से महफूज जी वाले शिरे पर आता हूँ की मेरी उनकी कोइ जाती अदावत तो है नहीं / मै इतना भी गाफिल नहीं की उनकी उरमा को ना समझू लेकिन ये वाही ताजूब की बात है की उनके जैसा अच्छी तालीम रखने वाला बन्दा क्यों कर भूल करे गा /
थैंक्स/ 
                  

Tuesday, February 16, 2010

खुद को खूबसूरत मानने वाले महफूज भाई को किशोर आज्वानी से मुआफी मांगनी चाहिए !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
''माई नेम इज खान एक बेजोड़ फिल्म है ''
महज इतना ही किशोर आज्वानी ने उचारा था की हमारे ब्लॉग जगत के स्वनाम धन्य शाहरूख खान याने महफूज भाई आपे से बाहर हो गए और रूपक मडोक के तिजारती फितरत की आड़ में मीडिया वालो में खासुलखास स्टार न्यूज को अच्छी-खासी झाड पिला दी, बला की हुनर दिखाते हुए मीडिया वालो को जूठन चाटने वाला भिखारी भी बताने से गुरेज नहीं किया / खुद को चहेता ब्लोगर बताने वाले महफूज जी ने लखनऊ जो तमिज की तहजीब के लिए समूचे दुनिया में जाना जाता है अपनी जुबान से लगाम खूब खुल्ली छोड़ दी और जुबान-दराजी की इन्तहा करते हुए शाहरूख खान को कुत्ता तलक बयान किया , साथ ही शाहरूख खान ने देश के लिए क्या किया जैसा अहम् सवाल भी उठाया जो वो भूल रहे है की भले ही खान इस्लाम की नुमाईंदगी नहीं करते हो या कोइ उसे खारिज करता हो मगर शाहरूख को कंही भी दुनिया में जाकर ये जाहिर करने की जरूरत नहीं कि वो कान्हा के सभ्य समाज की नुमाईंदगी करते है क्यों की वो भारत के समरस और प्रोमिसिंग समाज का आईना है , लिहाजा शाहरूख को कुत्ता बताने बाले को खुद से पहले यह पूछना चाहिए की वो  बेहूदगी भरी बाते ब्लॉग इन कर किस किस्म की हिस्सेदारी भरपाई कर रहे है / उनका अपने देश को छोड़े अपने मशहूर शहर लखनऊ को क्या योगदान दे रहे है , बांकी बाते तो बढ़ चढ़कर बाद में तै कर लेंगे , पहले तो ये ही तै कर ले की वो सारे नहीं महज चंद ब्लोगरो में ही मशगूल या मशहूर है ना की सारे ब्लॉग जगत के ,बांकी दुनिया भर के ब्लोगर का तो नंबर ही नहीं आता  मेरा दावा है भतेरे ब्लोगर तो उन्हें पहचानते भी नहीं होंगे , दस हजार या उससे ज्यादा हिंदी ब्लोगरो की बात तो दूर की है ,किसी जगह मैंने पढ़ा था की महफूज मिया हमारे ब्लॉग जगत के पहले ब्लोगर है यानी सालो से ब्लोगिंग कर रहे है जब की उनके ब्लॉग पर एक भी विदेशी फोलोवर की तस्वीर तक नहीं जो उन्हें कमसकम ये तगमा तो दिलवाता की वो हिन्दुस्तान के बाहर भी जाने जाते है जब की शाहरूख ने  हिन्दुस्तान के बाहर और भीतर दोनों जगह ना केवल पहचान कायम की बल्कि हिन्दुस्तान में बहने वाली उस फिजा के बारे में सारी दुनिया को बताया की वो कितनी सुरक्षित और शेहदमंद है कि एक मुस्लिम भी अपनी बात पूरी ताकत से रख सकता है /
