Thursday, December 24, 2009

भाषा धीरे धीरे भ्रष्ट हो रही है,!


दोस्तों,
साहित्य अकादमी के वर्ष 2009 के पुरस्कारों की घोषणा कर दी गयी है / हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान कवी , चिन्तक और विचारक डाक्टर श्री कैलाश वाजपेयी को उनकी कविता संग्रह ''हवा में हस्ताक्षर '' के लिए सम्मानित किये जाने का फैसला हुआ है / बुद्धवार 23 दिसंबर को साहित्य अकादमी के सचिव अग्रहार कृष्णमूर्ति जी ने 24 भारतीय भाषाओ के साहित्यकारों के नामो की घोषणा की जिसमे श्री बाजपेयी भी एक है / इस पुरस्कार वितरण का विशेष आयोजन नयी दिल्ली में 16  फरवरी 2010 को आयोजित किया जाये गा / इस पुरस्कार अर्पण में 50 हजार रूपये की राशि और एक उत्कीर्ण ताम्र फलक प्रदान किया जाएगा /
डाक्टर श्री बाजपेयी का कथन है की '' भाषा धीरे धीरे भ्रष्ट हो रही है, हम एक नए किस्म की अपभ्रंश युग में प्रवेश कर गए है जिसमे एक तरफ अकेली कविता है और दूसरी तरफ मानविकी के अनेक विषयों से उपजी जानकारियों का सैलाब है , फिर भी यह आशा नहीं छोड़नी चाहिए की यह दौर भी गुजर जाये गा और आदमी छपे हुए शब्दों की ओर फिर लौटेगा ''
दोस्तों, यह तो थी वो ख़ुशी की खबर जो मै आपसे सहभागी होना चाहता था , दूसरी बात यह है की श्री बाजपेयी का एक दूसरा रूप भी है जो मूर्धन्य साहित्यकार होने से अलग है / श्री बाजपेयी ज्योतिष शास्त्र में अभिन्न रुचि रखते है यधपि ज्योतिष के ज्ञान का उन्होंने कभी सार्वजानिक प्रदर्शन नहीं किया परन्तु मै जानता हूँ जो मर्म वो इस शास्त्र का समझते है वो अच्छे से अच्छे ज्योतिषियों को नसीब  नहीं /  ज्योतिष ही वो साधन है जो डाक्टर श्री बाजपेयी और मुझे , दोनों को करीब लाने का बहाना बनी और वो भी इतना की जैसे मानस पिता-पुत्र !
यह मेरा सौभाग्य है की डाक्टर श्री बाजपेयी ने मुझे मानस पिता  जैसा स्नेह दिया और सदैव देते रहेंगे यह मेरा विशवास है / आप प्रिय दोस्तों से मेरी अपील है की डाक्टर श्री बाजपेयी को फोन या ई-मेल द्वारा अपनी ख़ुशी जरूर बयान करे /
डाक्टर श्री कैलाश बाजपेयी का संक्षिप्त जीवन परिचय कुछ इस प्रकार है ------
 
शिक्षा -
लखनऊ विश्वविद्यालय से एम.ए., पी-एच.डी.
  सन्‌ १९६० में टाइम्स ऑफ़ इण्डिया प्रकाशन संस्थान द्वारा बम्बई में नियुक्ति।
सन्‌ १९६१ में दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों में प्राध्यापन।
सन्‌ १९६७ में चैकोस्लोवाकिया की यात्रा। सांस्कृतिक विनिमय कार्यक्रम के अन्तर्गत १९७० में रूस, फ्रांस, जर्मनी, स्वीडन और अन्य यूरोपीय देशों में काव्यपाठ।
सन्‌ १९७२ में भारतीय सांस्कृतिक केन्द्र ब्रिटिश गायना जार्ज टाउन में केन्द्र-संचालक के रूप में निर्वाचित। ‍सन्‌ १९७३ से १९७६ तक मेक्सिको के एल कालेजियो द मौख़िको में विज़िटिंग प्रोफ़ेसर।
सन्‌ १९७६ के मध्य से १९७७ के शुरू तक अमरीका के डैलस विश्वविद्यालय में एडजंक्ट प्रोफ़ेसर।
सन्‌ १९८३ में क्यूबा सरकार द्वारा हिन्दी कविआ पर व्याख्यान और कविता-पाठ के लिये हवाना में आमन्त्रित।
सन्‌ १९८४ में कोएनोनियन फ़ाउंडेशन के निमन्त्रण पर अमरीका के चार विश्वविद्यालयों में काव्य-पाठ। दिल्ली दूरदर्शन के लिए कबीर, हरिदास स्वामी, सूरदास, जे. कृष्णामूर्ति, रामकृष्ण परमहंस और बुद्ध के जीवन-दर्शन पर फिल्म-निर्माण। भारतीय दूरदर्शन की हिन्दी सलाहकार समिति के सदस्य।
प्रकाशित कृतियाँ : शोधप्रबन्ध – आधुनिक हिन्दी-कविता में शिल्प (१९६३)।
कविता संग्रह : संक्रान्त (१९६४), देहांत से हटकर (१९६८), तीसरा अँधेरा (१९७२), महास्वप्न का मध्यान्तर (१९८०), प्रतिनिधि कविताएँ (१९८८), सूफ़ीनामा (१९९२, सूफ़ीनामा (द्वितीय संस्करण- १९९८), भविष्य घट रहा है (१९९९), हवा में हस्ताक्षर (२००५), शब्द संसार (२००६), अनहट (२००७), मॉस्को में दिल्ली के दिन (कविता संकलन रूसी भाषा में)
भारतीय कविता के संपादित-अनूदित संकलन : इंडियन पोयट्री टुडे ९१९७६), विजन्स एंड मिथ्स (१९७९)।
संपादित कविता-संकलन: मोती सूखे समुद्र का (१९८८)।
दर्शन : द साइंस ऑफ़ मंत्राज़ (१९८१, अंग्रेज़ी और स्पहानी भाषाओं में), एस्ट्रा-कॉम्बिनेशंस (१९८७, अंग्रेज़ी भाषा में)
नाटक : युवा संन्यासी, विवेकानन्द – १९९१
सार : आख्यायिकाएँ (१९९४)
निबंध संग्रह : समाज दर्शन और आदमी (१९९५), आधुनिकता उत्तरोत्तर (१९९६)
एन एंथालिजि ऑफ़ माडर्न हिंदी पोएट्री (१९९६)
प्रबंध काव्य : पृथ्वी का कृष्णपक्ष (१९९५)
रूसी, जर्मन, स्पहानी, डेनिश, स्वीडिश और ग्रीक आदि भाषाओं में कविताएँ अनूदित-प्रकाशित
सम्मान : हिंदी अकादमी (१९९५)
एस.एस. मिलेनियम अवार्ड (२०००)
व्यास सम्मान (२००२)
ह्यूमन केयर ट्रस्ट अवार्ड (२००५)
अक्षरम्‌ का विश्व हिन्दी साहित्य शिखर सम्मान : २००८
फोन -- 011 26565861 ई-मेल - sbtamre@gmail.com
थैंक्स/

