Friday, December 17, 2010

ख्समानू खानू खबरिया चैनलों की मौत की दुहाई मांगता एक लेख !

शाशिभूषणतामड़े उवाच;











दोस्तों 
 लोकतंत्र में मिडिया को तीसरे खम्बे के तौर पे अहमियत दी जाती है , यदि कार्यपालिका और न्याय पालिका दोनों अपने दायित्व से च्चुयुत हो रहे हो तो निरीह जनता को मीडिया का ही सहारा रहता है / मगर इतने बड़े दायित्व को धारण करने वाले मीडिया का क्या हाल हुआ पड़ा है कोइ छुपी बात नहीं है / आज मीडिया के नाम पे दो साधन आम जन को मुहैय्या है जो न्यू ज  पेपर और टीवी की शक्ल में है /
आज आप जीस किसी न्यूज चैनल को खोल कर बैठ जाये/ कुछ समय में ही आप यह अहसास पक्का करके उठ खड़े होंगे कि न्यूज के अलावे वो सब कुछ खबरिया चैनलों पे पुरजोर दिखाया जा रहा  है जो बकवास और बेहूदा है , वो चाहे कोइ भी चैनल हो आजतक , स्टार न्यू ज , इंडिया न्यूज , या कोइ और सभी बोगस और बेहूदा कार्यक्रमों से भरे पड़े होते है / एक सुबह सभी चैनलों पर बाबा लोग उबकाई ला देने वाले सर खाऊ भाषण से शुरू हो जाते है / बाद मे ,बाबा लोग जाते नहीं कि ज्योतिषी बाबा राशि फल सुनाने के नाम पर डरावने अंदाज अपना धंदा चमकाने आ पहुँचते है / एक से बढ़कर एक थ्री पिस सूट पहनने  वाले ज्योतिषी बाबा लोग फरांटे दार अंग्रेजी में लोग बाग़ को ग्रंहो के नाम पर उलू बनाते नहीं थकते / स्टार न्यू ज वालो ने तो हद्द ही कर दी / ''तिन देवियों'' को अर्ध नग्न अवस्थ में ही ज्योतिष का पाठ पढ़ाती  सुकुमार कन्याओं को परोस दिया ताकि जिस किसी को ज्योतिष ना सुहाए वो ज्योतिशिनी से ही संतुष्ट हो ले / ईन ज्योतिषियों को खुद के अगले पल का पता हो ता नहीं और लोंगो को अपनी अक्ल से बड़ी बातो में उलझाते दीखते है / एक ही राशी के चौबीस चौबीस फलादेश अलग अलग चैनलों पर सुन सकते है जो कि साबित करता है कि ये सब बेहूदा मजाक के अलावे न्यूज चैनलों की अक्ल दिवालियापण ही है जो उन्हें अपने उतरदायित्व से दूर ले जाकर ज्योतिषियों की शरण में नतमस्तक करता है /
ज्योतिषियों की बकवास पूरी नहीं पड़ती तो अक्ल खराब करने के लिए क्रिकेट महापुराण के नाम पर बखिया उधेड़ काण्ड शुरू हो जाता है / कभी सचिन का  उच्च स्वर से स्तुति गान किया जाता है तो कभी उसे  बुढ़ा शेर बताकर नकारते है कि अब उसे संन्यास ले लेना चाहिए / कभी धोनी  की टांग पकड़कर खींचा जाता है तो कभी किसी एक्सपर्ट से टीम इंडिया की डूबती नाव कैसे पार लगे इसके लिए रहस्यमय मंत्र पुछा जाता है  / याने टोटल हांसिल जमा यह कि दर्शक सोचता रहे कि टीम इंडिया ही इकलौती वो समस्या है जो भारत को उसकी तमाम दुश्वारियो से निजात दिला सकती है /
फिर शुरू होता है समय टीवी सीरियलों की समीक्षा का / किसकी सास कितनी कडक-सा है , किस सीरियल में बहू भारतीय परंपरा गत बहू के नाम पर कलंक है , किसने अपनी पत्नी के पीठ पीछे दूसरी औरत से चक्कर चला रखा है , किसकी बीबी कितनी नीच बुद्धि की है ये सब बयान करने वाले प्रोग्राम पूरी दरिया दिली से दर्शको को परोसा जाता है /
उफ़ , ये क्या ! मैंने उन करतबों को बयान किया ही नहीं जो फ़िल्मी यशो गान है / कौन सी हिरोईन अपने कपडे उघाडू कारनामो को अंजाम दे रही है , कोण सा हीरो किस हिरोईन को उड़ा लेजाने की जुगत में कितना कुशल है ये बखानने वाले प्रोग्राम भी न्यूज चैनलों के अजेंडे पर प्रमुखता से होते है /
बांकी बचे समय में भूतिया, तंत्र मन्त्र , अपराध , खून खराबे की महा गाथा गाने के लिए निहायत ही खौफ्जद्दा तरीके से पेश करने के लिए एंकर आ धमकते है / इनका भयानक अंदाजे बंया अन्दर तक हिला देने वाला होता है , इन प्रोग्रामो में नारा होता है , सोते होतो जाग जाओ , आ गया है सनसनी , और ना जाने क्या क्या बकवास करते है ये बेहूदा न्यूज चैनल वाले / 
कैसे टिकी रहेगी लोकतंत्र की ये खंडहर होती जा रही इमारत इस ढते तीसरे खम्बे पर / खुदा के हवाले ही है ये मुल्क /     

Wednesday, October 6, 2010

एक अदद ईमानदार की तलाश में !

शाशिभूषणतामड़े उवाच;













 प्रिय दोस्तों ,
अक्सर मिलने वालो से शिकायती लहजे में कहते हुए सुनता हूँ कि क्या बतावे सर ज़माना अब वो नहीं रहा कि भले लोगो का गुजारा हो सके , जिधर देखो बेईमान लोगो का जमौडा लगा पडा है जिन में झूठ फरेब , बेईमानी, धोखा और नमक हरामी कूट कूट कर भरी पड़ी है / मेरे एक दोस्त ने फिलोस्फराना अंदाज में अपनी जिंदगी का तजुर्बा बयान करते हुए फरमाया कि मेरे दोस्त  इन्शान धोखा हमेशा अपने खासुलखास से ही खाता है क्योकि परायो को क्या पत्ता कि किस मर्म पर घात किया जाए  ताकी बन्दे को ऐसा घाव लगे कि सारी जिंदगी सलाता रहे / अपनी बात को पुख्ता करने के लिए उन्होंने एक शेर भी सुनाया जो भतेरी बार पहले से ही मेरा सूना हुआ था और शायद आपका भी सूना हुआ हो कि '' हमें तो  अपनों ने लूटा गैरों में कंहा दम था , मेरी किस्ती वंहा डूबी जँहा पानी कम था '' / 
मेरा ख्याल है सरसरी तौर पर हममे से अधिकतर हमख्याल ही होंगे क्योकि ज्यातर लोगबाग अपनी अपनी जिंदगी में थोड़ा कम या थोड़ा बेसी इस किस्म की मुसीबतों से दो चार तो होते ही है कि वो भी मान बैठते है कि दुनिया तो बस बेईमानो की ही है /
मगर मै इस फिल्सफे से इतेफाक नहीं रखता जिसका ये मतलब भी कतई नहीं कि मैंने अपनी जिंदगी में मिठ्ठा-मिठ्ठा ही चखा है , नहीं बल्कि मै कंहू गा कि शायद मैंने जिंदगी में उतने कडवे वाकियो से दो चार हुआ हूँ जितना कोइ सोच भी नहीं सकता और फिर भी ये ही सोचता हूँ कि लाखो करोडो बुराईयाँ रोज घटित हो रही है देश दुनिया और समाज में फिर भी  सूरज चाँद अपनी नियति  नहीं बदलते , पवन ने बहना बंद नहीं किया , पानी फिर भी प्यास ही बुझाता है और ना जाने क्या क्या वैसे ही चल रहा है कुछ भी नहीं बदला / 
मेरा मानना है दो किस्म के प्रभाव की गिरफ्त में दुनिया चलती रहती है , एक वो प्रभाव है जो उपरी तौर पर दुनियादारी में दीखता है और हमें गफलत पैदा होती है कि सब कुछ इन्शान के चलाए चल रहा है जब कि दूसरी वो धारा होती है जो दुनियाबी सिलसिले को बांधे रखती है , ये वो बंधन है जो साश्वत नियमो के तौर पर होते है मसलन बेटा बाप से ही पैदा होता है , गुरूत्वाकर्षण , प्यार -मुहब्बत , सत्य अंतिम विजेता होता है , हर मौसम का अपना अपना मिजाज होता , वैगेरह वैगेरह ये वो नियम है जिसकी धुरी पर दुनिया आगे भी चलती ही रहे गी ये नहीं बदलेंगे / 
अंतिम जित सचाई और ईमानदारी की ही होती है / आज आप अपने आस पास गौर से देखे तो हर इन्शान एक अदद ईमानदार की तलाश में लगा है , एक बाप एक ईमानदार बेटे की चाहत पाल रहा होता है तो एक बेटा भी ईमानदार बाप चाहता है , एक भाई एक सच्चा भाई चाहता है , एक दोस्त भी दूसरा सच्चा दोस्त चाहता है , एक माँ सच्चा बेटा तलाश रही है तो एक पति सच्ची पत्नी चाहता है , एक बनिया एक अदद सच्चे ग्राहक की खोज में जिंदगी जाया किये देता है , भगवान भी सच्चे भक्त की तलाश में ही होते है , बिद्या भी सच्चे विद्यार्थी को मिलती है , देश की जनता सच्चे नेता की तलाश में है याने जिधर देखो सच्च और ईमानदारी की खोज चरम पर है , कोइ नहीं चाहता कि कोइ बे-ईमान उनकी जिंदगी में आये फिर भला क्यों कर हम दूसरो के लिए बे ईमान बने रहते है और क्यों कर दुनिया लूटेरो बे ईमानो की है /

Friday, June 25, 2010

दोनों ही रास्ते दोजख में जाकर खुलते है !

www.blogvani.com शाशिभूषणतामड़े उवाच;

 





दोस्तों,
मेरे अजीज दोस्तों की फेहरिस्त ,जो काफी लम्बी चौड़ी है , में जोशी जी का रूतबा बिलकुल अलहद और सबसे ऊँचा मगर प्यार भरा है /
वो जमुना पार बसते है / हमारा याराना कोइ पंद्रह सालो से फलता-फूलता आ रहा है / घर में ऊपर वाले की खूब मेहर है / घर में तजुर्बेकार माँ और सुगढ़ विचारों वाली पत्नी से दो बेटियां और एक आज्ञाकारी पुत्र है जो दुनियादारी भी खूब जानता बुझता है / याने कुल हांसिल जमा जोशी जी को गृहस्थी का सुख पुरे अहतराम से ऊपर वाले ने बक्शा है / बेहतर आमदनी के जोर पर जोशी जी ने बच्चो को बेहतर तालीम दिलवाने में कोइ क़सर नहीं छोड़ी / ताकतवर कोशिशो के सिले के तौर पर उनका छोरा और बड़ी वाली छोरी दोनों उच्चे ओह्द्दो पर नामचीन कंपनियों में अपनी रिजक कमा रहे है / याने जोशी जी खुश-खुश थे /
मगर किस्मत ने गुल कुछ यूं खिलाया कि सभी के होश फाकता हो गए /
एक सुबह जोशी जी का फोन आया कि छोटी वाली छोरी मधु [ काल्पनिक ] पिछली रात से गायब है /
यह बड़ी चौकाने वाली और होश गुम करने वाली बात थी / मुझे बड़ा सदमा लगा /
एक दिन और बड़ी भारी दुश्वारी के साथ काटने के बाद पुलिसिया कार्यवाही चलू कर दी गयी /
तीन महीने बड़े हाहाकारी गुजर गए मगर छोरी का कुछ पत्ता नहीं चला /
बाद में , मधु यकायक किसी तिल्स्मायी अंदाज में जैसे जादू के जोर से एक रेडीमेड ''प्यार'' के साथ प्रकट हुयी और वो भी कचहरी में / उसने बड़े दिलथाम लेने वाले अंदाज में जज साहेब को बताया कि वो उस अजिमोशान लडके से प्यार में गिरफ्तार है जो किसी और कौम से ताल्लुक रखता है और वो उस लडके से शादी करने की ख्वाहिशमंद है मगर उसे डर है कि उसके घर वाले इस मामले में उसकी पुरजोर मुखालफत करेंगे /