पुनश्च, हिंदी ब्लॉग जगत के स्वनाम धन्य उर्फ़ प्रथम ब्लोगर ने यह भी इतेफाक जाहिर किया की वो शिव सेना से इतेफाक भी रखते है , जो दूसरे लफ्जो में यूं कहा जाये तो वो ये बयान करते है की जैसे शिव सेना देश भक्त है वैसा ही कुछ वो भी है / तो महफूज भाई ये समझ ले की शिव सेना कोइ देश भक्त नहीं वो महज अपने निजी नफे-नुक्सान की बेहतरीन तमीज रखने वाले चंद स्वार्थी लोगो का जमौडा मात्र है , यदि वो देश भक्त और वतन पर कुरवां होने वाले सरफरोश होते तो राज ठाकरे टूटकर जुदा न हुआ होता , ये तो सत्ता लोलुप चंद राजनीतिबाज है जिनके आपसी स्वार्थ आपस में यूं भीड़ गए कि राज ठाकरे को ये लगा की मेरी दाल कभी गले गी ही नहीं तो उसने बिहारियों के खिलाफ अलख जगानी शुरू कर दी / क्या बिहार वाले या उत्तर भारतीय पाकिस्तान से आये है वो भारतीय नहीं है , क्या वो देश भक्त नहीं है आतंकवादी है जो शिव सेना और राजठाकरे लठ्ठ लेकर कुचलने को आमादा है / महफूज भाई आप बताओ आप किस किस्म की शिव सेना या राज ठाकरे से इतेफाक रखते हो , मेरी नजर में देश प्रेमी सिर्फ और सिर्फ एक ही कौम है और वो है हमारे अमर जवान , जो एक इशारे पर भले ही तब आग का दरिया बहता हो , मौत बावलों की तरह अट्टहास कर रही हो मगर हमारे जवान अपने प्राण नौछावर करते देर नहीं लगाते और उन्ही के प्राणोत्सर्ग की कीमत को कायम रखने की मिन्नत समाजत करती है ये फिल्म की हम सभी मिलकर एक रहे /
किशोर आजवानी ने महज खान फिल्म की तारीफ़ ही लिखी ये तो नहीं कहा की पाकिस्तान में बनी किसी चोर उचक्के की फिल्म देख आओ , फिर लोगो ने गिनती करवा दी की फिल्म को सुपर डुपर हिट करवाने का जिम्मा मीडिया का दिया है और तो और यंहा तक कह डाला की मनमोहन सिंह की सरकार को कारन जोहर ने खासुलखास मिशन दिया है की उनकी सरकार और दूसरे हुक्मरान खाली टाईम पास कर रहे हो चलो सदुपयोग करो और खान की फिल्म हिट करवाओ , और जैसे हिन्दुस्तान के हुक्मरान खबास हो चल पड़े हुक्म तामिल करने / मै नहीं समझता की इस बे सीर-पैर के इल्जाम की सफाई किशोर आज्वानी को देने की जहमत उठानी चाहिए /
बांकी ना मै कोइ जिद्द करता और ना ही दस्तूर से इनकार करता हूँ की महफूज भाई को किशोर जी से सौरी नहीं कहना चाहिए /
आमीन !     
        