Friday, November 27, 2009

क्या आपके खाने में जहर मिला है !

दोस्तों,
इघर कुछ दिनों से खाद्य आपूर्ति आदि का सरकारी अमला थोडा सुस्त सा पडा मालूम पड़ रहा है वरना पीछे दीपावली गयी उसके दरम्यान काफी सक्रीय हुआ हुआ था / बड़े जोर शोर से एसे लोगो की पकड़ धकर चल रही थी जो खाद्य पदार्थो में मिलावट कर ज्यादा धन पैदा करना चाहते हो  / उतर प्रदेश में तो थोक भाव से नकली मावे के साथ पचिसयो व्यापारी पकडे जा रहे थे / हालात इतने बुरे दिख रहे थे की मैंने फैसला किया था की इस दफा दीपावली बिना मिठाई के ही गुजारी जाये केवल बच्चो की ख़ुशी के लिए अपने हांथो से खास तौर पर तैयार मिठाई ही इस्तेमाल में ली जाए / और हम ने अपने इस अघोषित नियम का सख्ती से तामिल भी किया /
इस प्रसंग को बयान कर मै यह कहना चाहता हूँ की आज समाज इस बदतर हालात का शिकार हो चुका की धन की लालसा में वो खाने पिने की चीजो में उन जहरीली चीजो को भी मिलावट के तौर पर इस्तेमाल कराने में गुरेज नहीं करते  जो सस्ती तो होती है मगर एसी खौफनाक बीमारियों को खाने वाले के शरीर में डाल जाती है की बन्दा एड़ीयाँ रगड़ रगड़ कर मर जाता है /
ज्यादा धन की प्यास आदमी को आदमियत छोड़ पिशाच में तब्दील कर रही है , लोग ये क्यों भूल जाते है की उस धन को वे कैसे भोग पायेंगे जो पैशाचिक वृति से कमाई हो /
अंग्रेजो ने हिन्दुस्तान की पूरी की पूरी रवायत ही चौपट कर दी , हिन्दुस्तान को अपने जैसा गोस्त खोर में तब्दील कर दिया, जल्द ही लोग बाग़ हांथो में नोटों की गद्दियाँ लिए भटकते मिल जायेंगे की शुद्ध भोजन , हवा और पानी कहाँ मिलते है /
जिस मिलावटी खाद्य चीजो को खा कर हम बीमार होंगे उस रोग का कोई इलाज भी नहीं मिलेगा क्यों की दवा भी तो नकली मिलाती है / सरकार भी क्या करे गी चार पकड़ो तो आठ दुसरे और ज्यादा उत्साह से आ जुटते है / यानि रोग की जड़ को खंगालने के बजाये परिणामो को दवा दी जा रही है और वो भी आधी अधूरी / शर्त है मेरी एक ना एक दिन सारा भारत मुर्दाखोर बन ही जाये गा / क्या करेंगे जब खाने को शुद्ध खाद्य वस्तु ही नहीं मिलाती होगी कही और  ना ही रोग का इलाज होगा /

सरकार को चाहिए वो वैसे विद्यालय भी खोले जंहा इन्शानियत का पाठ भी हिन्दुस्तानियों को साथ में सिखाया जा सके /थैंक्स /

Wednesday, November 18, 2009

यह रुपिया फटा है मै नहीं लूंगा !