जोशी जी के साथ हम सभी मधु के खुदगरजी भरे व्यवहार से हतप्रभ थे / कचहरी में हाकिम के सामने पेश होने से पहले जोशी जी की एक छोटी सी मुलाक़ात अपनी बेटी से वही कचहरी में हुयी थी जो बहोत ही मर्म स्पर्शी और दिल को तोड़कर रख देने वाली थी /

रोते-रोते एक पिता ने बेटी से पूछा -'' तूने ये सब क्यों किया !''
जवाब में वो खामोश थी और लगातार उसे देख कर जारजार रो रही अपनी माँ से भी वो आँखे चुरा रही थी , जैसे उसे डर था कि माँ के आंसू कंही उसके अभियान को कमजोर ना कर दे / तभी जोशी जी ने दूसरी दलील रखी-'' तू ये तो सोंच कि तेरे इस कदम के बाद हम लोगो के बिच कैसे जा सकेंगे / अगर ये भी नहीं तो ये तो देख कि तेरी और उसके लड़के की संस्कृति दो जुदा किस्म की है , तुम दोनों में से किसी ना किसी को तो सब कुछ छोड़ना ही पड़े गा क्यों कि तुम्हारे लिए समाज का चलन नहीं बदल जाए गा , लिहाजा जो बेहतर लगे वो फैसला लो /
मधु वक्ती तौर पर खामोश रही और जोशी जी के सवालों का जवाब उसने जज साहेब के सामने अपनी शादी का प्रस्ताव रख कर दे दिया जिसकी प्रतिक्रिया में जोशी जी ने ठंडी सांस छोड़ते हुए कहा -'' शशि जी , मै तो बर्बाद हो गया भाई , मेरी सारी तपस्या , जीवन भर की कमाई वो अजनबी डाकू लुट ले गया /
मै इस लूट खसोट की दास्ताँ को रोमांचक प्रेम प्रसंग की चासनी में डुबो कर आपको नहीं परोसना चाहता / बल्कि यह इंगित करना चाहता हूँ कि कैसे कोइ संतान अपने पैदा करने वाले और पालने-पोसने वालो को बिच मझधार में छोड़कर जैसे जी चाहे छोड़कर मन चाहा फैसला थोप सकता है / ये तो हमारे सरल स्वभाव जोशी जी थे जो अपना सर रो पीट कर चुप कर बैठ गए / ज़रा कुछ जोर लगा कर कल्पना करे कि जोशी जी की जगह एक ऐसा बाप होता जो सर्व-शक्तिमान होता और वो तमंचा हाँथ में लेकर मधु और उसके अजीमो शान राजकुमार को जा कर दो-दो गोलिया खोपड़ियो में फोड़ आता तो क्या होता !
यही ना कि दूसरे दिन टीवी और अखबार में फिर एक नयी होनर किलिंग की दास्ताँ सामने होती और क्या /
मेरे विचार में फिल्मो ने नयी पीढ़ी को वाहियात प्यार को खुदा से उच्चा बताया और नौ-जवानो को भटकने के राह सुझा दी तो सामर्थ रखने वाले अभिभावकों ने अब होनर किलिंग की राह चुनी है / जबकि दोनों ही रास्ते आगे जाकर दोजख में खुलते है /          

     

Wednesday, March 31, 2010

गधे के पूत , यंहा मत मूत !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;














दोस्तों  !

अभी दो दिन पहले मैंने दो भले लोगो को दस्तूर से अलग मसले पर रगडा करते देख बेहद ताज्जुब में पड़ गया /
तस्दीक करने पर मालूम हुआ कि पहले वाले भद्र पुरूष उस जगह मूत्र त्याग करते रंगे हांथो पकडे गए जन्हा दूसरे वाले भद्र इन्शान ने बेहद खुल्लासा लफ्जो में लिखवा दिया था कि '' गधे के पूत,यंहा मत मूत !''
आप अचम्भित ना हों क्यों कि हिन्दोस्तान के गुजस्ता वक्त में ''मूतने''को लेकर बड़े बड़े बखेड़े खड़े हुए हुए है / मसलन अत्री ऋषि को ही लेले उन्होंने चुलू में उठा कर समुन्द्र पान कर दिया और बाद में हाहाकार मच जाने पर मूतने बैठे तो जाके समुन्द्र की जान में जान आई /
एक दूसरा बखेड़ा रावण और भोलेशंकर के बिच पैदा हुआ कि जब रावण शिव को लंकापुरी में निवासी बनाने की गरज से अपने सीर पर बैठा कर चला तो राह में रावण ने शिद्दत से मूत्र बेग महसूसा और शिवलिंग किसी को पकड़ा कर खुद मूत्र त्यागने बैठ गया / वो बैठा तो बैठा ही रह गया / थक कर दूसरे बन्दे ने शिवलिंग वन्ही जमीं पर रख छोड़ा जो आज मशहूर तीर्थ बैद्यनाथ धाम है /
याने मूत्र त्याग के नाम पे भी बड़े बड़े गुल खिल जा सकते है / अलबता यह एक सहज इन्शान की जिस्मानी जरूरत है / जो समयानुसार दोहराए जाने की जरूरत होती है / मगर यह सहज क्रिया यदि दुश्वारियो की गिरफ्त में आ जाए या बाधाओ से घिर जाए तो लेने के देने पड़ जाते है / यह जिस्मानी जरूरत कई एक दफा निहायत ही दर्दनाक तजुर्बे करवा देती है / कई दफा किडनी और प्रोस्ट्रेट जैसे अहम् शारीरिक पुरजो के बिगड़ जाने पर मूत्र त्याग में दिक्कते पैदा हो जाती है मगर मौजूदा मेरे इस लेख का उन हौलनाक बिमारी से कोइ वास्ता नहीं है मै तो उन हालातो के बाबत बाते कर रहा हूँ जो निषेधाज्ञा वाले इलाके में जबरन मूतने से पैदा हो जाती है / गाहेबगाहे आपने कंही भी आते जाते निम्न किस्म के खूबसूरत श्लोक दीवारों पर लिखे देखे होंगे कि यंहा मूतना मना है / उक्त मायने वाले निषेधाज्ञा श्लोक यदि कारामद तरीकों से असर नहीं दिखला पाते तो आजिज आया हुआ बन्दा नाराज हो कर यूं भी लिख डालता है कि ''देखो ! देखो ! गधा पेशाब कर रहा है / या फिर यूं लिखा मिलता है कि ''गधे के पूत , यंहा मत मूत !

आखिरी दोनों बयानों में लिखने वाले की चिढ बेखास्ता झलकती है याने कि वो लाख समझाने के बावजूद लोगबाग द्वारा निर्दिष्ट जगह पर मूत्र त्याग जैसा नेक इरादा नहीं टालते देख निषेध कर्ता लिखने पर मजबूर हो जाता है कि -'' देखो ! देखो ! ....या ....यंहा मत मूत .../
हिन्दोस्तान में हुकूमत जिन कायदे-क़ानून के बुनियाद पर अपने निजाम को अंजाम देता है उसमे ज्यादातर, या यूं कहे उम्मीदन पिन्चान्वे फीसदी कायदे-क़ानून को तो आवाम के दुःख-तकलीफ से कोइ सरोकार ही नहीं होता / और बढ़-चढ़ कर कहे तो यह कहना ज्यादा चोखा होगा कि पिन्चान्वे फीसदी कायदे-क़ानून तो लागू ही इस वजह से है , क्यों कि वो आवाम के दुःख-तकलीफ में काफी कारआमद तरीके से इजाफा करते है / बांकी के कुछ फीसदी कायदे-क़ानून जो सचमुच मुल्क के फायदे के है वो यूं बोलके फ़ायदा वसूली नहीं दे पाते क्यों कि खुद जनता ही उसे प्रोपर तव्वजो नहीं देती और दूसरे बांकी जो कुछ एक फीसदी फायदेमंद कायदा-क़ानून कुल हांसिल जमा बचते है उसे लागू करने के नाम पे खुद निजाम सुस्ती बरतनी शुरू कर देता है / गोया कि वो ही ढ़ाक के तीन पात !   
मूत्र त्याग को लेकर हिन्दोस्तान में अवाम और हुक्मरान दोनों ही किसी भी नजरिये से बहोत ज्यादा गंभीर नजर नहीं आते / जन्हा कंही अदब से पेश आने वाले बाबू लोगो का जुड़ाव होता है वंहा तो बिलायती हिसाबदारे वाले संसाधन खूब मिल जाते है परन्तु दूर-दराज में आज भी पशुवत ही मूत्र त्याग की परम्परा बाबा आदम के हिसाब से जारी है / मै ज्यादा दूर जाकर नहीं देख रहा बल्कि मुल्क की राजधानी दिल्ली की बात कर रहा हूँ / आज भी राजधानी में लोगबाग में खुल्ले घोड़ों की तरह ही जन्हा जैसे चाहे मुंह उठा कर खड़े होते  बेखास्ता देखे जा सकते है /  सिक्के के दूसरे पहलू की निस्बत बात करे तो खुद निजाम ने जो ''जनसुविधा'' के नाम से सुविधाए मुहैय्या करवाई हुई है वो इतनी नाकाफी है कि एक वक्त में एक जोड़ी से ज्यादा लोगबाग हलके नहीं हो सकते / जब कि भतेरी जगहों पर तो लम्बी कतारे दम तोडती ही नहीं दिखती / जो कि मुहैय्या सुविधा की खूब पोल खोलती है /
आईंदा कुछ महीनो बाद  दुनिया तमाम से लोगबाग विश्व स्तरीय खेलकूद प्रतियोगिताओं के लिए जुटने वाले है / तैयारियां जोरशोर से चल रही है , मगर जो विश्व दर्शक का जमौडा आवेगा वो क्या तजुर्बा लेकर जाएगा यह सोच से परे नहीं, यक़ीनन वो हिन्दोस्तान को बेकायदे घोड़ो की तरह मूतते देख नायाब अनुभव हांसिल करेगा / जो आगे उनके मुल्क में हमारे शान में कसीदे पढने के काम आवेगा /
नहीं ज्यादा तो दिल्ली हुकूमत को चाहिए कि वो आवाम में जागरूकता पैदा करने के लिए कुछ अभियान चलाए ताकि लोग बाग़ इस पशुवत और बेहूदा आदत से निजात पा सकें /   

