Monday, May 18, 2009

सत्य का बोलबाला झूठे का मुँह काला


अक्सर लोग कहते हुए मिल जाते है -अब तो झूठ और बेमानी के बिना गुजारा नही /जब की हमने छोटी उमर से सिखा है सत्य की ही अंत पन्त विजय होती है /और तमाम साहित्य जो चाहे धरम के रूप में हो या सामान्य साहित्य हो सभी जगह यही देखा की जित सत्य की ही होती है परन्तु तुंरत लाभ के लिए बेमानी की राह अपनाने वालो की कही भी कमी नही /मेरा यहाँ बड़ा सीधा सा सवाल है की क्या आप ख़ुद किसी ऐसे आदमी को १००० रुपए देना पसंद करेगे जो बेईमान हो /निश्चय ही आप का क्या मेरा भी यही जवाब होगा की नही /कोई भी दूकान दार सुबह उठ कर प्रभु से यही मांगता हो गा की प्रभु आज ऐसे ग्राहक को भेजना जो १०० रूपये दे कर ५० का माल खरीदे ना की ऐसा भेजना जो ५० देकर १०० का मॉल ले जाए /यानि एक छोटा दूकानदार भी इमानदार ग्राहक ही खोज रहा है /आज दुनिया में १०० प्रतिशत लोग दूसरो से एक आदाद इमानदार बन्दा ही खोज रहा है और जब हर कोई ईमानदार आदमी ही खोज रहा है तो परेशानी कहा है /परेशानी दरसल वह है की हम ख़ुद बे इमान रहते हुए दूसरो से ईमानदारी की उम्मीद करते है जो खामख्याली ही है / आज बड़ी से बड़ी और छोटी सेछोती हर कंपनी या मालिक इमानदार नौकर ही चाहता है और नौकर भी ईमानदार मालिक /एक पिता ईमानदार पुत्र ,एक माँ ईमानदार पति ,एक सच्चा भाई यानि हर किसी को ईमानदार ही चाहिए फ़िर भला बे ईमानी का संबल क्यो ?