प्रिय दोस्तों ,
चाहे अनचाहे और जाने अनजाने में हम आम प्रायः हम सभी भारतीय अपने देश की संप्रभुता को चोट करते रहते है / ज्यादा तर तो हम यह चोट अनजाने में ही करते है परन्तु बहुतेरे यूं भी है जो पुरे तफ्शील से करते है / अभी दो दिनों पहले हुआ यूं की मै एकदम से दिल्ली मेट्रो की सवारी के लिए विवश हो गया / मैंने कश्मीरी गेट से रोहिणी के लिए टिकट खिड़की से टिकट मांगी और बदले में पचास रूपये का एक नोट दिया / टिकट काटने के लिए जो बन्दा था उसने वो नोट मुझे वापस करते हुए बड़ी हिकारत भरी जुवान में कहा -'' यह नोट नहीं चले गा , दूसरा नोट दीजिये ''
मैंने हैरत से पूछा -'' क्यों क्या गड़बड़ है /  जवाब में उसने कहा नोट पुराना है और फट चुका है / मैंने बुकिंग क्लर्क से मांग करी की वो मुझे लिख कर दे की वो ये नोट नहीं लेगा / उसकी और मेरी बहस लम्बी चलती देख कतार में खड़े लोग बाग़ जल्दी करो का शोर मचाने लगे / परन्तु मै पता नहीं जैसे किसी जूनून की गिरफ्त में था जिद पर अड़ा रहा और एक लंबा चौड़ा भाषण दे डाला जिसका फर्क ये पडा की क्लर्क ने मुझे इंचार्ज से मिलने को कहा मै वहा से निकल कर इंचार्ज के पास जा पहुंचा और जो उसे समझाया वो कुछ एस तरह था -
पुराने समय में जब सोने चांदी के धातु के सिक्के विनिमय के लिए प्रयोग में लिए जाते थे तो समय पाकर वो घिसते जाते थे यानि 100 रुपये मूल्य का सोना सिक्के के तौर पर घिसता घिसता 70 या 80 या उससे भी कम का होता जाता था / इसी बिच कागज़ का आविष्कार हुआ तो सोने चांदी की घिसावट रोकने के लिए '' नोट '' जारी किये गए / अंग्रेजी शब्द नोट का अर्थ रुपिया नहीं होता बल्कि अर्थ होता है ''कोई विशिष्ठ बात '' जो उस कागज़ पर लिखी जाती है जिसे हम रूपये के तौर पर जानते है और यह विशिष्ठ बात हमारे भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर सभी नोट पर लिखते है की -'' मै आपको वचन देता हूँ की मै धारक को ''इतने इतने '' रुपये अदा करूंगा /  गवर्नर के इस ठोस आश्वासन के पीछे रिजर्व बैंक में रखा वो सोना है जितने मूल्य का नोट हमने मेहनत से कमाया होता है / यदि आपके पास पचास रुपये है तो आपके पचास रुपये मूल्य का सोना रिजर्व बैंक में सुरक्षित पडा है लिहाजा वो नोट नोट नहीं सोना है / यही वजह है की रुपयों में सीरियल संख्या डाली जाती क्योकि जो नोट कट फट जाते है उसी संख्या के रिजर्ब बैंक वापिस नए नोट छाप कर बाजार में डाल देता है / यह प्रक्रिया निरंतर चलती रहती है / फिर भला कटे फटे नोट का क्या महत्त्व जब हमारे नाम का सोना रिजर्ब बैंक के पास सुरक्षित पडा है /
इंचार्ज समझदार बन्दा था वो मेरी बात समझ गया / उसने फ़ौरन से पेश्तर मुझे रोहिणी की टिकट मंगवा दी और सहर्ष वो फटा हुआ पचास का नोट कबूल किया / थैंक्स/    

Saturday, October 31, 2009

भविष्य को लेकर मै भयभीत हूँ !


दोस्तों,
जीवन में कई उलझने यूं आजाती है जो पीछे एक लम्बी सोंच के लिए जगह छोड़ जाती है जिसके बाबत बाद में भी ज्यादा कुछ नहीं कर पाते भले ही चाहे जीतनी रोक थाम क्यों ना करले, इसकी मुख्य वजह यह है की समस्या का दूसरा सिरा छोटे मासूम बच्चो के हाँथ में होता है और उनको हम डिक्टेट नहीं कर सकते /
हुआ यूं की मेरे दो बच्चे है , पहला आदिय और दूसरा प्रिथुयश / आदित्य पांचवी श्रेणी में जबकि प्रिथुयश दूसरी में पढ़ते है / आदित्य का स्वभाव ''शांता कारम '' है , विनम्रता और आज्ञाकारिता उसमे कूट कूट कर भरी है / मै उसके गुणों से अत्यंत मुतमुइन हूँ / पीछे दीपावली के बीस पचीस दिन पहले वो दुपहर को स्कूल से गुमसुम सा लौटा जभी मै घर पर ही था मैंने कुछ अनियमित सा महशुस कर उससे कारण पूछा तो उस ने पेट दर्द की शिकायत बता दी , और ज्यादा पूछताछ के नतीजे के तौर पर उसने बताया की सुमित नाम के लड़के ने उसके पेट में किक मारी थी तभी से दर्द बढ़ता जा रहा था /
मैंने वस्तु स्थिति की गंभीरता को समझा और तुंरत उसे डॉक्टर के पास लगाया / डॉक्टर ने अल्ट्रा साउंड करने के साथ ही बांकी सभी जरूरी कदम उठाये और पेट में गहरी चोट साबित करदी / मै ने आईंदा के पांच दिन बड़े ही चिंतातुर अवस्था में गुजारे , प्रभु से निरंतर बिनती और मिन्नतें करता रहा और प्रभु की कृपा रही की दस पंद्रह दिनों में आदित्य स्वस्थ हो गया /
अब बारी पुरे वाकिये को दरयाफ्त करने की थी मैंने लिखित शिकायत स्कूल प्रशासन को दर्ज करायी और लिखित जवाब की ताकीद की , जैसी की उम्मीद थी स्कूल में हड़कंप मच गया / हेड मिस्ट्रेस और सुमित के साथ उसके अभिभावक मेरे घर और ऑफिस में रेलमपेल मचाने लगे / लड़के से माफ़ी मंगवाई गयी अभिभावक के साथ स्कूल प्रशासन भी दंडवत हो गए उन्हें भय सता रहा था की मै मामले को पुलिस तक ना ले जाउ जब की मेरी मनसा वैसी तो कतई नहीं थी परन्तु स्थिति की विकटता जरूर उस बच्चे को समझाना चाहता था क्योकि उस दरम्यान मैंने सुमित के विचारो को हावभाव तथा बातचीत से खूब समझने की कोशिश की वो पूरी जोर से प्रतिक्रिया देने का हामी लगा मुझे जो की टीवी और हिंसक फिल्मो की देंन थी /
आज कल के बच्चे  निःसंदेह अद्भूत प्रतिभा के धनि है परन्तु तीव्रता की अधिकता ,उत्तेजना और हिंसा उनके स्वभाव में इस कदर रच बस गयी है की उनमे सहजता नहीं बची है / यह सब बाते सोच कर मै भविष्य को लेकर  भयभीत हूँ !

Friday, October 23, 2009

कादर खान अभिनय प्रतिभा के कितने धनी है !