Thursday, March 25, 2010

लाडली नगर बधू के नखरे हजार उठाये कौन १

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;

दोस्तों,
वो चाहे अच्छाई हो या फिर बुराई !
पर यदि वो, चाहे या अनचाहे ,हमारे शख्शियत से जुड़ गयी है तो एक वक्त ऐसा भी आता है जब वो अच्छाई या बुराई हमारे जी का जंजाल भी साबित हो जाती है क्यों कि लोगबाग उसी के आदि बन चुके होते है और जब उस की कमी खलती है तो बैचैनी पैदा होती है / मसलन दिल्ली मैट्रो ट्रेन को ही लेले / राजधानी वालो को ही क्यों समूचे हिन्दोस्तान के लिए ये आन बान और शान का मामला है दिल्ली मैट्रो , मुल्क का हर बाशिंदा इस सहूलियत पर इतरा सकता है / मैट्रो का सफ़र हर सवार मुसाफिर को इतराने का मौक़ा देता है जो वो ये महसूस सके कि बिलायती मुल्को के मुकाबले में हम हिन्दोस्तानी भी कम नहीं /
पीछे मेरे एक दोस्त ने बातो-बातो में मैट्रो के बाबत जो ख्याल बयान किये वो मेरे दिल को छू गए , यदि मै कोइ कवी या शायर होता तो उस बयान को भली तरह से बोलो में गूँथ कर आपके आगे परोसता , पर जो हो , मै वो तमाम बाते ज्यू की त्यु आपके आगे रखता हूँ -
मैट्रो तू मेरी राहते उसांस है /
मैट्रो तू मेरे फ़ौरन घर वापसी की इकलौती आस है /
मैट्रो तू मेरे बटुए की दांतदार चैन है / जो सदा मजबूती से बंद होती है /
मैट्रो तू दम तोड़ते पर्यावरण की संजीवनी बूटी है /
मैट्रो तू घर के बिगड़ते बजट में वो जोकर है जो हर पत्ते के साथ फिट है /
मैट्रो तू दिल्ली की इकलौती लाडली नगर बधू है, जो हर मुसाफिर चहेते को फ़ौरन गोद में लेकर ठंडा-ठंडा कूल कूल कर देती जैसे बीबी उसकी अपनी हो /
और ना जाने क्या क्या मेरे उस मित्र ने बयान किया पर जो लाबोलुआब था वो ये ही था कि मैट्रो में सवार मुसाफिर सफ़र खत्म होने तक तो यक़ीनन इसी ख्याल में ग़ुम हो जाता है कि वो किसी पराये बिलायती मुल्क में आ पंहुचा है / इसकी साफ़ सफाई ,चुस्ती और चाक-चौबंदगी  आला दर्जे की है  और इसकी इन्ही खसूसियत की वजह से मैट्रो दिल्ली वालो की लाडली बहू बनी है / जब मैट्रो नहीं थी तो ब्लू लाईन,वाईट लाईन और ना जाने किन किन कर्मजली लाईनों ने दिल्ली वालो को आठ-आठ आंसू रुलाया था जिसे याद करके रूह फन्ना जाती है / खैर , बिल्ली के भाग से छिक्का टूटा , मैट्रो आई और इस लाडली बहू ने खूब दिल्ली बालो का दिल जित लिया मगर ना जाने क्यों इधर जब तब इसका खुशगंवार मिजाज एकदम से बिगड़ जाता है और जब जन्हा जैसे भी रूठकर खड़ी होजाती है /
और बहाना होता है '' यात्रा में रूकावट का हमें खेद है !
एक विश्व स्तरीय व्यवस्था बनने के लिए भरोसे की अग्नि परीक्षा में मैट्रो को नाकामयाब होने की इजाजत कोइ भी नहीं देगा अलबता सौ फीसदी कामयाबी ना सही पर फिर भी त्रुटी हिन् तो बनना ही चाहिए और ये प्रयास पूरी नेकनीयती से हो यही हम चाहते है /
और अंत में कहूंगा -
गमखार है हम , गमो ने हमें संवारा है !
तुम नाहक थक जाओगे ,टूट जाओ गे , बिखर जाओगे !
ये शीशे का महल तुम्हारा है !
पत्थर है हम नाजाने कभी से /
ना टक्कराओ , अभी दामन तुम्हारा कुंवारा है !


 

Tuesday, March 23, 2010

समाज के दरकते खँडहर से एक और ईट का दरकना !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;





दोस्तों,
फिल्मो में आक्रोश में उबल रहे हीरो को हजारो लाखो बार गरजते-बरसते देखा-सूना था कि हीरो जन्मजात बुरा बनके पैदा नहीं हुआ बल्कि देश-समाज के हालात ने उसे बुरा बनने पर मजबूर किया / मेरे साथ-साथ आपने ने भी सैंकड़ो दफा इस किस्म का धाँसू डायलाग सूना होगा मगर खामखा मुझे आज ये दरयाफ्त करने की ख्वाहिश हुई कि जानू तो सही कि वो कैसे हालात होते होंगे जब कोइ मरा-सा हीरो एकदम से क्यों कर धधकते ज्वालामुखी में तब्दील हो जाता है , मेरा ख्याल है जरूर उसे लोगबाग के सौतेलेपन ने खिजाया होगा , जरूर उसे एक रूपैये कीमत की चीज  आठ रूपैये में खरीदनी पड़ रही होगी , वो नमक के दाम पे शक्कर खरीदने घर से निकला होगा और नुक्कड़ पे वर्षो से किरयाने की दूकान घिस रहे काणे और घाघ बनिए ने मना कर दिया होगा भूल करने से और हमारे हीरो का दिमाग बिगड़ गया होगा और बेकाबू होकर छुरा लेकर बनिए की छाती पर जा बैठा होगा / हीरो ने गुर्रा कर कहा होगा '' लाला ! जान प्यारी नहीं है क्या , नमक की कीमत पर शक्कर ही तो मांग रहा हूँ / कल तक तो इसी कीमत पर शक्कर मिला करती थी आज क्या हो गया कि तू 55 रूपैये किलो मांग रहा है /
हीरो के कमर के निचे दबा पडा लाला अब हीरो को कैसे समझाए कि इसमे उसका क्या कसूर जो मंहगाई ने चीनी के भाव बढ़ा दिए तो /
आप और मै जरूर करके लाला की दलील से इतेफाक रखेगे क्यों कि ये मुनासिब भी है मगर जो हीरो कर रहा है याने उसके जो बगावती हावभाव है , उसे कोइ क्यों कर गलत ठहरावे गा जब कि मंहगाई रोज एक नयी उन्नति दर्ज कर रही है /
ये हमारी खामख्याली हो गी जो हम ये गफलत जोड़ते रहे कि मंहगाई का असर कुल हांसिल जमा हमारे बटुए तक ही पड़ रहा है / नहीं इस मंहगाई का बड़े दूरगामी अंजाम मुल्क और समाज को भुगतने होंगे / ये मंहगाई हमारे सामाजिक ताने बाने को इस हद्द तक तार-तार बिखेर सकती है कि हमारी नस्ले तक कोइ ओर किस्म अख्तियार कर सकती है जिसे हमने ख्यालो में तो छोड़े सपने में भी नहीं सोचा होगा / जिस तरह पैट्रोल और डीजल के दाम बढ जाने पर अपरोक्ष रूप से हर जरूरत की वस्तु को और ज्यादा मंहगा बनाती है , ठीक उसी तरह रोज-रोज बढ़ रही मंहगाई अपरोक्ष रूप से सामाजिक ताने बाने पर भी असर डालती है , कल तक साल में दो दफा बहन-बेटियाँ माँ-बाप के घर आ धमकती थी तो बिदाई में दो साडियों के देने का फर्ज हर कोइ ख़ुशी-ख़ुशी निभाता था पर आज बदलती फिजा में रिश्ते निभाना दोनों तरफ से दुश्वार बन चुका है , इस हिसाब से यदि मैंने कहा कि सामाजिक तानाबाना बिगड़ रहा है तो क्या गलत कहा मुझे बतावे , मेरा दावा है , मंहगाई इन्शानियत देश और समाज के तमाम मौजूदा चहरे को इस कद्दर बदल देने वाली है कि समाज अपने पुरखो की रवायत को छोड़ देगा और यदि कुछ बचे गा तो केवल शैतान , और हाहाकार /
आखिर में एक बात और कहना चाहूंगा कि मुल्क के हुक्मरान किसी मुगालते में ना रहे , क्यों कि ये इस फानी दुनिया की सच्चाई है कि जो जैसा यंहा बोता है वो वैसा काटता भी है , ये क़ानून कायदा आदम और हउआ के जमाने से चलता आ रहा है ये कोइ नयी बात नहीं लिहाजा जिस हुकूमत में काबिज कद्दावर मंत्री खाली हवा में हाँथ उठा कर अवाम से कहते है  कि महंगाई पर हमारा कोइ काबू नहीं ,हम क्या करे / अवाम उनकी बेकशी समझ रहा है और जो समझ रहा है वो उन्हें अर्श से फर्श पर बैठा देगा / ऐसा वो आज ही नक्की समझे /                           

Friday, March 12, 2010

बवासीर ! रूला देने वाला बे-रहम रोग और उसकी दवा !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;