हम फिर से नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है , क्यों की उपरवाले का कुफ्र है टूटेगा जरूर !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
अब तो जैसे रविवार का दिन ज्यू ज्यू नजदीक खिसकता आता दिखता है वैसे वैसे दिल बैठने सा लगता है , कहने को दिन तो ये छूटी के लिए मुकरर है मगर मशरूफियत असल में अपने उफान पर होती है , हप्ते भर बांकी दिनों की डेली रूटीन किसी भी सूरत में तकलीफदेह ना रहे इसके जुगाड़ में रविवार का सारा वक्त जाया चला जाता है / तक़दीर और देवता भी इस दिन मुंह फेर लिए महसूस हो जाते है जो रविवार को कोइ मुलाक़ात करने चला आये क्यों की यदि आगंतुक की तीमारदारी ना हो तो ये बे-अदवी में गिनती होगी और यदि बे-अदवी करे तो आईंदा सप्ताहंत तक बुरे-बुरे अंजाम भुगतने पड़ेंगे / इससे भी बुरा क्या हो सकता है कि यदि कोइ हादशा रविवार को पेश आ जाए , तो यूं जाने बांकी सातो दिन गयी भैस पानी में /
गत रविवार को यूं लगा मानो दुनिया ने आपना दस्तूर बदल दिया है और पृथ्वी अपनी धुरी पर उलटी घूम रही है / अपने ब्लोक की आवारा कुतिया ने इकठ्ठे आठ दस पिल्लो को ज़ना था / उसकी फलती-फूलती गृहस्थी किसी की आँखों में शूल बने ये भला क्यों कर होता / सो लोगबाग ने कोइ तवज्जो न देनी थी और ना ही दी / मगर कुतिया ने और उसके लिविंग पार्टनर कुत्ते ने पास के पार्क में खेलने जाते तिन चार बच्चो को इस मुगालते में काट खाया की वो उसके पिल्लो के लिए खतरा-ए-जान बन सकते थे / वाकिया चुकी बच्चो की हिफाजत पर सवालिया निशान बनाता था लिहाजा पडौसी सरदार मंजीत सिंह जी ने मीटिंग बुलाली सारे ब्लोक बालो की और यक्ष प्रश्न रखा की कुतिया के आतंक से कैसे महफूज रखा जाए बच्चो को / पुलिस को इतला दी जाए इससे बेहतर सुझाव कोइ ना दे सका,क्यों की दिल्ली नगर निगम कितनी चुस्त-दुरूस्त है ये कोइ कहने की बात नहीं है , अलबता कार्य क्षेत्र और जिम्मेदारी तो उसी की बनती है तो भी ब्लोक वालो को पुलिस वालो पे ज्यादा भरोसा जगा /
भले ही मैंने तहे दिल से सोचा पर नहीं चाहता था की पुलिस को ये ब्योरा मै परोसू , पर मुसीबत जो आनी थी वो बा-कायदा पैर जमा कर घर बैठ चुकी थी अब तो केवल उसे भुगतना भर था जो की मैंने भुगती भी / पर क्या हुआ जो अंजाम ठाकरे बनाम शाहरूख खान का हुआ वो ही ब्लोक के आतंक का हुआ याने टाँय-टाँय फिस्स !
मैंने सरदार जी के तकादे के जोर से तिन बार कुतिया और कुत्ते के सिरफिरे होने की रिपोर्ट दर्ज करायी और खूब मिन्नत-समाजत की पर आज तीसरा चोथा दिन बितने को आया कोइ साबूत पुलिस छोड़ो उस नामकी चिड़िया तक झांकने नहीं आई / हार कर मैंने नगर निगम का दरवाजा खटखटाने जैसा दोहरा करदेने वाला रास्ता भी आजमाया पर शकुन पैदा कर सकने वाले आसार अभी भी नदारद है और     
वो कुत्तिया आज भी वैसी की वैसी चौड़ी छाती किये गफलत में शिकार दर शिकार किये जा रही है और हम फिर से एक नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है क्यों की उपरवाले का कुफ्र है तो टूटेगा जरूर !       
         