दोस्तों,
अब वो पुरे बहत्तर साल का होगया है परन्तु उसके अभिनय में रवानगी अभी भी उतसाह से भरे युवाओं जैसी ही है /
अभी दो दिन पहले मेरे एक मुंबई निवासी अभिनेता मित्र ने मुझे बातो बातो में बताया की आज मशहूर चरित्र अभिनेता कादर  खान का जन्म दिन है / मैंने जिज्ञासा वश उनकी जन्म तिथि और समय जानना चाहा  परन्तु दिन महीने और साल से अधिक कुछ भी मालूम हो सका फलतः मैंने ज्योतिषीय आलेख लिखने के बजाय इस महान कलाकार को बधाई देने के उद्देश्य से उनकी उम्दा फिल्मो की चर्चा करना बेहतर समझा क्यों की कई एक नाम चीन कलाकारों जैसे अमिताभ आदि को तो मीडिया का प्रबल सहयोग मिल जाता है जब की दुसरे कलाकारो  को उनके जन्म दिन पर व्हिश तक नहीं किया जाता /
अब तक तिन सौ से भी ज्यादा फिल्मो में अनेक किस्म के किरदार निभा चुके कादर खान प्रतिभा के ईतने धनी है की अभिनय की मशरूफियत के साथ साथ पट कथा लेखन में भी पक्के उस्ताद है उनके भावः पूर्ण ,धारदार और ओजस्वी डायलोग अनेको फिल्मो  की सफलता का प्रमुख सोपान रहे है और आगे भी प्रभु की कृपा से लम्बे समय तक रहेंगे /
उनके अभिनय की रवानगी तब दिखती है जब वो किसी भी किस्म के किरदार को अपने अभिनय के बलपर जिवंत उतार देते है /
उनके अभिनय का लोहा सभी मानते है / उन्होंने अस्सी से भी ज्यादा फिल्मो में सम्वाद दिए जो अद्वितीय उपलब्धि है/ जो थोडी बहुत फिल्मे मैंने उनकी देखि उनमे इन्कलाब , जुदाई , दुल्हे राजा , और बाप नम्बरी और बेटा दस नम्बरी ज्यादा पसंद आई /
खुदा से मै उनके लिए लम्बी उम्र और ढेर सारी कामयाब फिल्मो की दरखास्त करता हूँ / आमीन !

Wednesday, October 7, 2009

ललित मोदी की क्रिकेटया राजनीती !

दोस्तों,
आज कोई भी हिन्दुस्तानी क्रिकेट के विषय पर आपस में बाते कर के राजी नहीं है क्यों की जो उम्मीदे हम ने टीम इंडिया से लगायी थी वो सारी धुल में मिल गयी / ख़ास कर चैम्पियन ट्रोफी की बदमजा हार के बाद तो कोई भी क्रिकेट सोचना तक नहीं चाहता है परन्तु मेरे दिलो दिमाग में हार के कारणों को खोज निकालने के लिए बेचैन था और मैंने वो प्रमुख वजह खोज निकाली है और वो है ललित मोदी !
ललित मोदी वो वाहिद शख्श है जो भारतीय क्रिकेट को गर्त में मिलाने को कसम खाए बैठा है / सन 1985 में  ड्यूक  युनीवरसिटी अमेरिका में जब ललित मोदी स्नातक की शिछा ले रहा था 400 ग्राम तो कोकीन रखने और किडनेपिंग जैसे गंभीर अपराध में दो वर्ष सजा की हुई परन्तु प्रोबेसन पर हुआ रिहा [देखे वर्ल्डकिपिदिया]
सन में 2007 जयपुर में जो बम विस्फोट हुआ उस दौरान पीडितो को 6 करोड़ का चेक जो दान में दिया वो आजतक कैश नहीं हुआ / मुम्बई हाई कोर्ट में भी ललित मोदी के खिलाफ मुक्क्दमे रहे है 420 और 467 धारा से मुत्तालिक है जो / राजस्थान कई क्रिकेट बोर्ड के खातो में रकम घोटाले का आरोप लग चूका है / दिल्ली में जन्मे ललित मोदी अत्यंत सम्पन्न लोगो की तरह जीवन बसर करते है / एक पुत्र और एक पुत्री के पिता है ललित मोदी / पुत्र रुचिर और पुत्री अलिया अत्यंत हाई फाई स्कूल में मुम्बई में पढ़ते / समस्त परिवार को निकोलस नाम की कंपनी सुरक्षा प्रदान करती है वो भी अलग अलग जिसका भुक्तान आई पि एल यानि बी सी सी आई करती है है / इतनी सारी खूबियों वाले ललित मोदी आई पि एल के अध्यक्ष और बी सी सी आई, चैम्पियन लीग जैसे अनेक क्रिकेट संबध प्रकोष्ठों में उच्च पदाधिकारी है / आई पि एल फोर्मेट इनकी ही दें है जिसने खिलाडियों को खेल से ज्यादा धन की परवाह करना सिखाया है / ललित मोदी की ललित कला ने क्रिकेट का सत्यानाश कुछ इस कदर है की कुछ क्रिकेट पंडित तो वन दे मैच फोर्मेट समाप्त करने की मांग करने लगे है किया / यानि जब सुपर फास्ट 20/20 मौजूद है तो 50/50 का क्या काम / जाहिर है तकनिकी तौर पर क्रिकेट का कत्ल / परन्तु इस चक्कर अत्यधिक में क्रिकेट हो रहा है जो वीरेंदर सहवाग, जाहिर खान, है रूद्र प्रताप सिंह और युवराज सिंह जैसे चोट खाए खिलाडियों की फौज खड़ी कर रहा है जो जब भी देश को जरूरत पड़े उपलब्ध नहीं रहते और नतीजे में देश हार जाता /

खिलाडी पैसा बनाये वो धनि हो हम्मे एतराज नहीं मगर देश हार जाये और वो भी थके थके खेल की वजह से तो हम्मे पूरा एतराज है / ललित मोदी जैसे ललित कलाकारों ने क्रिकेट को तबाह कर दिया है परन्तु जब तक उच्च लेवल पर शरद पवार, अरूण जेतली और राजीव शुक्ल जैसे राजनीती के धुरंधर बैठे है भलाई की उम्मीद करना बेकार है क्यों की ये अपने रसूख का इस्तेमाल करके क्रिकेट की लोकप्रियता का लाभ पाने के लिए मनचाहा प्रयोग करते रहेंगे / अबतो इश्वर ही क्रिकेट को जीवित रख सकता है / थैंक्स /

Tuesday, September 22, 2009

शेखर सुमन की किरदार अदायिगी, भई वाह !