 दोस्तों,
एक दफा तो कोइ भी बुरे-से-बुरे करतब की तोड़ दुनिया में खोजे तो मिल जाए गी परन्तु एक नामाकूल बेहूदी बिमारी है
बवासीर जो एक दफा किसी के गले पड़ जाए तो समझे नसीब ही फूट गए उस निरीह प्राणी के / ये मर्ज उस लूसडे की मानिद है जो चिपक जाए तो खिजा -खिजा के प्राण हरण करता है / इस मर्ज का आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जो माकूल जवाब है वो है आपरेशन जो कि बहुतेरी दफा एक बार में मुकमल जवाब नहीं साबित होता / बहूदा कितने ही बदनसीब ऐसे भी मिल जाते है जिनपे ये नामुराद रोग आपरेशन के बावजूद दूसरी दफा भी  गाज बनके टूटता है और इससे भी आगे जाने कि किसी के सारे देवी-देवता मुंह फेर कर नाराज बैठे हो तो तिसरी दफा भी आपरेशन की नौबत आ पड़ती है  जो कि भारी दुश्वारी , जलालत और बे-इन्तहा दर्द का बायस साबित होती है / मरीज जो इस रोग को हर दिन और हर पल झेल रहा होता है आठ-आठ आंसू उस जगह बैठ कर बहाता है जिस जगह को पैखाना कहते है और जन्हा एक निरोगी प्राणी कुछ मिनटों से ज्यादा किसी सूरत में ठहरना नहीं कबूलता , वैसी आला जगह पर रोगी घंटो बैठ कर जारजार रोता है और मारे बे- इन्तहा तकलीफ के खुद को बनाने वाले से मौत मांगता नजर आता है  परन्तु तब जब कि ये रोग अपने पूरे जलाल से रूष्ट चल रहा हो और वर्षो से अपनी जड़े जमा चुका हो तो ऊपर वाला भी वो सुभीता रोगी को नहीं मंजूर करता जो वो रोग से छुटकारे के तौर पर मौत की शक्ल में मांग रहा होता है /
बेखास्ता गुदा द्वार से बहता खून और कट फट चुकी गुदे द्वार की रक्त शिराए मरीज के साहस को चुक जाने पर मजबूर कर देती है / मारे दर्द के तीन त्रैलोक्य और छतीस करोड़ देवी-देवताके प्रत्यक्ष दर्शन हो जाते है /
मै, बा-कलम खुद, इस ना-मुराद रोग की गिरफ्त में रहा और रिस-रिस कर तड़पा हूँ और वो भी पूरे दस वर्ष !
खुश नसीबी ये रही कि मैंने आपरेशन से परहेज बरता और अंग्रेजी दवा से भी दूरी कायम रखी अलबता जब कभी दर्द की बर्दास्तगी दगा दे गयी तो पेनकिलर जरूर लिया / इस रोग का शुभारम्भ तब हुआ जब मै एक अकेला दिल्ली शहर में अपने लिए ठहराव तलाश रहा था लिहाजा खानपान की दुश्वारियो से भी गुजरना पड़ था जो बाद में इस रोग के लिए माकूल बजह साबित हुयी /
इस रोग ने मुझे बहुत कुछ दिया , जो दर्द और दुश्वारियो से ज्यादा बहुत कुछ था / मैंने इस रोग की शक्ल में मौत का खूबसूरत चेहरा भी पहचाना जो बाबा रामदेव के योगिक तौफे के तौर पर जिंदगी से यूं गुथ गया कि जिंदगी का आमूलचूल कायाकल्प हो गया  /
मै बाबा रामदेव के कदम चूम कर शुक्रिया कहना चाहूंगा जो वो देवदूत कभी मेरे सामने पड़े तो !
आगे मै वो दवा बयान कर रहा हूँ जो मैंने इस नाशपिट्टे रोग को शमन करने के लिए इस हाहाकारी चिकित्सा दुनिया से बतौर हीरे जवाहरात जैसी कीमती वस्तु की शक्ल में जमा किये है / सभी दवा आयुर्वेदिक है लिहाजा नुक्सान का तो सवाल ही नहीं उठता और फायदे की गारंटी सौ फीसदी है /
१.पायरायड , २. अर्शोध्नी बटी, ३.अर्श कुठार रस , ४.सप्त विन्सती गूगुल, और ५. आरोग्य वर्ध्नी वटी /
ये पांचो आयुर्वेदिक दवा की एक-एक टेबलेट चबा कर गर्म पानी के साथ सुबह खाली पेट निगले और रात को भोजन के बाद गर्म मीठे दूध के साथ चबा कर निगले  फिर दूध के साथ ही सब्गोल एक दो चमच्च भी ले ताकि पेट साफ़ रहे /
कुछ और भी फायदे मंद बाते है जो अपनाई जाए तो शिग्र लाभ मिले गा / मसलन सुबह बाथरूम जाने से पहले गुन्न्गुन्ना पानी चार पांच गिलास पिए / चाय, चावल,मिर्च ,तेल और तली वस्तुओ से परहेज करे / गुटका , तम्बाकू या दूसरी बुरी आदतों से बचे / साथ ही यदि संभव हो तो बाबा रामदेव के बताये कपालभाति और प्राणयाम भी दवा लेने के बाद एक या आधे घंटे जरूर करे / मेरी शर्त है आप से कि यदि आपको ये नामुराद रोग है तो जड़ से नष्ट हो जाए गा बस लगातार स्वस्थ होने बाद भी कमसेकम तिन महीनो तक दवा का सेवन करते रहे ताकि बिमारी
फिर कभी लौट के ना आये /
पुनश्च, दवा के बाबत यदि कुछ पूछना चाहे तो ई-मेल करे - sbtamre@gmail.com     
     

Friday, March 5, 2010

उड़न-तश्तरी की सेकुलर उड़ान ......[ भाग-२]

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;









 दोस्तों,
अपने फिल्सफे को अभी मै मुख़्तसर बयान भी नहीं कर पाया था कि मेरे एक मुअजीज ब्लोगर दोस्त संजय बेंगानी ने मेरे पिछले पोस्ट पर एक निहायत ही उम्दा टिपण्णी चस्पा कर दी कि जो भी नए ब्लोगर ब्लोगिंग का आगाज करते है वो एक दम से ''उड़न तश्तरी'' ट्रेड मार्क समीर लाल से जा कर चिपट जाते है , शायद क्या यक़ीनन मेरे ये अजीज ब्लोगर दोस्त ये समझाना चाहते है कि नए ब्लोगरो में वो बिलकुल भी उरमा नहीं कि वो खुद के माद्दे पर एक कामयाब ब्लॉग रच सके लिहाजा नए ब्लोगर को जो आसान-सा कामयाबी हांसिल करा सकने वाला और सारी दुश्वारियो से निजात दिलाने वाला सुगम-सा रास्ता दिखता है वो है , सौ मर्ज की एक दवा ''उड़न तश्तरी'' ट्रेड मार्क समीर लाल !
और इस वक्ती लेख में समीर जी को मैंने यदि मुद्दा बनाया है तो वो किसी खुदगर्जी को निगाह में रख किया है या नहीं इस फैसले को लेने का हक़ मै इकलौते काबिल शक्स संजय बेंगानी को मुकरर करता हूँ और पुरजोर मांग करता हूँ कि वो एक इन्साफपसंद आत्मा के बतौर खुद को नुमाया करे और पूरी तसल्ली से मेरे लेख को पढ़े और फिर फैसला दे उड़न तश्तरी की मिशाल मेरे द्वारा इस लेख में देना खुद गर्जी है या लेख के आत्मा की पुकार , और यदि फिर भी वो अपनी टिपण्णी को कायम रखते है तो जो सजा काले चोर की वो मेरी /  
संजय जी जैसे जहीन सोच वाले बन्दे को मै बेहद प्यार करता हूँ मगर ये भी कहूंगा कि उनकी सोच से ईतेफाकिया मै इतेफाक नहीं रखता लिहाजा उनकी टिपण्णी को पूरे तस्बूर से खारिज करता हूँ / उड़न तश्तरी समीर लाल एक आदर्श ब्लोगडीए है , वो हिंदी ब्लॉगडियो के बिच खासुलखास स्टार पोजीशन कब्जाते है /  कंही कोइ एकआधी उनीस-बीस करदिये सकने वाली यदि कोइ बात है ,तो वो है '' स्वामी समीरानन्द '' वाली वाहियात-सी ईमेज जो उनके धीर-गंभीर अक्स को खिलंदरी शक्ल में पेश करता है और उन लोगो की साँसे रोक देता है जो उन्हें जहीन ब्लॉगडीए के तौर पर पसंद करते है ,खैर जो हो मै उस उलटे -पुल्टे ब्लॉग को ईमेज के खातिर में तवजोह नहीं देता,और  हांसिल कुल जमा यह मानता हूँ कि समीर लाल जी एक उम्दा और अनुकर्णीय ब्लॉगडीए है, उन्होंने अपने इकलौते जैनुन ब्लॉग उड़न तश्तरी से ''फलोवर'' नाम का बखेडिया फीचर ही निकाल फेका है क्यों कि ये शातिर उस्ताद ब्लॉगडिया जानता था कि हिंदी ब्लॉगडीए बीमार और भावुक फितरत वाले है , इनकी मानसिकता में वो फराकदिली नहीं कि ब्लोगिया जन्हा के अंदरखाने की नाजुक खुदगर्जी को पचा पाए , याने समीर लाल जी हिंदी ब्लॉगडियो के कमजोर हाजमे को खूब पहचाना कि ये बखेड़ा परे ही रहे और बचा हुआ वक्त कमाई मानकर उन ब्लॉगडियो पर फराकदिली से बतौर टिप्पणीकार खर्च किया जाए जो अभी अभी अपनी ब्लोगिया पारी का आगाज कर रहे है क्यों कि  जो पुराने ब्लॉगडीए है वो जैसे काफिले में जुड़े थे वैसे ही जुदा-जुदा वजूहात अपनी-अपनी उम्र पा कर विदा भी होते जाते है क्यों कि ये ब्लोगिया दुनिया भी तो फानी है और इस फानी ब्लोगिंग जन्हा में एक ही चीज प्रभु राम नाम की मानिद सत्य है और वो वाहिद सत्य है एक लरजती-सी मनमुग्धा '' टिपण्णी '' !
किस नाजुक मुहाने पर, किन हालात के हांथो मजबूर हो कर किस कवी ने ये लिखा कि '' ना काहू से दोस्ती, ना काहू से बैर '' ये मै नहीं जानता परन्तु जो मायने समझता हूँ उस लिहाज से ये उक्ति ''उड़न-तश्तरी'' पर बिलकुल फिट बैठती है क्यों कि ''फलोवरशिप'' जैसा बखेड़ा बिलायती ब्लॉगडियो को मुफीद बैठता है क्यों कि वो इसे मंदिर के प्रसाद की मानिद उसे भी बाँटते है जो मांग रहा है और उसे तो बंटते ही है जो नहीं मांग रहा है जब कि हिंदी ब्लॉगडीए ने इस सहज प्राकृतिक गजेट को ना केवल अपनी आन-बान-शान जोड़ लिया बल्कि इसके अलावे कारू के खजाने जैसी हैसियत भी दे दी जो किसी को दे दे तो मानो ये दुनियातमाम उसके कदमो तले चली जाये गी / समीर जी ने हिंदी ब्लॉगडियो की रूगन मानसिकता को खूब पहचाना और अपने ब्लॉग के कामयाबी के हक़ में मुनासिब फैसला लेते हुए ''फलोवरशिप '' जैसे आफत के परकाले को बाहर का रास्ता दिखा दिया /                       
खैर, संजय जी की बाबत मै यूं बोल पडा क्यों की जिस मानसिकता के तहत संजय जी ने टिपण्णी दी बिलकुल उसी ब्लॉगडिया दरिद्रता के बाबत मै अपनी बात कह रहा था /  यदि हिंदी ब्लोगरो को बिलायती ब्लोगरो के मुकाबले में आना है , यदि हिंदी ब्लोगरो को बिलायती ब्लॉगडियो की हैसियत कब्जानी है और सारे जन्हा से उन्च्चा होना है तो हमारे हिंदी ब्लॉगडियो के सामने दो ही रास्ते है /
शेष कथा फिर ....!

Tuesday, March 2, 2010

उड़न तश्तरी की सेकुलर उड़ान ......!

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
पीछे अनेक महीनो से मै ब्लॉग लिख रहा हूँ , कोइ तिन चौथाई वक्त तो मुझे ये समझने में ही जाया हो गया की ये यदि अक्लमंदी है तो कमअक्ली क्या है और यदि दोनों के बिच मुनासिब फर्क है तो वो इतना बारीक क्यों है कि इस फर्क को समझने बैठो तो खोपड़ी में बम क्यों फूटने लगते है / खैर , जो भी कुछ हो, ये तो कायम उसूल है कि इन्सान जो कुछ भी सीखता है वो देख और सुनकर ही तुजुर्बा इकठ्ठा करता है और तभी कामयाबी कदम चूमती है / तक़रीबन कोइ एक वर्ष के ब्लोगिंग सफ़र में जो कुछ राय मुझे कायम हुई है वो बदमजा ज्यादा है बनिस्बत खुश्गंवारी के / इस दरम्या ढेरो ब्लोगरो को मैंने पढ़ा समझा / जिनमे कुछ तो इतना बेहूदा लिखते है कि कोफ़्त के मारे अपने सर के बाल नोचने लग जाये,उन्हें पढ़कर ऐसा उबाल पैदा हो जाता है / जब कि कुछ ऐसे किस्म के है कि जिनके हर आयन्दा पोस्ट की इन्तजारी बेसब्री से करते है / उनकी चर्चा मै आगे पूरी तसल्ली से करूंगा परन्तु पहले कुछ चंद बाते हिंदी ब्लोगिंग के बाबत करनी चाहूंगा /
 हिंदी ब्लोगिंग का दायरा कोइ बहुत बड़ा नहीं एक अंदाजे के मुताबिक़ ये कोइ दस या ग्यारह हजार ब्लोगरो का जमौडा होगा जबकि बिलायती ब्लॉगडियो का ब्योरा दसियों गुना बड़ा बताया जाता है / तसल्ली बक्श जो बात है वो ये है कि मौजूदा वक्त हमारे हिंदी ब्लोगिंग का शैशव काल बताया जाता है लिहाजा हम उम्मीद पाल सकते है कि आगे आने वाले वक्त में हिंदी ब्लोगिंग को जवानी फूटकर निकलेगी और इसके हुसन को देख कर हम सर्द आहे भरते रह जायेंगे / आमीन !