        

Saturday, February 13, 2010

गए थे हरी भजन को ओटन लगे कपास !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
गए थे हरी भजन को ओटन लगे कपास !
यह मशहूर कहावत मेरे साथ बिलकूल तब फिट बैठ गयी जब मैंने शिव सेना पर ज्योतिषीय लेख लिखने की सोची और उस बाबत जब असलाह इकठ्ठा करने निकला तो मुझे इल्म हुआ की मेरे पास इतनि  जानकारी हो गयी है की मै उसे एक राजनैतिक लेख के तौर पर कुछ अनुभव बयान कर सकता हूँ लिहाजा नतीजा आपके सामने है /
जून 1966 में  बाला साहेब ठाकरे ने शिव की सेना की बुनियाद खड़ी की थी /
समझने समझाने के लिए ये हैरत अंगेज बात है कि साठ की सदी में ''मार्मिक'' नाम की एक साप्ताहिक पत्रिका में एक अदना सा कार्टूनिस्ट अपने फ़न से वो क़यामत नहीं ढहा पाया जब की एक गैर-राजनितिक संगठन में एसी धार पैदा कर दी कि दुनिया तमाम में पुख्ता लोकशाही की ज़िंदा मिशाल हिन्दुस्तान हांफने लगा / ये तो एक जाहिर सी बात है कि कुनैन निगलेगे तो कै और दस्त तो होगे ही, लिहाजा हिन्दुस्तान के पेट में तब से अब तलक मरोड़ उठ रहे है और हिदुस्तान की तबियत नासाज ही चल रही है /
आजादी के बाद अपनी धंदे पानी की खासी अच्छी समझ रखे के लिए कमोबेश कुख्यात या मशहूर गुजराती और मारवाड़ी कौम सबसे पहले मुम्बई पंहुची, और दोनों ने बिंदास रहकर हर किस्म के धंदे पानी में अपनी पुरजोर दखल बनायीं, पीछे पीछे दक्षिण भारतीय भी आ पहुंचे जिनके हालत कमोबेश आज के उत्तर भारतीयों जैसे ही थे /
''भूमिपुत्र'' का नारा लगाती उठी शिव सेना तूफ़ान बनकर दक्षिण भारतीयों पर टूट पड़ी और उनका दम तोड़कर ही मानी, दूसरी ओर चतुर सुजान कांग्रेस ने इस उधमबाजी को खातिर जमा रखते हुए ''लोहा लोहे को काट खाता है '' जैसे आजमाए हुए नुस्खे को कोम्युनिस्ट मजदूर ताकत के खिलाफ इस्तेमाल में लिया जो बिलाशक फायदा बक्श फार्मूला साबित हुआ / तब के दादर संसदीय क्षेत्र के सांसद कृष्ण देसाई की हाहाकारी ह्त्या हो गयी और कोम्युनिस्ट की थाती इतिहास की भूली बीती बात बन गयी /
कोम्युनिस्टो के सफाए के बाद, कांग्रेस सत्ता के भोग में निमग्न हो गयी जब की शिव सेना के लिए मुद्दा बिहीन बंजर भई कर्म भूमि छोड़ दी जो किसी  बीहड़ में  भटकन जैसा दारुन कष्ट ही दे सकता था /
फिर बिल्ली के भाग से छिक्का टूटा और भगवत कृपा हुई , गुरू जी ने गुरू मन्त्र कान में फूँका याने भाजपा ने दर्शन बखान किया और दारुन त्रासदी का अंत हुआ / दोनों की जुगल बंदी उन्हें प्राप्त अंतर ज्ञान से परम आनंद देने वाली साबित हुई / कट्टर वाद और दोनों के  चोली दामन के रिश्ते ने खूब गुल खिलाया और कांग्रेस को धुल चटा दी / कंगाल हुई कांग्रेस 1995 में सत्ता से बेदखल हो गयी जब की शिव सेना काबिज हुई /
देखा जाये तो आजाद हिन्दुस्तान में कट्टरवाद का ये स्वर्ण काल 1999 में ही खत्म हो गया / जादू का जादू ख़त्म हो चुका / अब बीजेपी और शिव सेना उसी जादू की तलाश में तड़प रही है / कांग्रेस की लोहा काटो निति राज ठाकरे के साथ है और कभी साथ रहे बाला साहेब के खिलाफ है लिहाजा चतुर सुजान तो कांग्रेस है जिसका सुदर्शन चक्र चंहू ओर वार करता है / जय हो कांग्रेस माता की !      

Thursday, February 11, 2010

मेरा पक्का ख्याल है यदि ये चुगलखोरी बंद नहीं हुयी तो ...!

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;