दोस्तों,

टेलीविजन आज घर घर में अपनी पैठ बना चुका है और केबल ने जैसे टीवी को वो पंख ही देदिए की अब वो ''जन्हा ना जाए रवि , वंहा टीवी पंहुच जाए अभी'' जैसी कहावत चरितार्थ कर रहा है/ खैर, ज्यादा कुछ न कहकर मै यह कहना चाहता हूँ की टीवी पर दिखाए जाने वाले प्रोग्रामो का स्तर बेहद उबाऊ होगया दिखता है /ज्यादातर सास बहू आदि जैसे घिसेपिटे कथानक से भरे है /परन्तु पीछे स्टार वन पर जो ख्याति लाफ्टर चेम्पियन को मिली वो दर्शको को राहत देने वाला थी /उसके बाद कुछ एक प्रोग्राम और भी आए परन्तु वो स्वाद नही मिला / मेरा मन टीवी की तरफ़ से बुझ सा गया / यह सिलसिला अभी ज्यादा लंबा चलता इससे पहले अचानक ''सब टीवी'' के एक प्रोग्राम पर मेरा ध्यान गया जिसका नाम है '' टेढी बात '' इसके मुख्य किरदार है शेखर सुमन और गुरपाल सिंह /यह एक सीधे शब्दों में हास्य औरव्यंग से भरा सीरियल है / मजेदार है/ इसमे हँसी की फुहार है / गम भुला देने की ताकत है /आप देखेंगे तो लुफ्त आएगा /थैंक्स/

Thursday, August 13, 2009

जाली नोटों को पहचानने की तमीज ही फिलहाल बचने का एक मात्र रास्ता है !



दोस्तों !
जाली नोटों को पहचानना ही उससे बचने का फिलहाल एक मात्र रास्ता है /क्यो की ना तो सरकार और ना ही स्थानीय प्रशाशन किसी किस्म इमदाद को तैयार है लिहाजा आपकी समझ ही आप की सच्ची दोस्त है / तो आईये निचे दिए चित्रों को देख कर असली और नकली नोटों में फरक समझ कर याद रखिये और दुश्मन देश की हिम्मत तोड़ डालिए -

Wednesday, July 22, 2009

विमानन कंपनी द्वारा किया अपमान डॉक्टर कलाम का व्यक्तिगत मामला नही है जो जैसे चाहे माफ़.....

२१ अप्रेल २००९ का दिन कोई मामूली दिन नही गिना जाना चाहिए /
इस दिन भारत की राजधानी दिल्ली में देश के प्रथम नागरिक रह चुके देश रत्ना भूत्पूर्ब राष्ट्र पति डॉक्टर अब्द्दुल कलाम आजाद को अमेरिकी विमानन कंपनी ने जानबूझ कर भारत की धरती पर ही जी भर कर जल्लिल किया वो भी तलाशी के नाम पर / मिडिया ने जी भर कर विमानन कंपनी को और बेदम होचुकी सरकार को कोसा और डॉक्टर कलाम को इस बात के लिए इज्जत से नवाजा की सराहनीय रूप से अति विनम्र डॉक्टर कलाम को नाहक ही हलकान किया गया जब की उन्होंने उफ़ तक नही की और ना ही तिन महीनो तक किसी को ख़बर लगने दी / ये तो दिल्ली से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजी दैनिक अखबार ' मेल टू डे ''की करामात थी जो भंडा फोड़ हो गया और सरकार की थूथू हो गई / सारे प्रसंग में डॉक्टर कलाम की विनम्रता को हम हाँथ जोड़ कर कबूलते है परन्तु उनकी चुपी दिल तोड़ जाती है उन्हें समझना चाहिए था की यह उनका व्यक्तिगत मामला नही था बल्कि देश का सर्वोच्च सम्मान उनके साथ जुड़ा हुआ है इसलिए उनका अपमान देश का अपमान है / और अब वो दूसरी गलती माफ़ी देकर न करे और ना ही उनके माफ़ी देने से मामला खत्म नही होना चाहिए बल्कि बा कायदा कंपनी पर मुकद्दमा चले और अपमान की पूर्ति जायज लगने वाली सजा से होनी चाहिए ताकि दूसरी बार कोई अंग्रेज देश हिंदुस्तान की अस्मत अपने हांथो से टटोलने की हिकमत ना जुटा पाए क्योकि सम्मान ही सब कुछ है और बिना सम्मान देश या जीवन व्यर्थ है /थैंक्स/