जाहिर सी बात है कि जब हिंदी ब्लोगिंग अभी इन-मीन चार दिन का ही बच्चा है तो क्या पिद्दी और क्या पिद्दी का शोरबा जांचने बैठे / पर फिर भी पुतके पग पालने में नजर आते है ऐसा सोचकर विचार करे तो हालात बड़े दुश्वारी भरे नजर आते है / क्यों की आँखे खुल्ली रख कर ब्लोगरो की मानसिकता गौर फरमाए तो कुछ एक बाते बड़ी शिद्दत से उजागर होती है / मसलन किसी भी ब्लोगर के चार प्रमुख असलेह है , पहला है -लेखन की ताकत , दूसरा है -टिपण्णी , तीसरा है -फलोवरशिप और चौथा और आखिरी हथ्थियार है -ब्लोगिंग की उपयोगिता / उपरोक्त चारो असलोह में दो तो ब्लोगर के अस्त्र-शस्त्र है और बांकी दो बाते खुद की और पाठक की आपसी सूझ-बूझ या खसूसियत का मामला है जैसे मेरे ब्लॉग की बुनियादी समझ किसी को अच्छी तो दूसरे को समझ से परे लग सकती है /  

जैसा कि पहले ही अर्ज कर चुका हूँ की हिंदी ब्लोगिंग अभी अपने बचपने जैसी नातजुर्बेकार उम्र से दो चार है लिहाजा ब्लोगरो से सुलझे हुए व्यवहार की उम्मीद फजीहत की बात ही है , परन्तु चाहे जो हो कुछ बाते जो आनुवंशिक दोष के किस्म की है और जो मिटटी है जिससे भारतीय ब्लोगर निर्मित है वो कभी तब्दील नहीं हो सकती, ब्लोगिंग करते हुए एक हिन्दुस्तानी ब्लोगर चाहे-अनचाहे अपने अवगुणों को छुपा नहीं पाता, जिस दरियादिली की उम्मीद उससे ब्लोगिंग करते वक्त दरकार है वो उससे कोसो दूर रोती बिलखती दिखाती है जब कि हिंदी ब्लोगर अपनी दरिद्रता पूर्ण ब्लोगिंग शैली में इस कदर मशगुल हुए रहता है कि उसे अपनी खामखा की गफलत का ख्याल तक नहीं होता / और ना ही ये जान पाता है कि वो अपने लाल बुझकड़ शैली की बाजुहात विश्व स्तरीय ब्लोगिंग से किस कदर पीछे है / विश्वस्तरीय ब्लोगिंग एक हिन्दुस्तानी ब्लोगर के लिए तो अभी दूर की कौड़ी है ही बल्कि ज्यादा बेहतर तरीके से यूं कहे कि अभी तो मुल्क स्तर की ब्लोगिंग में भी हिंदी ब्लोगर कोइ मुकाम नहीं रखता क्यों कि अभी तो वो उन असलोह का भी जायज इस्तेमाल करने नहीं सका है जो उसे मंदिर के प्रसाद की तरह खूब जोरशोर से चलकर या जा जा कर बांटना चाहिए वो ही प्रसाद वो राशन की दूकान की मानिद मर जाने की स्थिति आ जाने तक नहीं बांटता / आगे मै अपनी बात तफ्शील से समझाने के लिए एक निहायत ही उम्दा किस्म के हिंदी ब्लोगर की नजीर पेश करता हूँ जो हिंदी ब्लोगरो के बिच बड़ी आला फराक दिल हस्ती गिने माने जाते है / मेरी निगाह में ये नाम चीन ब्लोगर सच्चा सेकुलर ब्लोगर है / मुमकिन है इस खुलासेको आप सभी ने महसूसा हो मगर शब्दों में पढ़ और समझ पहली दफा ही रहे होंगे ये मेरा यकीं है / ये ब्लोगर कोइ और नहीं बल्कि समीर लाल उर्फ़ उड़न तस्तरी ही है जो सच्चे मायनों में एक सेकुलर ब्लोगर कैसे है ये खुलासा मै अगली किस्त में करूंगा /
थैंक्स !         

Saturday, February 27, 2010

बड़े दिल वाले मुल्क के तंग-दिल हाकिम !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;







दोस्तों,
'' मै ''अमुक '' ईश्वर को हाजिर जानकार सौगंध खाता हूँ की एक मंत्री के तौर पर जो भी विषय मेरी जानकारी आवेगा या लाया जाएगा उसे मै भयमुक्त  और निष्पक्ष रह कर संज्ञान में लूंगा ''

इसी किस्म के वो चंद मिलते -जुलते अल्फाज और होते है जब हमारे नुमायिंदे बतौर मंत्री के ''ओथ'' ले रहे होते है / मगर उठायी गयी कसम कितने फीसदी अमल में लाते है हमारे ये हुक्मरान , नो डाउट , भयमुक्त तो ये होते है मगर तरफदारी ये पुरे दीदादिलेरी के साथ और पूरी बेहयाई से दस्तूर मानकर करते है / मसलन पिछली सरकार में लालू प्रसाद यादव को ही लेले / जब वो रेलवे में कर्ताधर्ता थे तो पूरा महकमा बिहार की तीमारदारी में जुटा रहता था , एक से बढ़कर एक रेलवे की दुनिया तमाम किस्म की योजनाये बिहार को समर्पित थी , हर बड़ी छोटी योजनाये बिहार को ही निगाह में रख कर तैयार की जाती थी और अब आज ममता दीदी रेलवे पर काबिज है तो उसने जो रेलवे का लेखा-जोखा दुनिया को नुमाया किया है वो किस किस्म की चुगली करता है वो कोइ छुपा नहीं / जिस फराकदिली से दीदी ने रेलवे की ताकत बंगाल पर लुटाई है वो लालू प्रसाद की तरफदारी को भी धत्ता बताती है , लालू भी अफ़सोस मानने लगे होंगे कि काश मैंने भी ममता के माफिक पूरी बे-हयाई से ''ताकत'' का फ़ायदा उठाया होता तो वापिस महकमे पर काबिज हुआ होता /
इस किस्म की मानसिकता हमारे नुमायिन्दो में दिनानुदिन बिफरती जा रही है जिसका एक सीधा-सा मायने ये निकलता है की जो महकमा जिस किसी के हत्थे चढ़े गा वो महज उसी इलाके या सूबे को काबिले-मेहरबानी माना जाए गा जन्हा से कि वो नुमायिन्दा है बांकी का हिन्दुस्तान तमाम टापता रहे गा / एक को छोड़कर बांकी के सारे उपवास पारण करेंगे जब तक कि उसी महकमे में उनका रिश्तेदार नहीं काबिज हो जाता /  इस मानसिकता को श्याह से सफ़ेद साबित करने के लिए जो दलील पेश किजाती  वो भी कम हाहाकारी नहीं कि वो सूबा बाँकियो के मुकाबले कमजोर है लिहाजा उस पे मेहरबानी मुनासिब है / इस '' तरफदारी '' के कई फायदे है तो नुकसान भी हजार है / ये ठीक है कि एक खासमखास इलाके में उस महकमे की मेहरबानियो के एवज में तरक्की की हल्कि-सी बयार बह निकलती है मगर ये भी तो देखे की तरक्की किसी एक इकलौते महकमे के ताबे में नहीं होती जो उसके बुलाये नंगे पांव दौड़ी चली आये , तरक्की तो खुशहाली की तजबीज है जो सभी के एकजुट बुलावे पर ही आना कबूलती है /
वो आला हस्ती इंदिरा गांधी ही थी जिसने हमारे आज के हुक्मरानों के लिए तरफदारी की राहे-नजीर पेश की थी / इंदिरा जी ने रायबरेली को गोद में लिया , राजिव गांधी ने अमेठी को तरक्की के पालने में झूले झुलाए और ना जाने किस किस ने इस कामयाब नुस्खे को जमकर आजमाया / इस फेहरिस्त को जांचने बैठे तो शैतान भी हांफने लग जाए गा / मगर एक जो खासुलखास खुलासा इस मानसिकता के पीछे छुपा खूब दिखता है वो है मुल्क के लोगो की तरक्की की चाहत जो वो अपने नुमायिन्दो से पुरजोर रखते है और जो हुक्मरान अपनी शर्तो पर शातिर व्यापारी वाले अंदाज में किस्तों में अदा करते है और तो और वो भी किसी ख़ास सूबे या इलाके तक ही /
तो क्या किसी ख़ास इलाके को छोड़कर किसी ''अपने वाले सूबे या इलाके '' की  तरक्की के पीछे ना-काफी संसाधनों रोना है , ये बहाना मेरे हलक से निचे तो नहीं उतरता क्यों की ये तरिका एक अनार और सौ बीमार वाली कसर पूरी करेगा और सीधे-सीधे असंतुलित समाज की तस्बीर उकेरेगा / जैसे पेट तो गुबारे की तरह फूला हो मगर टाँगे कमजोर / साफ़ है की जिस्म का वजन ढ़ोने वाली टाँगे भी मजबूत होनी चाहिए /
मुल्क का हाकिम ही जब इन्साफ-पसंद नहीं होगा तो रब्ब जाने अंजामे गुलिस्तान क्या होगा / फिर तो मुल्क के तमाम वाशिंदे दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों का रूख करे तो क्या बुरा है !




होली की सभी ईष्ट मित्रो को मेरी तरफ से बहोत-बहोत मुबारकबाद !                               