दोस्तों.
आज के तेजरफ्तार दौर में इन्शान की जरूरते काफी बढ़ी-चढ़ी रहती है , सर चढ़ कर बोलती जरूरते उसे अपने सुभीते के लिए रोज एक नयी ईजाद के लिए उकसाती रहती है / इसी चक्करबाजी में  शायद टेलीफून का औतार हुआ होगा / टेलीफून  एक एसी मजेदार मगर अक्ल को  हैरान परेशान कर देने वाली ईजाद है जो दुनिया के दो जुदा जुदा आखिरी छोर पर बैठे
दो बन्दों को यूं आसान सी गुफ्तगू करवा देता है जैसे मानो दोनों आमने सामने सहज बैठे गप्पे लड़ा रहे हो / मुझे ये नहीं पत्ता की टेलीफून किस उस्ताद आला दिमाग वैज्ञानिक की ईजाद है और ना ही मै उसका फिरंगियों जैसा कोइ चुभता सा नाम जानने के लिए मरा जा रहा हूँ इसकी वजह शायद कुछ हद तक यह है की मै उससे थोड़ा रूक रूक कर खफा हूँ मगर सही मायनों में पूछे तो एक मुस्त यदि मै खफा हूँ तो उस उस्तादों के उस्ताद से हूँ जिसने चोंगे वाले टेलीफून से चार कदम आगे जाकर मोबाईल टेलीफून जैसे नन्हे शैतान को ईजाद किया है जिसे जब जन्हा जैसे चाहो इस्तेमाल कर लो / यदि आप चार जनों के बिच बैठे हो और आपकी मनसा उन्हें अलहद रखने की है तो परायो की तरह बेलाग छोड़कर खामोशी में चले जाओ, आप कभी घरवाली के साथ हो और जाननिसार का दावा ठोकने वाली प्रेयसी की कॉल आ गयी तो कोइ टोटा नहीं, धर्मपत्नी को टका सा समझाओ की दीक्षा देने वाले गुरू जी की कॉल है और सन्नाटे में जाकर अभिसार वार्ता का लुफ्त उठाओ /
मोबाईल फूंन ईजाद करने वाला काफी घिस्सा हुआ बन्दा रहा होगा, उसने इस आला दर्जे की मशीन में नंबर या नाम की चुगलखोरी करने वाला पुर्जा भी जोड़ा हुआ है जो कॉल बजने के साथ कॉल कर्ता की समूची पोल खोल देता है , बांकी मोबाईल धारक मनसा ना हुई तो फूंन पें-पो करता रहे गा , पर वो बेरहम पत्थर दिल सुनके राजी नहीं होगा /  मेरी और मोबाईल की जानी-दुश्मनी इसी मुहाने से शुरू होती है / यदि मोबाईल फून की शक्लोसूरत में चुगलखोरी वाला पुर्जा मुत्वातर कायम रहा तो मेरा पक्का ख्याल है की इंशान को इन्शान के दर्जे  से बेदखल होना ही पड़े गा / समाज अपनी दिशा भूल सकता है / हर बन्दा जो मोबाईल फून इस्तेमाल करता है वो बे-लज्जत झूठ बोलने का गुनाह करता ही रहता है / होते है साऊथ दिल्ली के किसी बार में कहते हो मंदिर में हूँ , बैठे होते है घर में कहते हो शहर से बाहर हूँ / होते है प्रेयसी के साथ डिस्कोथिक में कहते है मिलाने वाला चलता रहा मुसान में हूँ / और ना जाने कितने वैगेरह वैगेरह /

मैंने बुरे से बुरा ये किया की अपने एक प्राणप्यारे मित्र को जरूरतमंद जानकार थोड़ा धन उधार दे दिया , बस उसी वक्त से ऊपरवाले ने मुंह फेर लिया और मोबाईल फून से अदावत की बुनियाद डल गयी / तैशुदा वक्त के बाद जब मैंने तकादा चालू किया तो उसी दरम्यान मोबाईल फून की शैतानी ताकत देखकर रूह फन्ना गयी / प्राणप्यारा मित्र जमना पार रहता है और मै रोहिणी लिहाजा मोबाईल फून का तो इस्तेमाल होना लाजमी था और मुझे जमीं सुंघनी ही थी / उस प्राणप्यारे ने तमाम दुनिया जन्हा का झूठ पानी पि पीकर बोला / वो जमी पर था तो कहा पाताल में हूँ , आशमा में था तो कहा मंगल ग्रह पर हूँ / उसके झूठ की फेहरिस्त शैतान की आँत से भी बड़ी थी और उस नामाकूल का इकलौता मददगार यदि कोइ था तो वो था इन्शानियत का कातिल मोबाईल फून /                        
 आधुनिक संसाधनों ने जितनि सुभिसता हमारी जिंदगी परोसी है वैसी पहले कभी ना थी यह मै तहे दिल से कबूलता हूँ मगर इन्शान में शैतान की फितरत हाबी हो जाए तो वो भली सी लगने वाली चीज का भी वो किस्म का इस्तेमाल कर के दिखा दे सकता है की शैतान भी पनाह मांगता दिख जाए /