Wednesday, July 8, 2009

कोई तो है शेर इस देश में जो दहाड़ना जानता है


दोस्तों,

पिछले दिनों माननीय उच्च न्यायलय ने एक बेहद्द संवेदनशील फैसला होमोसेक्स के निस्बत दिया जिसकी गूँज सारे देश में बड़े जोरो से सुनी जा रही है / पश्चिमी देशो की तरज पर होमोसेक्स अब भारत में में भी बड़े शानोशोकत से कानूनी पहनावे में सज्ज ध्ज्ज कर अपने लिए, अपने अस्तित्व के लिए जगह पाने के लिए तैयार है /यधपि अब से पहले समाज में यह व्याप्त तो था परन्तु था ये डरा सहमा सा क्योकि होमोसेक्स का अस्तित्व बखूबी ख़ुद को बुराई ही मानता रहा है / कोई नेक अस्तित्व हो तो उसे डरे सहमे होने की जरूरत नही होती/ डरते वो है जो बुरे है परन्तु जिस बेशर्मी से फैसला आने के बाद लेस्बियन जमात ने अपने संगियों से चिपट कर -चूम कर अपनी खुशी का इजहार किया है यह आगामी भारत की और उसके नए शक्ल लेते समाज की भावी दुखद तस्बीर बयान होती है / कानूनी बाधा के दूर होजाने के बाद वो समय दूर नही की माता पिता अपने बच्चो के सामने मजबूर खड़े होंगे /
किसी भी अस्तित्व को हमारा समाज अपने मानक नियमो के आधार पर ही स्वीकारता चला आ रहा है /जिस की उत्पादकता नगण्य और बुराई ज्यादा है वो चीज चाहे जितने जोर से समाज में जगह बनाने की कोशिश कर ले उसको असफल तो होना ही होगा/ बस यही वो बात है जो सभ्य समाज को तसल्ली रखने को कहती है अन्यथा अब तक तो देश समाज का गुस्सा फुट पड़ना चाहिए था /इससे पहले की समाज में एड्स जैसी भयानक बीमारिया अपनी गंध फैलाये भारत के एक बीर सपूत ने युद्ध का बिगुल फूंक दिया है / यानि पूजनीय बाबा राम देव ने सर्वोच्च न्यायालय में होमोसेक्स के पक्ष में दिए गए फैसले को चुनौती देने का फैसला किया है / देश के सच्चे सपूत है बाबा राम देव/ इस शेर की दहाड़ ने बता दिया है की उन जैसे शेरो के रहते भारतीयता का नाश नही होसकता फ़िर भले ही देश की अंधी बहरी सरकार सोयी क्यो न पड़ी रहे /जो कार्य निजाम का है वो कार्य एक सन्यासी को अंजाम देना पड़ रहा है / बाबा राम देव के पीछे सारे देश को गोलबंद होना चाहिए ताकि पश्चिमी सभ्यता की देन यह बुराई हमारे देश में जड़े ना फैला सके अन्यथा समाज का नाश सुनिश्चित है /थैंक्स/

Wednesday, June 10, 2009

चाल में ठसक हिन्दुस्तानी हो

मुगलों के लंबे शासन के बाद अंग्रेजो के शासन में २०० बरसो तक भारत का दम घुटता रहा और अनगिनत कुर्बानियों का सुफल हमारी आजादी के रूप में सामने है /अंग्रेजो का मिजाज आजादी की जंग की तपिस ज्यादा झेलने के हिसाब से कमजोर साबित हो रहा था किंतु मुद्दा गंभीर यह था की चालीस पैतालीस करोड़ की जनसँख्या वाले देश को नियम कायदों की लछमन रेखा के अंदर कायम रखने की सामर्थ है किस में , वो जो खून का बदला खून चाहते थे किसी दृष्टिकोण से योग्य नही है , ठीक है अन्य पहलू से वे देशभक्त हो सकते है परन्तु अपनाये जाने वाले विरोध की भाषा कतई समाज को नही बंधे रख सकती थी , लिहाजा उपलब्ध विकल्पों में महात्मा गाँधी ही सर्वोत्तम विकल्प थे यानि यदि मैंने या आप उस अवसर पर मौजूद होते और योग्यता साबित कर पाते तो भारत की तस्बीर शायद कुछ और होती , शायद आप मेरी बात नही समझे , कोई बात नही दूसरे तरीके से समझे / राजनीती शास्त्र का रहा कोई भी विद्यार्थी यह बखूबी समझता है की हम जिस शासन के और संबिधान के तहत जीते है वो इंग्लैंड , अमेरिका , फ्रांस आदि देशो के सम्बिधानो के लूट का धन है जिस पर तरक्की की बुनियाद रखे जाने की कोसिस पिछले पाँच से अधिक दशको से की जारही है और पता नही कोशिश कब तक चले गी या इसका अंजाम जो हम चाहते है वो ही मिलेगा / प्रकृति का नियम अनुभवी लोगो ने इसके विपरीत ही बताया है अस्तु उस कहावत का भी तो कही कुछ मायने होता होंगा की बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से होए ?

अंग्रेज चले गए परन्तु अंग्रेजी छोड़ गए /आजाद होते भारत में उस वक्त जो नेता अंग्रेजो द्वारा समझे गए वो सभी इंग्लैंड से शिक्षा प्राप्त थे यानि हिन्दुस्तानी अंग्रेज थे जिनका तन हिदुस्तानी परन्तु दिमाग इंग्लिश था उन्होंने अमेरिका के राष्ट्रपति की उक्क्ति -प्रजातंत्र मूर्खो का मूर्खो के द्वारा मूर्खो के लिए अपनाई जाने वाली शासन व्यवस्था है , नही सुनी या पढ़ी नही होगी यह दूसरा मुर्खता पूर्ण ख्याल होगा /अंग्रेजो से पहले भारत शादियों से राजशाही शासन के अनुसार संचालित होता रहा था , पड़ोसी देश नेपाल और भूटान अबतक अनुगामी थे /अंग्रेजो की सोंच भारत को गहरी शाजिश के तहत ईशाईयत की ओ़र लेजाने की थी ,दूसरे शब्दों में भारतीय संस्कार ,भाषा ,रहन सहन , आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति , गुरुकुल विद्या अध्ययन का सम्मानपूर्ण तरीका , सामजिक अपनत्व भरे तानेबाने को कुचल डालने की थी , उनकी गहरी साजिश अब धीरे धीरे खूब रंग दिखने लगी है /हालत तेजी से बदल ने लगे है / यदि टूटी फूटी इंग्लिश में गन्दी गाली भी देदो तो आसपास खड़े आपको विद्वान ही समझे गे /संस्कृत भाषा में आपने प्रभु को स्मरण किया तो पोंगा पंडत समझे जाए गे / छोटी सी कोई बिमारी हो जाए और दिल्ली मुंबई जाना पड़ जाए तो आधुनिक चिकित्सा आपका खून का आखरी कतरा भी निचोड़ लेगी ,बचेगी केवल हिन्दुस्तानी आत्मा / माता -पिता ऊँची से ऊँची इंग्लिश कॉन्वेंट स्कूल में अपने बच्चो का दाखिला चाहते है / बच्चे इंग्लिश में हाउ डू यू डू कहते है तो अंग्रेजो की नक़ल करते बच्चे बड़े प्यारे लगते है , साथ ही कोई त्योंहार हो या घर आते जाते बड़े बुजुर्ग का पैर छू कर आर्शीवाद ले यह भी उम्मीद हम अपने अंग्रेज बन रहे बच्चो से करते है जो की संतान के प्रति दोगली निति का प्रतिक है /