Wednesday, February 17, 2010

मीडिया बोले तो .....किशोर आजवाणी उवाच !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;


दोस्तों,
जी जनाब मै उस मुहाने पर खड़े जमौड़े के निस्बत ही बाते कर रहा हूँ जिनके जरिये हमें तमाम किस्म की हलचलों का पता चलता है , और मै उसी बाबत कहरहा हूँ जो हमारे निजाम में व्याप्त लोकशाही की पहरेदारी पुख्ता नेकदिली से अंजाम देते रहने की हूकार भरता है कि वो भी और दूसरे ,मसलन कायदे क़ानून की किताब संविधान, और ईन्साफ देने को आतुर खड़ी अदालत, चुन चुन कर भेजे गए नुमायिन्दो के खिलंदड़े अंदाज की वजह से देश को शर्मसार कर देने वाली कार्यपालिका और इन सब पर डंडा देने को मरा जा रहा वो मीडिया ही तो है जिसके बाबत मै कुछ कहनाचाहता हूँ उससे पहले एक बानगी जरूर गौर फरमाए /
आज दिनांक १८-०२-२०१० को टीवी पर सभी चैनलों पर , तौभी खासुलखास IBN -7  पर एक खबर बारम्बार दुहराई जा रही है की झारखंड में माओ वादियों ने एक बीडियो का अपहरण कर लिया और उसकी रिहाई के लिए मुख्यमंत्री शिबू सोरेन सात माओवादियों को रिहा करने की जुगत भिडा रहे है , कल ये ही खबर इसी चैनल ने दूसरे मायनों के साथ परोसी थी जिसका मुख्तलिफ मतलब ये था की शिबू सोरेन इस कदर गाफिल है कि बीडियो की ब्याहता उनके दरवाजे आकर अपने खाबिन्द की सलामती को तरजीह दिलवाने के खातिर ख़ुदकुशी को उतारू है और दूसरी तरफ एक सूबे का शहंशाह है जो अपने आपे में नहीं / 'राम ने मिलाई जोड़ी एक अंधा दूसरा कोढ़ी' जैसे उम्दा फार्मूले से तैयार शिबू सरकार जो जोरका झटका धीरे से लगे तो भी बिखर जाये गी , एसे खौफ के साए तले हुकूमत चलाने को मोहताज शिबू सोरेन फ़ौरन से पेश्तर उस राह चल पड़े जो किसी जमाने में तब के गृह मंत्री ने अपनी बेटी को बचाने के लिए किया था / आयन्दा मीडिया के हडकाए शिबू क्या गुल खिलाएंगे ये तो वक्त ही बताये गा /
उपरोक्त बयान की दिमाग को भन्ना देने वाली रौशनी में आज हम किशोर आज्वानी के उस भरोसे को कसौटी पर कसते है जिसमे उन्होंने भरोसा जताया कि मीडिया ना तो उधर है और ना ही इधर है , वो तो बिच में है / मै यंहा यह साफ़ साफ़ कहना चाहूँगा कि मै आदमजात पुरखो के उस तजुर्बे से इतेफाक नहीं रखता जिसमे वो कहते है की बिच की स्थिति सदा माखौल का वायस बनती है / यक़ीनन ये वो बिच नहीं है जो मै समझ रहा हूँ या लोग बाग़ समझ रहे है , बल्कि ये वो बिच है जिसे में मीडिया खुद को देखता है , अपने लिए अपनी आँखों से जो देखता है वो ही मुल्क को या दुनिया तमाम को परोसता भी है /
तो फिर, ये हाय तौबा मचा देने तक के नाज नखरे क्यों , ये पहला सच है इस फानी दुनिया का कि पहले हम अपने लिए सचे होते है बाद में दुनिया तमाम आती जाती है / मेरे अलावे श्रीमन किशोर जी ही वो वाहिद शक्स हो सकते है जो शायद ये इतेफाक नहीं रखते की मीडिया आज की तारीख में उस  प्राणघाति डंडे में तब्दील होचुका है जिसके जोर पे मुल्क की मजलूम जनता को छोडिये शर्मायेदारो को भी हडकाया जा सकता है , बतौर नजीर शिबू सोरेन तश्तरी में चांदी की बर्क लगा कर पेश है ही /
फिर मिलते है ..../  
             

महफूज भाई की कातिलाना खूबसूरती !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;




दोस्तों,
अपने सुसंयत भाव और खुशमिजाजी के लिए खूब जाने जानेवाले खुशदीप सहगल जी ने जो सलाहियत भरी बाते बतौर टिपण्णी मुझे लिखी उसे मै अपने सर-माथे लगाता हूँ /
सहगल साब ने जो बाते महफूज जी के बाबत कही उसे सोलह आन्ना सच्च मै भी कबूलता हूँ , इसकी मुझे दरकार नहीं कि मै तस्दीक करता फिरू बल्कि पक्के तौर पर जानता हूँ महफूज एक साहसी और रंधीर शख्सियत है , मगर मै इस हक में नहीं कि नवाबो की तहजीब वाली मशहूर शहर ब्लोगिंग के नाम पर दुनिया में रुसवा होती होतो गमखार बना बैठा रहू क्यों की समूची दुनिया जानती है कि लखनऊ का मतलब है जुबान की मिठास से दिल पर बादशाहत कायम करना और हमारे महफूज भाई वो ही भूल गए , मेरी समझ से ये एक हाहाकारी वाकिया है /
खुशदीप जी ने आखिरी जुमले तक सच्च लिखा कि हमारे इर्दगिर्द लिखने समझने के लिए हजारो हौलनाक मसले मचलते मिल जायेंगे जो देश और समाज की जान खाए जा रहे है मगर मुझ आफत के पुतले ने फिर भी जहमत ये उठाई की किशोर-महफूज की जुगलबंदी पर ही लिखना गंवारा किया तो फक्त इस लिए कि जिस बिंदास अदा से महफूज भाई बेबाक होकर लिख गए उसकी रोकथाम तो होनी ही चाहिए थी और जिस किस्म की रोकथाम किशोर आजवानी कर रहे थे वो किसी भी नजरिये को मुनासिब इन्साफ दर्ज नहीं करती थी लिहाजा मैंने अपना रूख तल्ख़ किया ना की गैर मुनासिब किया / मैंने ये तोहमत नहीं महफूज भाई पर  आयद नहीं की कि महफूज जी ने किशोर जी को अपशब्द कहे बल्कि अपना विरोध ये कहकर दर्ज करवाया कि कान उखाडू टिपण्णी जहर बूझे लफ्जो की मुहताज नहीं /
                                     बांकी रह गयी बात ब्लोगिंग की तो खुलासा करना बेहतर होगा कि दूसरे हजारो ब्लोगरो की तरह ब्लोगिंग मेरा भी सगल ही है ना की रोजीरोटी का जरिया / पिछले दो दशक भी ज्यादा वक्त से बतौर ज्योतिषी के पुरजोर सलाहियत और ईमानदारी से एक ही मुकाम पर टिक कर दो वक्त की रोटी प्रभु का नाम लेकर खा रहा हूँ / ना तो मै इस मुगालते में हूँ की महफूज जी का नाम भज कर ब्लॉग बैतरनी पार कर कारू का खजाना पा जाउंगा , ना ही ये खामख्याली में हूँ कि आज मै किशोर आजवानी की तरफदारी करूंगा तो कल बा-जरिया किशोर आजवानी स्टार न्यूज़ में तिन देवियों वाले प्रोग्राम में अक्ल को बीमार करने वाली मगर दुनिया को अपने हुसन से हैरान परेशान कर देने वाली  उन तिन महिला नजूमियो की जगह मुझे मिल जाए गी / मैंने तो सवाल महज तमीज और तहजीब के बाबत उठाया था जो की मेरे हिसाब से असुबिधा वाली बात जरूर थी /
अंत में , फिर से महफूज जी वाले शिरे पर आता हूँ की मेरी उनकी कोइ जाती अदावत तो है नहीं / मै इतना भी गाफिल नहीं की उनकी उरमा को ना समझू लेकिन ये वाही ताजूब की बात है की उनके जैसा अच्छी तालीम रखने वाला बन्दा क्यों कर भूल करे गा /
थैंक्स/ 
                  

Tuesday, February 16, 2010

खुद को खूबसूरत मानने वाले महफूज भाई को किशोर आज्वानी से मुआफी मांगनी चाहिए !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
''माई नेम इज खान एक बेजोड़ फिल्म है ''
महज इतना ही किशोर आज्वानी ने उचारा था की हमारे ब्लॉग जगत के स्वनाम धन्य शाहरूख खान याने महफूज भाई आपे से बाहर हो गए और रूपक मडोक के तिजारती फितरत की आड़ में मीडिया वालो में खासुलखास स्टार न्यूज को अच्छी-खासी झाड पिला दी, बला की हुनर दिखाते हुए मीडिया वालो को जूठन चाटने वाला भिखारी भी बताने से गुरेज नहीं किया / खुद को चहेता ब्लोगर बताने वाले महफूज जी ने लखनऊ जो तमिज की तहजीब के लिए समूचे दुनिया में जाना जाता है अपनी जुबान से लगाम खूब खुल्ली छोड़ दी और जुबान-दराजी की इन्तहा करते हुए शाहरूख खान को कुत्ता तलक बयान किया , साथ ही शाहरूख खान ने देश के लिए क्या किया जैसा अहम् सवाल भी उठाया जो वो भूल रहे है की भले ही खान इस्लाम की नुमाईंदगी नहीं करते हो या कोइ उसे खारिज करता हो मगर शाहरूख को कंही भी दुनिया में जाकर ये जाहिर करने की जरूरत नहीं कि वो कान्हा के सभ्य समाज की नुमाईंदगी करते है क्यों की वो भारत के समरस और प्रोमिसिंग समाज का आईना है , लिहाजा शाहरूख को कुत्ता बताने बाले को खुद से पहले यह पूछना चाहिए की वो  बेहूदगी भरी बाते ब्लॉग इन कर किस किस्म की हिस्सेदारी भरपाई कर रहे है / उनका अपने देश को छोड़े अपने मशहूर शहर लखनऊ को क्या योगदान दे रहे है , बांकी बाते तो बढ़ चढ़कर बाद में तै कर लेंगे , पहले तो ये ही तै कर ले की वो सारे नहीं महज चंद ब्लोगरो में ही मशगूल या मशहूर है ना की सारे ब्लॉग जगत के ,बांकी दुनिया भर के ब्लोगर का तो नंबर ही नहीं आता  मेरा दावा है भतेरे ब्लोगर तो उन्हें पहचानते भी नहीं होंगे , दस हजार या उससे ज्यादा हिंदी ब्लोगरो की बात तो दूर की है ,किसी जगह मैंने पढ़ा था की महफूज मिया हमारे ब्लॉग जगत के पहले ब्लोगर है यानी सालो से ब्लोगिंग कर रहे है जब की उनके ब्लॉग पर एक भी विदेशी फोलोवर की तस्वीर तक नहीं जो उन्हें कमसकम ये तगमा तो दिलवाता की वो हिन्दुस्तान के बाहर भी जाने जाते है जब की शाहरूख ने  हिन्दुस्तान के बाहर और भीतर दोनों जगह ना केवल पहचान कायम की बल्कि हिन्दुस्तान में बहने वाली उस फिजा के बारे में सारी दुनिया को बताया की वो कितनी सुरक्षित और शेहदमंद है कि एक मुस्लिम भी अपनी बात पूरी ताकत से रख सकता है /
पुनश्च, हिंदी ब्लॉग जगत के स्वनाम धन्य उर्फ़ प्रथम ब्लोगर ने यह भी इतेफाक जाहिर किया की वो शिव सेना से इतेफाक भी रखते है , जो दूसरे लफ्जो में यूं कहा जाये तो वो ये बयान करते है की जैसे शिव सेना देश भक्त है वैसा ही कुछ वो भी है / तो महफूज भाई ये समझ ले की शिव सेना कोइ देश भक्त नहीं वो महज अपने निजी नफे-नुक्सान की बेहतरीन तमीज रखने वाले चंद स्वार्थी लोगो का जमौडा मात्र है , यदि वो देश भक्त और वतन पर कुरवां होने वाले सरफरोश होते तो राज ठाकरे टूटकर जुदा न हुआ होता , ये तो सत्ता लोलुप चंद राजनीतिबाज है जिनके आपसी स्वार्थ आपस में यूं भीड़ गए कि राज ठाकरे को ये लगा की मेरी दाल कभी गले गी ही नहीं तो उसने बिहारियों के खिलाफ अलख जगानी शुरू कर दी / क्या बिहार वाले या उत्तर भारतीय पाकिस्तान से आये है वो भारतीय नहीं है , क्या वो देश भक्त नहीं है आतंकवादी है जो शिव सेना और राजठाकरे लठ्ठ लेकर कुचलने को आमादा है / महफूज भाई आप बताओ आप किस किस्म की शिव सेना या राज ठाकरे से इतेफाक रखते हो , मेरी नजर में देश प्रेमी सिर्फ और सिर्फ एक ही कौम है और वो है हमारे अमर जवान , जो एक इशारे पर भले ही तब आग का दरिया बहता हो , मौत बावलों की तरह अट्टहास कर रही हो मगर हमारे जवान अपने प्राण नौछावर करते देर नहीं लगाते और उन्ही के प्राणोत्सर्ग की कीमत को कायम रखने की मिन्नत समाजत करती है ये फिल्म की हम सभी मिलकर एक रहे /
किशोर आजवानी ने महज खान फिल्म की तारीफ़ ही लिखी ये तो नहीं कहा की पाकिस्तान में बनी किसी चोर उचक्के की फिल्म देख आओ , फिर लोगो ने गिनती करवा दी की फिल्म को सुपर डुपर हिट करवाने का जिम्मा मीडिया का दिया है और तो और यंहा तक कह डाला की मनमोहन सिंह की सरकार को कारन जोहर ने खासुलखास मिशन दिया है की उनकी सरकार और दूसरे हुक्मरान खाली टाईम पास कर रहे हो चलो सदुपयोग करो और खान की फिल्म हिट करवाओ , और जैसे हिन्दुस्तान के हुक्मरान खबास हो चल पड़े हुक्म तामिल करने / मै नहीं समझता की इस बे सीर-पैर के इल्जाम की सफाई किशोर आज्वानी को देने की जहमत उठानी चाहिए /
बांकी ना मै कोइ जिद्द करता और ना ही दस्तूर से इनकार करता हूँ की महफूज भाई को किशोर जी से सौरी नहीं कहना चाहिए /
आमीन !     
        