थैंक्स / 

Monday, February 1, 2010

हिदुस्तान का सबसे बड़ा ज्योतिषी कौन !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;

 


दोस्तों,
आये दिन ब्लोगरो के बिच जुदा जुदा वाजुहात से ज्योतिष को लेकर बहसबाजी चलती रहती है / एक तबका ज्योतिष के पक्ष में होता है जबकि दूसरा ज्योतिष के वजूद को ही कब की फांसी हो चुकी बताता है और दोनों तरफ के ब्लोगरो में आग उगलती बयान बाजी होती है जब की कुछ ब्लोगर तमाशबीन बने रहना ही फायदेमंद मानते है और कुछ दूसरे किस्म के ब्लोगर गुमनाम बने रहकर भद्दी भद्दी बाते करके दूर से ही तालियाँ पीट कर खुश हो रहे होते है की '' चलो बेवकूफों को रास्ता दिखला दिया ''
इस चक्करबाजी में ज्यादातर फ़ायदा उस ब्लोगर का होता है जिसने ज्योतिष को फांसी चढाने जैसा प्रोग्राम एक खूबसूरत से लेख के तौर पर शगूफा ब्लोगरो के बिच उछला होता है क्यों की इस दरम्या उसके ब्लॉग की टीआरपी आशमा चूम रही होती है / बांकी यदि प्रभु मेहरबान बहुत ज्यादा हो तो कभी कभी बाजी ज्योतिष के हक़ में भी चरखी हो जाती है और बहस मुबाहसे का फ़ायदा ज्योतिषियों को मिल जाता है अलबत्ता इसके आसार बड़े कमजोर रहते है क्योकि ''महान'' ब्लोगर द्वारा सवालात कुछ इस पेचीदगी के साथ परोसे गए होते है की ज्योतिषीयो की रूह भी फन्ना जाये /
यानी लाबोलुआब ये निकला की ज्योतिष की बखिया उधेड़ो नाव तो खुद-बा-खुद पार लग जाये गी और अंधविश्वास को ढेला फेंक कर मारने की वाह वाही बटोर गे सो अलग / अब तो हांले जूनून ये है की अदने से ब्लोगरो की छोड़े साहबे मिनिस्टर भी ज्योतिष सहारा लेने में गुरेज नहीं करते / मसलन अपने कृषि मंत्री शरद पवार को ही ले /  उनसे बड़ा कोइ क्या खाकर ज्योतिषी पैदा होगा जो वो उनकी जैसी पच्चीस फिसद्दी भी कामयाब भविष्य वाणी कर के दिखा सके / क्योकि जनाब पवार साब जो भी कहते है वो बशुदा हर्फ़ तक सत्य होता है / उन्होंने उवाचा गेहूं महंगे होंगे तो होगये , उन्होंने फरमाया चीनी कडवी हो जाए गी तो वो भी हुई और उन्होंने कहा दूध महँगा होगा तो वो भी हुआ / अब आप बतावे हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा ज्योतिषी कौन , मै, आप या बेजान्दारू वाला / जवाब एक ही है जिसपर किसी को क्योकर इत्तेफाक नहीं होगा की श्री मान शरद पवार ही हिदुस्तान के सबसे बड़े ज्योतिषी है /
मेरा ख्याल है जिसमे उम्मीद है आप भी हम ख्याल होंगे की उन महान ब्लोगरो को अब यक़ीनन समझ हो गयी होगी की ज्योतिष को लेकर शक सूबा करना उचित नहीं क्यों की शरद पवार ने अपनी ज्योतिष से उनके लिए तिल बराबर भी जगह नहीं छोड़ी और यदि छोड़ी है तो वो अंगुली उठाके दिखावे /
थैंक्स/