अफगानिस्तान में जिस तालिबान को अमेरिका ने मिटटी में मिला दिया उस तालिबान की कट्टरता अपने सिद्धांतो को लेकर इतनी प्रखर हुई की समाज जिस भाषा से हमेशा नफ़रत करता आया है वो है हिंसा ,में बोलना शुरू कर दिया और यही से वो अपनी पहचान खोता चला गया और साथ ही विरोधियो की फौज खडी होती चली गयी /उसकी लडाई अपनी मुस्लिम रवायत को लेकर थी , वो कहते है अंग्रेज न बनो मुसलमान रहो परन्तु उतेजना बिच में घुस आई और मामला हिंसा की आंधी में उड़ गया /सवाल यह है की हम से भूल कन्हा हुई , क्या यह सच्च नही की जो शासन पद्धति हम ने अपनाई वो हमें अंग्रेज तो बना रही है मगर एक संवेदनशील हिन्दुस्तानी नही / मेरा मतलब विज्ञानं के विरूद्व जाना कतई नही , परन्तु यह भी सच्च है की जो बच्चे माँ बाप के खून पसीने से पलकर बढे वो बुढापे में मुंह पर थूक कर चल दे तो समाज दिशा ठीकनही yaह अन्धो को भी दीखता है /मन को यह कहकर फुसलाना की कलयुग है तो बदलाव की मांग को मीठी गोली देने जैसा है /कलयुग तो भगवान राम के युग में था की सीता का हरण हो गया और पूछने वाला कोई नही था आज किसी कन्या को कही छू भर भी दे तो पुलिस जान के पीछे लग जाए गी /कहना सिर्फ़ यह है की मन की आँखे खुलनी चाहिए , चीन भी तो एक देश है जो तरक्की की तुलना में हम से हजारो कदम आगे है परन्तु अंग्रेजी भाषा बिरले ही बोलते है / तब के नेताओ ने तब जो सोचा वो तब के हिसाब से अच्छा था , अब अयसा क्या हो की हमारी अगली पीढी अमेरिका से कंधे से कन्धा मिला कर चले मगर चाल में ठसक हिन्दुस्तानी हो /थैंक्स/

Monday, June 8, 2009

दो जोड़ दो क्या छ होते है ?


हम ने स्कूल में पढा था दो जोड़ दो =चार होते है , यह फार्मूला शायद लोग भूल गए है तभी तो अशोक जाडेजा का पढाया पाठ लोगबाग पढने लगे की दो जोड़ छः होता है और अपना घर बार बेच कर २२ लाख उसे ६६ लाख की आस में सुपुर्द कर दिए और जवाब जो मिला सारी दुनिया जानती है /१८ एजेंटो के माध्यम से अशोक जाडेजा दिल्ली हरियाणा राजस्थान जम्मू काश्मीर मध्य प्रदेश से प्रतिदिन लाखो की वसूली करी जिसके फलस्वरूप वो १८ शानदार गाडियो में ३५-४० लोगो के हुजूम के साथ दनदनाता फिरता था /
मेरी बहस उसके खालिस कारगुजारी भरे पेशे से बिलकुल नही है , उसने जो राह चुनी वो रास्ता दोजख में ही खुलता है बल्कि मेरी टसल की वजह उसके धार्मिक मुखोटे की वजह से है जो उसने हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया /ये वो मामला है जो एक इज्जतदार बाप और बदमाश बेटे जैसा होता है /बदमाश बेटा बाप के नाम और इज्जत के सहारे अपनी कारगुजारियों को अंजाम देता जाता है /
मामले में जो गहन विचार से जो बात खूब सलाती है वो है मिडिया और लोगो ने इसे धार्मिक नजरिये से चूक के तौर पर बताया जो निहायत ही वाहियात बात है -यदि भगवान के नाम पर ही धन मिलता तो उस पाकिस्तानियों का क्या जो अपना धन दूना कराने सीमा पर से आए थे , नही वो किसी देवी या देवता की कृपा या अल्लाह की इनायत के नाम पर धन लुटाने नही बल्कि धन की हवस ने उनके आँखों पर पट्टी बाँध दी थी /
भगवान ने किस शास्त्र में कब कहा है की मै स्वयं या मेरे अधिकृत बन्दो के माध्यम से मैं लोगो का धन तिन गुना कर दूंगा /
बड़े ही कुविवेकी है वो लोग जो धन की हवस में जायज और नाजायज राह भूल जाते है /
शाश्त्रो में देखा और पढ़ा की प्रभु का नाम लेकर बड़े बड़े पापी अपने पापो की छमा पा जाते है परन्तु अशोक जाडेजा ने प्रभु का नाम लिया तो बांकी जिंदगी बड़े जेल में गुजारे गा /