हम फिर से नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है , क्यों की उपरवाले का कुफ्र है टूटेगा जरूर !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
अब तो जैसे रविवार का दिन ज्यू ज्यू नजदीक खिसकता आता दिखता है वैसे वैसे दिल बैठने सा लगता है , कहने को दिन तो ये छूटी के लिए मुकरर है मगर मशरूफियत असल में अपने उफान पर होती है , हप्ते भर बांकी दिनों की डेली रूटीन किसी भी सूरत में तकलीफदेह ना रहे इसके जुगाड़ में रविवार का सारा वक्त जाया चला जाता है / तक़दीर और देवता भी इस दिन मुंह फेर लिए महसूस हो जाते है जो रविवार को कोइ मुलाक़ात करने चला आये क्यों की यदि आगंतुक की तीमारदारी ना हो तो ये बे-अदवी में गिनती होगी और यदि बे-अदवी करे तो आईंदा सप्ताहंत तक बुरे-बुरे अंजाम भुगतने पड़ेंगे / इससे भी बुरा क्या हो सकता है कि यदि कोइ हादशा रविवार को पेश आ जाए , तो यूं जाने बांकी सातो दिन गयी भैस पानी में /
गत रविवार को यूं लगा मानो दुनिया ने आपना दस्तूर बदल दिया है और पृथ्वी अपनी धुरी पर उलटी घूम रही है / अपने ब्लोक की आवारा कुतिया ने इकठ्ठे आठ दस पिल्लो को ज़ना था / उसकी फलती-फूलती गृहस्थी किसी की आँखों में शूल बने ये भला क्यों कर होता / सो लोगबाग ने कोइ तवज्जो न देनी थी और ना ही दी / मगर कुतिया ने और उसके लिविंग पार्टनर कुत्ते ने पास के पार्क में खेलने जाते तिन चार बच्चो को इस मुगालते में काट खाया की वो उसके पिल्लो के लिए खतरा-ए-जान बन सकते थे / वाकिया चुकी बच्चो की हिफाजत पर सवालिया निशान बनाता था लिहाजा पडौसी सरदार मंजीत सिंह जी ने मीटिंग बुलाली सारे ब्लोक बालो की और यक्ष प्रश्न रखा की कुतिया के आतंक से कैसे महफूज रखा जाए बच्चो को / पुलिस को इतला दी जाए इससे बेहतर सुझाव कोइ ना दे सका,क्यों की दिल्ली नगर निगम कितनी चुस्त-दुरूस्त है ये कोइ कहने की बात नहीं है , अलबता कार्य क्षेत्र और जिम्मेदारी तो उसी की बनती है तो भी ब्लोक वालो को पुलिस वालो पे ज्यादा भरोसा जगा /
भले ही मैंने तहे दिल से सोचा पर नहीं चाहता था की पुलिस को ये ब्योरा मै परोसू , पर मुसीबत जो आनी थी वो बा-कायदा पैर जमा कर घर बैठ चुकी थी अब तो केवल उसे भुगतना भर था जो की मैंने भुगती भी / पर क्या हुआ जो अंजाम ठाकरे बनाम शाहरूख खान का हुआ वो ही ब्लोक के आतंक का हुआ याने टाँय-टाँय फिस्स !
मैंने सरदार जी के तकादे के जोर से तिन बार कुतिया और कुत्ते के सिरफिरे होने की रिपोर्ट दर्ज करायी और खूब मिन्नत-समाजत की पर आज तीसरा चोथा दिन बितने को आया कोइ साबूत पुलिस छोड़ो उस नामकी चिड़िया तक झांकने नहीं आई / हार कर मैंने नगर निगम का दरवाजा खटखटाने जैसा दोहरा करदेने वाला रास्ता भी आजमाया पर शकुन पैदा कर सकने वाले आसार अभी भी नदारद है और     
वो कुत्तिया आज भी वैसी की वैसी चौड़ी छाती किये गफलत में शिकार दर शिकार किये जा रही है और हम फिर से एक नए रविवार के सत्यानाश होने की बाट जोह रहे है क्यों की उपरवाले का कुफ्र है तो टूटेगा जरूर !       
         
        

Saturday, February 13, 2010

गए थे हरी भजन को ओटन लगे कपास !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;



दोस्तों,
गए थे हरी भजन को ओटन लगे कपास !
यह मशहूर कहावत मेरे साथ बिलकूल तब फिट बैठ गयी जब मैंने शिव सेना पर ज्योतिषीय लेख लिखने की सोची और उस बाबत जब असलाह इकठ्ठा करने निकला तो मुझे इल्म हुआ की मेरे पास इतनि  जानकारी हो गयी है की मै उसे एक राजनैतिक लेख के तौर पर कुछ अनुभव बयान कर सकता हूँ लिहाजा नतीजा आपके सामने है /
जून 1966 में  बाला साहेब ठाकरे ने शिव की सेना की बुनियाद खड़ी की थी /
समझने समझाने के लिए ये हैरत अंगेज बात है कि साठ की सदी में ''मार्मिक'' नाम की एक साप्ताहिक पत्रिका में एक अदना सा कार्टूनिस्ट अपने फ़न से वो क़यामत नहीं ढहा पाया जब की एक गैर-राजनितिक संगठन में एसी धार पैदा कर दी कि दुनिया तमाम में पुख्ता लोकशाही की ज़िंदा मिशाल हिन्दुस्तान हांफने लगा / ये तो एक जाहिर सी बात है कि कुनैन निगलेगे तो कै और दस्त तो होगे ही, लिहाजा हिन्दुस्तान के पेट में तब से अब तलक मरोड़ उठ रहे है और हिदुस्तान की तबियत नासाज ही चल रही है /
आजादी के बाद अपनी धंदे पानी की खासी अच्छी समझ रखे के लिए कमोबेश कुख्यात या मशहूर गुजराती और मारवाड़ी कौम सबसे पहले मुम्बई पंहुची, और दोनों ने बिंदास रहकर हर किस्म के धंदे पानी में अपनी पुरजोर दखल बनायीं, पीछे पीछे दक्षिण भारतीय भी आ पहुंचे जिनके हालत कमोबेश आज के उत्तर भारतीयों जैसे ही थे /
''भूमिपुत्र'' का नारा लगाती उठी शिव सेना तूफ़ान बनकर दक्षिण भारतीयों पर टूट पड़ी और उनका दम तोड़कर ही मानी, दूसरी ओर चतुर सुजान कांग्रेस ने इस उधमबाजी को खातिर जमा रखते हुए ''लोहा लोहे को काट खाता है '' जैसे आजमाए हुए नुस्खे को कोम्युनिस्ट मजदूर ताकत के खिलाफ इस्तेमाल में लिया जो बिलाशक फायदा बक्श फार्मूला साबित हुआ / तब के दादर संसदीय क्षेत्र के सांसद कृष्ण देसाई की हाहाकारी ह्त्या हो गयी और कोम्युनिस्ट की थाती इतिहास की भूली बीती बात बन गयी /
कोम्युनिस्टो के सफाए के बाद, कांग्रेस सत्ता के भोग में निमग्न हो गयी जब की शिव सेना के लिए मुद्दा बिहीन बंजर भई कर्म भूमि छोड़ दी जो किसी  बीहड़ में  भटकन जैसा दारुन कष्ट ही दे सकता था /
फिर बिल्ली के भाग से छिक्का टूटा और भगवत कृपा हुई , गुरू जी ने गुरू मन्त्र कान में फूँका याने भाजपा ने दर्शन बखान किया और दारुन त्रासदी का अंत हुआ / दोनों की जुगल बंदी उन्हें प्राप्त अंतर ज्ञान से परम आनंद देने वाली साबित हुई / कट्टर वाद और दोनों के  चोली दामन के रिश्ते ने खूब गुल खिलाया और कांग्रेस को धुल चटा दी / कंगाल हुई कांग्रेस 1995 में सत्ता से बेदखल हो गयी जब की शिव सेना काबिज हुई /
देखा जाये तो आजाद हिन्दुस्तान में कट्टरवाद का ये स्वर्ण काल 1999 में ही खत्म हो गया / जादू का जादू ख़त्म हो चुका / अब बीजेपी और शिव सेना उसी जादू की तलाश में तड़प रही है / कांग्रेस की लोहा काटो निति राज ठाकरे के साथ है और कभी साथ रहे बाला साहेब के खिलाफ है लिहाजा चतुर सुजान तो कांग्रेस है जिसका सुदर्शन चक्र चंहू ओर वार करता है / जय हो कांग्रेस माता की !      

Thursday, February 11, 2010

मेरा पक्का ख्याल है यदि ये चुगलखोरी बंद नहीं हुयी तो ...!

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;





दोस्तों.
आज के तेजरफ्तार दौर में इन्शान की जरूरते काफी बढ़ी-चढ़ी रहती है , सर चढ़ कर बोलती जरूरते उसे अपने सुभीते के लिए रोज एक नयी ईजाद के लिए उकसाती रहती है / इसी चक्करबाजी में  शायद टेलीफून का औतार हुआ होगा / टेलीफून  एक एसी मजेदार मगर अक्ल को  हैरान परेशान कर देने वाली ईजाद है जो दुनिया के दो जुदा जुदा आखिरी छोर पर बैठे
दो बन्दों को यूं आसान सी गुफ्तगू करवा देता है जैसे मानो दोनों आमने सामने सहज बैठे गप्पे लड़ा रहे हो / मुझे ये नहीं पत्ता की टेलीफून किस उस्ताद आला दिमाग वैज्ञानिक की ईजाद है और ना ही मै उसका फिरंगियों जैसा कोइ चुभता सा नाम जानने के लिए मरा जा रहा हूँ इसकी वजह शायद कुछ हद तक यह है की मै उससे थोड़ा रूक रूक कर खफा हूँ मगर सही मायनों में पूछे तो एक मुस्त यदि मै खफा हूँ तो उस उस्तादों के उस्ताद से हूँ जिसने चोंगे वाले टेलीफून से चार कदम आगे जाकर मोबाईल टेलीफून जैसे नन्हे शैतान को ईजाद किया है जिसे जब जन्हा जैसे चाहो इस्तेमाल कर लो / यदि आप चार जनों के बिच बैठे हो और आपकी मनसा उन्हें अलहद रखने की है तो परायो की तरह बेलाग छोड़कर खामोशी में चले जाओ, आप कभी घरवाली के साथ हो और जाननिसार का दावा ठोकने वाली प्रेयसी की कॉल आ गयी तो कोइ टोटा नहीं, धर्मपत्नी को टका सा समझाओ की दीक्षा देने वाले गुरू जी की कॉल है और सन्नाटे में जाकर अभिसार वार्ता का लुफ्त उठाओ /
मोबाईल फूंन ईजाद करने वाला काफी घिस्सा हुआ बन्दा रहा होगा, उसने इस आला दर्जे की मशीन में नंबर या नाम की चुगलखोरी करने वाला पुर्जा भी जोड़ा हुआ है जो कॉल बजने के साथ कॉल कर्ता की समूची पोल खोल देता है , बांकी मोबाईल धारक मनसा ना हुई तो फूंन पें-पो करता रहे गा , पर वो बेरहम पत्थर दिल सुनके राजी नहीं होगा /  मेरी और मोबाईल की जानी-दुश्मनी इसी मुहाने से शुरू होती है / यदि मोबाईल फून की शक्लोसूरत में चुगलखोरी वाला पुर्जा मुत्वातर कायम रहा तो मेरा पक्का ख्याल है की इंशान को इन्शान के दर्जे  से बेदखल होना ही पड़े गा / समाज अपनी दिशा भूल सकता है / हर बन्दा जो मोबाईल फून इस्तेमाल करता है वो बे-लज्जत झूठ बोलने का गुनाह करता ही रहता है / होते है साऊथ दिल्ली के किसी बार में कहते हो मंदिर में हूँ , बैठे होते है घर में कहते हो शहर से बाहर हूँ / होते है प्रेयसी के साथ डिस्कोथिक में कहते है मिलाने वाला चलता रहा मुसान में हूँ / और ना जाने कितने वैगेरह वैगेरह /

मैंने बुरे से बुरा ये किया की अपने एक प्राणप्यारे मित्र को जरूरतमंद जानकार थोड़ा धन उधार दे दिया , बस उसी वक्त से ऊपरवाले ने मुंह फेर लिया और मोबाईल फून से अदावत की बुनियाद डल गयी / तैशुदा वक्त के बाद जब मैंने तकादा चालू किया तो उसी दरम्यान मोबाईल फून की शैतानी ताकत देखकर रूह फन्ना गयी / प्राणप्यारा मित्र जमना पार रहता है और मै रोहिणी लिहाजा मोबाईल फून का तो इस्तेमाल होना लाजमी था और मुझे जमीं सुंघनी ही थी / उस प्राणप्यारे ने तमाम दुनिया जन्हा का झूठ पानी पि पीकर बोला / वो जमी पर था तो कहा पाताल में हूँ , आशमा में था तो कहा मंगल ग्रह पर हूँ / उसके झूठ की फेहरिस्त शैतान की आँत से भी बड़ी थी और उस नामाकूल का इकलौता मददगार यदि कोइ था तो वो था इन्शानियत का कातिल मोबाईल फून /                        
 आधुनिक संसाधनों ने जितनि सुभिसता हमारी जिंदगी परोसी है वैसी पहले कभी ना थी यह मै तहे दिल से कबूलता हूँ मगर इन्शान में शैतान की फितरत हाबी हो जाए तो वो भली सी लगने वाली चीज का भी वो किस्म का इस्तेमाल कर के दिखा दे सकता है की शैतान भी पनाह मांगता दिख जाए /

थैंक्स / 

Monday, February 1, 2010

हिदुस्तान का सबसे बड़ा ज्योतिषी कौन !

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शाशिभूषणतामड़े उवाच;

 


दोस्तों,
आये दिन ब्लोगरो के बिच जुदा जुदा वाजुहात से ज्योतिष को लेकर बहसबाजी चलती रहती है / एक तबका ज्योतिष के पक्ष में होता है जबकि दूसरा ज्योतिष के वजूद को ही कब की फांसी हो चुकी बताता है और दोनों तरफ के ब्लोगरो में आग उगलती बयान बाजी होती है जब की कुछ ब्लोगर तमाशबीन बने रहना ही फायदेमंद मानते है और कुछ दूसरे किस्म के ब्लोगर गुमनाम बने रहकर भद्दी भद्दी बाते करके दूर से ही तालियाँ पीट कर खुश हो रहे होते है की '' चलो बेवकूफों को रास्ता दिखला दिया ''
इस चक्करबाजी में ज्यादातर फ़ायदा उस ब्लोगर का होता है जिसने ज्योतिष को फांसी चढाने जैसा प्रोग्राम एक खूबसूरत से लेख के तौर पर शगूफा ब्लोगरो के बिच उछला होता है क्यों की इस दरम्या उसके ब्लॉग की टीआरपी आशमा चूम रही होती है / बांकी यदि प्रभु मेहरबान बहुत ज्यादा हो तो कभी कभी बाजी ज्योतिष के हक़ में भी चरखी हो जाती है और बहस मुबाहसे का फ़ायदा ज्योतिषियों को मिल जाता है अलबत्ता इसके आसार बड़े कमजोर रहते है क्योकि ''महान'' ब्लोगर द्वारा सवालात कुछ इस पेचीदगी के साथ परोसे गए होते है की ज्योतिषीयो की रूह भी फन्ना जाये /
यानी लाबोलुआब ये निकला की ज्योतिष की बखिया उधेड़ो नाव तो खुद-बा-खुद पार लग जाये गी और अंधविश्वास को ढेला फेंक कर मारने की वाह वाही बटोर गे सो अलग / अब तो हांले जूनून ये है की अदने से ब्लोगरो की छोड़े साहबे मिनिस्टर भी ज्योतिष सहारा लेने में गुरेज नहीं करते / मसलन अपने कृषि मंत्री शरद पवार को ही ले /  उनसे बड़ा कोइ क्या खाकर ज्योतिषी पैदा होगा जो वो उनकी जैसी पच्चीस फिसद्दी भी कामयाब भविष्य वाणी कर के दिखा सके / क्योकि जनाब पवार साब जो भी कहते है वो बशुदा हर्फ़ तक सत्य होता है / उन्होंने उवाचा गेहूं महंगे होंगे तो होगये , उन्होंने फरमाया चीनी कडवी हो जाए गी तो वो भी हुई और उन्होंने कहा दूध महँगा होगा तो वो भी हुआ / अब आप बतावे हिन्दुस्तान में सबसे बड़ा ज्योतिषी कौन , मै, आप या बेजान्दारू वाला / जवाब एक ही है जिसपर किसी को क्योकर इत्तेफाक नहीं होगा की श्री मान शरद पवार ही हिदुस्तान के सबसे बड़े ज्योतिषी है /
मेरा ख्याल है जिसमे उम्मीद है आप भी हम ख्याल होंगे की उन महान ब्लोगरो को अब यक़ीनन समझ हो गयी होगी की ज्योतिष को लेकर शक सूबा करना उचित नहीं क्यों की शरद पवार ने अपनी ज्योतिष से उनके लिए तिल बराबर भी जगह नहीं छोड़ी और यदि छोड़ी है तो वो अंगुली उठाके दिखावे /
थैंक्स/      

Saturday, January 23, 2010

बड़े बड़े नामचीन ब्लोगरो की बेगानी ब्लोगिंग !

www.blogvani.comदोस्तों,
आधुनिक युग में संचार  क्रान्ति से समाज कोई भी तबका अछूता नहीं रह गया है /

जिसे जो साधन मुहय्या है वो उसका जमके इस्तेमाल कर रहा है / यह बड़ी अच्छी बात है / फोन रखने वाला फोन से ,टेलीविजन रखने वाला टेलीविजन से और इन्टरनेट से जुड़ा बन्दा ब्लोगिंग से अपने ख्यालात बयान कर रहा है / परन्तु एक जमात और भी है जो अब इन्टरनेट से  जुड़कर अपनी बात बड़े धुम-धडाके से कह रही है और वो जमात है बड़े बड़े नामचीन लोगो की , मसलन अमिताभ बच्चन , सलमान खान , समाजवादी पार्टी में रारड मचा रहे अमर सिंह , और कई दूसरे नामचीन खिलाड़ी अपने ब्लोगों पर जमकर लिख रहे / बांकी बचे पत्रकार और मीडिया बाले जैसे प्रसून बाजपेयी आदि तो ब्लॉग लिखने को अपना जाती धर्म बयान करते है / कलम को तलवार मानने वाली ये जमात तो ब्लोगिंग को पुरे उन्मत भाव से लेती है वो तमाम बाते पुरे खंगाल कर पेशे-नजर करती है जो वो अपने दूसरे माध्यम से नहीं कर पाती /
ये बड़ी बड़ी नामचीन हस्तियाँ ब्लोगिंग करे यह मेरे साथ साथ सभी आम दूसरे फिसड्डी ब्लोगरो के लिए निहायत ही ख़ुशी की बात है  जो की होनी ही चाहिए और यदि सच पूछे तो जब भी इन नामचीन ब्लोगरो की कोई नयी पोस्ट आती है तो लोगबाग दौड़े चले जाते है और बेसब्री से ना केवल पूरी पोस्ट पढ़ते है बल्कि इजहारे मुहब्बत के नाम पर अपनी टिपण्णी भी देते है /
परन्तु क्या कभी किसी भी आम ब्लोगर ने अपनी छोड़े किसी दूसरे ब्लोगर के चिठ्ठे पर भी इन नामचीनों ने अपना हस्ताक्षर भी दिया है / यह एक कटु सत्य है की ये तमाम के तमाम नामचीन कभी किसी ब्लॉग पर नहीं जाते बल्कि अपनी पोस्ट लिखकर यह भी जहमत नहीं उठाते की जो लोग उनकी पोस्ट पढ़कर अपनी टिप्पणिया देते है उन टिप्पणियों में जो प्रश्न पूछे जाते है उनका जवाब भी दे / उनकी हर अगली पोस्ट किसी अहसान की तरह होती है जो विश्व विजेता भाव से पोस्ट की जाती मालूम देती है /
मेरा ख्याल है इन नामचीन ब्लोगरो को अपने ब्लोगिंग रवैये पर विचार करना चाहिए या फिर सभी के लिए सामान कायदा कानून ब्लोगिंग में होना चाहिए / आप बतावे आपका का क्या मत है इस बाबत !
थैंक्स/