Monday, May 25, 2009

भूले बटोही की घर वापसी

सुबह का भुला शाम को घर वापस आ जाए तो भुला नही कहा जाता एक कहावत है जो भारत के अल्प सख्यको पर खूब फिट बैठती है /आजादी के बाद सभी वर्ग के लोग बिना ज्यादा सोचे समझे कांग्रेस के पीछे हो लिए थे क्यो की और कोई वैसी पार्टी नही थी जो लोगो में कांग्रेस जैसी पैठ रखती हो /अल्प संख्यक वर्ग का मन टूटा नरसिंह राव सरकार के शाशनकाल से जब राम मन्दिर तोडा गया /यह अल्प संख्यक वर्ग के वोटो का ही बिखराव था जो मुलायम सिंग ,लालू प्रसाद ,सभी कोम्निस्ट ,और अन्य दूसरे नेताओ का कद बढ़ता चला गया और यह कद इतना बढ़ा की कांग्रेस जैसी अखिल भारतीय पार्टी का साँस लेना कठिन हो गया और वो समय भी आ गया जब सरकार चलाने के लिए कांग्रेस इनके समर्थन की मुहताज हो गई परन्तु चुनाव २००९ ने सारे देशा में ऐसी बयार बहा दी जो खुद कांग्रेस भी उम्मीद नही करती थी की उत्तर प्रदेश जहा उसके पास खोने के लिए कुछ नही बचा था वहां २२ उम्मीदवार जित गए /सारा देश देखता रह गया /दूसरो की जाने दे खुद राहूल गाँधी ने नही सोचा था जभी तो चुनाव प्रचार के आखरी दिन उन्हों ने बिहार के मुख्य मंत्री नीतिश कुमार की जम कर प्रशंशा की ,लेफ्ट को राईट बताया याने अपनी सीमाओं को पहचानते हुए आगे की भूमिका जोड़नी शुरू करदी थी क्यो की आगे समर्थन की जरूरत दिख रही थी परन्तु उन्हें पत्ता नही था की अल्प संख्यक वर्ग पहले ही मन बना चूका था और वो चमत्कार दिखा दिया की आँखे दिखाने वाले समर्थन लेलो समर्थन लेलो की भीख मांग रहे थे क्यो उनके दिल में यह अचानक क्या हुआ की पीछे पीछे दौड़ पड़े असल बात यह थी उन्हें यह समझ हो गयी की अल्प संख्यक वोट कांग्रेस की झोली में वापस जा चूका है और वो वापस कांग्रेस से चिपके रहने पर ही वापस मिल सकता है और यह बात कांग्रेस भी जानती है और यही वजह है की कांग्रेस उन्हें घास नही डाल रही / आगे भारत की राजनीती नयी दिशा में जाना चाहती है ये स्पस्ट संकेत है कोई आश्चर्य नही की छेत्रिय पार्टियों का ज़माना बीत चूका हो नयी उड़ान के लिए अनंत आकाश खुला पड़ा है कांग्रेस की मर्जी है की वो चाहे जैसे उडे मगर केवल 5 वर्ष / क्यो की यह इस मायावि दुनिया का नियम है की जो आता है वो जाता भी है /थैंक्स/

Wednesday, May 20, 2009

सपने देखने का दिल करता है

कांग्रेस को जो जनादेश मिला है वो है तो बँटा हुआ परन्तु पिछली बार से बहुत बेहतर है अब वो सकून से अपनी शर्तो पर काम कर सकती है /उसकी खोई थाती उसे धीरेधीरे वापस मिल रही है यानि मुस्लिम वोट वापसी कर रहे है जो एस नजरिये से एक बेहतर बात है की जितना ज्यादा दूसरी पार्टियों ने उसका भय दोहन किया उतना तो कांग्रेस ने चार से ज्यादा दशक में नही किया यानि दूसरी पार्टियों ने ना केवल मुसलिम वर्ग से वोट ही लिया बल्कि उसे तमाम बुनियादी सुविधाओ से मरहूम भी रखा खास कर शिछा के मामले में क्योकि प्रजातंत्र में अशिक्षा एक शाप ही है खैर देर आए परन्तु दुरूस्त आए /उम्मीद है आने वाला समय हर वर्ग के लोगो के लिए सुखद होगा / राहुल गाँधी से हर किसी ने उम्मीदे बाँध ली है जो उनके हावभाव से ग़लत भी नही प्रतीत होती मेरा दिल कहता है यह नवजवान निश्चित ही कुछ कर गुजरेगा /प्रभु उस पर कृपा बनाए रखे क्योकि जिस उम्र में वो सत्ता के शिखर के बिल्कुल पास खडे है उस उम्र में किसी जिले का नगर पार्षद नही बना जा सकता अस्तु किसी नोजवान की शिखर पर मौजूदगी बड़े बड़े इरादे पालने की इच्छा जगाता है /जय भारत /

Monday, May 18, 2009

सत्य का बोलबाला झूठे का मुँह काला


अक्सर लोग कहते हुए मिल जाते है -अब तो झूठ और बेमानी के बिना गुजारा नही /जब की हमने छोटी उमर से सिखा है सत्य की ही अंत पन्त विजय होती है /और तमाम साहित्य जो चाहे धरम के रूप में हो या सामान्य साहित्य हो सभी जगह यही देखा की जित सत्य की ही होती है परन्तु तुंरत लाभ के लिए बेमानी की राह अपनाने वालो की कही भी कमी नही /मेरा यहाँ बड़ा सीधा सा सवाल है की क्या आप ख़ुद किसी ऐसे आदमी को १००० रुपए देना पसंद करेगे जो बेईमान हो /निश्चय ही आप का क्या मेरा भी यही जवाब होगा की नही /कोई भी दूकान दार सुबह उठ कर प्रभु से यही मांगता हो गा की प्रभु आज ऐसे ग्राहक को भेजना जो १०० रूपये दे कर ५० का माल खरीदे ना की ऐसा भेजना जो ५० देकर १०० का मॉल ले जाए /यानि एक छोटा दूकानदार भी इमानदार ग्राहक ही खोज रहा है /आज दुनिया में १०० प्रतिशत लोग दूसरो से एक आदाद इमानदार बन्दा ही खोज रहा है और जब हर कोई ईमानदार आदमी ही खोज रहा है तो परेशानी कहा है /परेशानी दरसल वह है की हम ख़ुद बे इमान रहते हुए दूसरो से ईमानदारी की उम्मीद करते है जो खामख्याली ही है / आज बड़ी से बड़ी और छोटी सेछोती हर कंपनी या मालिक इमानदार नौकर ही चाहता है और नौकर भी ईमानदार मालिक /एक पिता ईमानदार पुत्र ,एक माँ ईमानदार पति ,एक सच्चा भाई यानि हर किसी को ईमानदार ही चाहिए फ़िर भला बे ईमानी का संबल क्यो ?